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शुजात बुखारी और औरंगजेब का कत्ल किस जेहाद के नाम पर हुआ?

सवाल ये है कि गले मिलें भी तो किनसे? कोई जाकर ढूंढ कर लाए उन्हें जो कश्मीर के मर्ज की 'कश्मीरी' दवा जानते हों क्योंकि ये राजनीतिक बीमारी अब लाइलाज होती जा रही है

Kinshuk Praval Kinshuk Praval Updated On: Jun 15, 2018 05:42 PM IST

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शुजात बुखारी और औरंगजेब का कत्ल किस जेहाद के नाम पर हुआ?

रमजान का पाक महीना और ईद से ठीक एक दिन पहले जन्नत की घाटी में दो परिवार आंसुओं के सैलाब में डूब गए. दो परिवारों के लिए ईद की खुशी का मौका मातम में बदल गया. सिसकियों से गूंज रहे परिवारों का बस एक ही सवाल है कि शुजात बुखारी और औरंगजेब के हत्यारे ये बताएं कि उनका कत्ल किस जेहाद के नाम पर हुआ है? वो कौन सी आजादी की जंग है जो औरंगजेब और शुजात बुखारी जैसे बेकसूरों की हत्या की आजादी देती है?

कश्मीर में अमन की आवाज को गोलियों से दबाने वाले दहशतगर्दों पर अब बड़ा फैसला लेने का वक्त आ गया है. बातचीत की कोशिश और रमजान में सीजफायर के संयम ने आतंकियों के हौसलों को बढ़ाने का ही काम किया है. जो सिर्फ गोली की जुबान समझते हैं उनके लिये अब सूबे की सीएम महबूबा मुफ्ती को भी अपनी सोच बदलने की जरूरत है.

सिर्फ आंसू बहाने से गम कम नहीं होगा

पत्रकार शुजात बुखारी की हत्या के बाद उनके गमजदा परिवार से मिलने गई महबूबा मुफ्ती रो पड़ीं. कल तक महबूबा ही घाटी में सेना की सख्त कार्रवाई का विरोध करती आईं थीं. यहां तक कि सेना पर एफआईआर दर्ज कराने का मौका नहीं चूकती थीं. उनकी सियासी मजबूरी ही यही है कि उनकी पार्टी अलगाववादियों से सहानुभूति की वजह से सत्ता में आई लेकिन राजनीति की विडंबना ये रही कि उसे बीजेपी के सहयोग से सरकार बनानी पड़ी. इस बार उनके सामने आतंकियों की कायराना करतूत के दो ताजा मामले हैं. महबूबा को सोचना होगा कि बेकसूरों की मौत पर सिर्फ आंसू बहाने से गमज़दा परिवार के आंसू नहीं पोंछे जा सकते हैं. घाटी में राजनीतिक दलों को निजी राजनीतिक हितों से ऊपर उठते हुए घाटी के मुस्तकबिल पर फैसला करना होगा.

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कश्मीर के लिए अमन की आवाज बुलंद करने वाले पत्रकार शुजात बुखारी को हमेशा के लिए खामोश कर दिया गया तो सेना में अपने फर्ज की ड्यूटी निभाने के बाद परिवार के साथ ईद मनाने के लिए छुट्टी पर निकले औरंगजेब को अगवा कर मार डाला गया. औरंगजेब न तो ड्यूटी पर थे और न उनके सीने पर फौज की वर्दी थी. वो उस वक्त सिर्फ अल्लाह के एक बंदे ही तो थे जो ईद की खुशियों को अपने जेहन में सजाए हुए तमाम ख्वाहिशों के साथ घर के लिए निकले थे.

क्या खिलाफी कार्रवाई मानवाधिकार उल्लंघन है?

घाटी में मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगाने वाले ये तो बताएं कि इन दो बेकसूरों के साथ हुई घटना क्या है?  यूएन ने पाक अधिकृत कश्मीर और जम्मू-कश्मीर में कथित तौर पर मानवाधिकार उल्लंघन का आरोप लगाया है. साथ ही अंतर्राष्ट्रीय जांच की भी मांग की है. सवाल उसी यूएन से है कि शुजात बुखारी और औरंगजेब को मारने वाले कौन थे? क्या ऐसे आतंकवादियों के खिलाफ सैन्य ऑपरेशन करना मानवाधिकार का उल्लंघन है?

आंतकियों की फितरत को जानने के बावजूद सेना ने रमजान के मौके पर एकतरफा सीजफायर किया लेकिन बदले में उसे औरंगजेब का क्षत-विक्षत शव मिला. ऐसे में कश्मीर में मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों की झड़ी लगाने वाले संगठन और बुद्धिजीवी ये बताएं कि बेकसूरों को बचाने के लिये आतंकियों का सफाया कहां से मानवाधिकार उल्लंघन के दायरे में आता है?

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बुखारी एक निडर और साहसी पत्रकार थे. उन्होंने कश्मीर मसले पर अपनी राय बेबाक तरीके से रखी थी. उनकी कलम घाटी में बंदूकों की गरज पर भारी पड़ रही थी जिस वजह से एक सोची समझी साजिश के तहत उन्हें निशाना बनाया गया. वहीं शहीद हुए औरंगजेब भारतीय सेना की 44 राष्ट्रीय राइफल में तैनात थे. औरंगजेब जब बिना हथियार और वर्दी के थे तो रास्ते में उनको अगवा कर मार डाला गया.

निर्णायक कार्रवाई का वक्त

ये दोनों ही घटनाएं एक दूसरे से पूरी तरह जुड़ी हुई हैं. शुजात बुखारी को निशाना बनाकर मीडिया पर भी दहशतगर्दों ने दबाव बढ़ाने का काम किया है. तो वहीं सेना के जवान औरंगजेब की हत्या कर ये संदेश दिया कि वो रमजान के मौके पर भी वो बदला लेने से नही चूकेंगे. ऐसे आतंकियों के खिलाफ अब निर्णायक कार्रवाई का वक्त आ गया है. इससे पहले जम्मू-कश्मीर पुलिस के स्थानीय अधिकारियों की भी निर्मम तरीके से हत्या की गई. डीएसपी अयूब पंडित की जिंदगी भी रमजान के आखिरी हफ्ते में आने वाली शब ए कद्र की रात  हिंसक भीड़ के हवाले हुई थी.

रमजान के मौके पर एकतरफा संघर्ष विराम किया गया था लेकिन अब दो हत्याओं की वजह से घाटी में ईद का माहौल बदल गया. संघर्ष विराम की वजह से घाटी में थोड़ी शांति की उम्मीद थी. सीज़फायर की वजह से कश्मीर में हिंसा और मौत के आंकड़ों में कमी भी आई . पत्थरबाजी की घटनाएं भी मुठभेड़ वाली जगहों पर नहीं हुई. स्थानीय लोगों और सुरक्षाबल के बीच झड़प में भी कमी आई. लेकिन केंद्र सरकार से मिले मौके को कश्मीर की सियासत करने वालों ने गंवाने का ही काम किया. मुख्यधारा से बाहर रहने वाले राजनीतिक दलों और कश्मीर-कश्मीरियत की बात करने वाले अलगाववादियों के लिए बातचीत का बड़ा मौका था लेकिन स्थानीय सियासी चेहरे बिना पाकिस्तान की मौजूदगी के कश्मीर मसले पर बात करना ही नहीं चाहते हैं. तभी एनएसए अजित ढोभाल को कहना पड़ा था कि वो हुर्रियत से बात करने से बेहतर सीधे पाकिस्तान से बात करना समझते हैं.

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कश्मीर के हालात पूरी तरह से बदल चुके हैं. अलगाववादी ताकतों ने स्थानीय युवाओं में नफरत और भारत के खिलाफ अविश्वास भरने का काम किया है. घाटी में युवाओं की करीबी 65 फीसदी आबादी है. ये युवा अब सेना के खिलाफ हथियार उठाने में देर नहीं करते हैं. आतंकी संगठनों के अलावा पत्थरबाजों की भीड़ में ये युवा शामिल हैं. एनकाउंटर में मारा गया हिजबुल कमांडर बुरहान वानी इनका पोस्टर-बॉय बन चुका है. बुरहान की मौत के बाद घाटी में न सिर्फ विरोध प्रदर्शन बढ़े बल्कि स्थानीय युवाओं के आतंकी संगठनों में शामिल होने में इजाफा भी हुआ है. यहां तक कि आतंकी बने युवा हाथों में हथियार थाम कर सोशल मीडिया पर खुद की तस्वीरें शेयर कर दूसरे युवाओं को उकसाने का काम कर रहे हैं. मोबाइल-इंटरनेट और सोशल मीडिया पर बैन लगाकर इन चीजों को रोकना कोई रणनीति नहीं हो सकती है.

केवल बंदूकों से नहीं होगा समस्या का हल

तकरीबन तीन साल तक कड़ी कार्रवाई के बावजूद कश्मीर के हालात बद से बदतर ही होते आए हैं. सिर्फ बंदूकों के जरिए ही घाटी में अमन की उम्मीद नहीं की जा सकती है. खुद आर्मी चीफ बिपिन रावत भी मानते हैं कि केवल बंदूकों से सेना का मकसद कभी पूरा नहीं हो सकता है. यही वजह भी रही कि केंद्र सरकार ने भी बातचीत का दरवाजा खोलते हुए खुफिया विभाग के पूर्व निदेशक दिनेश्वर शर्मा को कश्मीर में सभी पक्षों के साथ बातचीत के लिये वार्ताकार नियुक्त किया. लेकिन सवाल ये उठता है कि दिनेश्वर शर्मा क्या हुर्रियत के नेताओं से बातचीत करेंगे?

हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के  कश्मीर पर ‘राग़ पाकिस्तान’ की वजह से केंद्र सरकार की दूरियां देखी जा सकती हैं. हालांकि एनडीए सरकार के पास इतिहास का वो अध्याय भी है जब कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कश्मीर मसले पर हुर्रियत नेताओं से बातचीत की थी. लेकिन घाटी में टेरर फंडिंग के मामले में एनआईए की जांच में हुर्रियत नेताओं के नाम आने से तल्खी बहुत बढ़ चुकी है. घाटी में अलगाववादी नेताओं को पाकिस्तान के आतंकी संगठनों से मिल रही फंडिंग के मामले में कई हुर्रियत नेता गिरफ्तार हो चुके हैं. इस नेटवर्क के क्रेक होने के बाद हुर्रियत नेताओं से बातचीत की संभावनाएं खुद ही खारिज़ भी हो जाती हैं क्योंकि फंडिंग का पैसा पत्थरबाजों, प्रदर्शनकारियों और आतंकी हमलों के लिये इस्तेमाल होता था.

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पंद्रह अगस्त को लालकिले की प्राचीर से पीएम मोदी ने कहा था कि न गाली से न गोली से बल्कि कश्मीर समस्या का हल गले मिलने से निकलेगा. लेकिन अपनों की हत्याओं से लोगों के गले रुंध रहे हैं. गोलियों की बोली समझने वाले आतंकी  सीजफायर को भारतीय सेना और सरकार की कमजोरी समझ रहे हैं और जो अलग कश्मीर की हिमायत करने वाले ठेकेदार हैं उन पर जज्बाती अपीलों का कोई असर नहीं है.

सवाल ये है कि गले मिलें भी तो किनसे? कोई जाकर ढूंढ कर लाए उन्हें जो कश्मीर के मर्ज की कश्मीरी दवा जानते हों क्योंकि ये राजनीतिक बीमारी अब लाइलाज होती जा रही है.

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