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'शुजात बुखारी की हत्या से पत्रकारों की बिरादरी आज अनाथ महसूस कर रही है'

एक सफल लीडर की तरह बुखारी हमेशा अपनी टीम का नेतृत्व मोर्चे पर आगे रह कर करते रहे. शायद इसीलिए पत्रकारों का काफिला उनके जाने के बाद उनके लिए खड़ा रहा

Updated On: Jun 15, 2018 09:37 PM IST

Sameer Yasir

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'शुजात बुखारी की हत्या से पत्रकारों की बिरादरी आज अनाथ महसूस कर रही है'
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चौदह जून को श्रीनगर के प्रेस एन्क्लेव इलाके में शाम के वक्त तो लोगों ने जब तीन लोगों को आसपास घूमते देखा, तो कोई अंदाजा भी नहीं लगा पाया कि ये तीनों किसी की हत्या करने के इरादे से घूम रहे हैं. कश्मीर का एक बड़ा पत्रकार उनके निशाने पर था और वे उसी का इंतजार कर रहे थे.

वरिष्ठ पत्रकार शुजात बुखारी जैसे ही अपने दफ्तर से बाहर निकले, बाइक पर सवार तीनों संदिग्ध नौजवान एलर्ट हो गए. लेकिन उन्होंने अपने हथियार एके-47 अभी संभाले नहीं. उन्होंने इंतजार किया कि बुखारी अपने दोनों सुरक्षाकर्मियों के साथ कार में सवार हो जाएं. जैसे ही बुखारी कार में सवार हुए, उन तीनों ने अपनी एके-47 राइफल की नलियां खोल दीं.

तब तक लाल चौक के सिटी सेंटर में ईद की खरीदारी के लिए भीड़ लगनी शुरू हो गई थी. गोलियों की आवाज हुई तो लोगों ने समझा ईद के मौके पर पटाखे चलाए जा रहे हैं. लेकिन तुरंत बाद लोगों ने गौर किया कि तीनों लड़के उस कार को घेरे हुए हैं. बस फिर क्या था लोग बचने के लिए चिल्लाते हुए इधर-उधर भागने लगे. पल भर में तीनों नौजवान बाइक पर सवार हुए और भाग निकले. किसी को पता नहीं कि कौन लोग थे वो. पुलिस ने फिलहाल बाइक पर सवार तीन लोगों की धुंधली सी तस्वीरें जारी की हैं.

बुखारी की हत्या शांति की कोशिशों को नुकसान पहुंचाने की साजिश

हत्यारों के काम में इतनी सफाई थी कि अंदाजा लगाया जा रहा है कि शुजात बुखारी को मारने का काम किसी हत्यारे गैंग को दिया गया था. बुखारी भारत-पाकिस्तान के बीच कश्मीर पर हो रही शांतिवार्ता का एक अहम हिस्सा थे. जाहिर है ये हत्या शांति की कोशिशों को नुकसान पहुंचाने की साजिश है. खैर, अगले दस मिनट तक तो किसी की हिम्मत नहीं हुई कि बुखारी की गाड़ी के पास जाए, क्योंकि लोगों ने सोचा कि शायद हत्यारे आसपास ही कहीं छुपे होंगे और बुखारी की कार पर नजर रखे हुए होंगे. लेकिन थोड़ी ही देर में कार को लोगों की भीड़ ने घेर लिया.

नजदीक स्थित कोठी बाग पुलिस स्टेशन से पुलिस की टीम को आने में कुछ वक्त लगा. तब तक नाराज भीड़ ने गोलियों से छलनी कार के ड्राइवर को कार से निकाल कर अस्पताल पहुंचा दिया था. इस हमले से अचकचाए कई पत्रकार भी वहां थे और समझ नहीं पा रहे थे कि ऐसे हाइ सिक्योरिटी जोन में कैसे हत्यारे आए और एक पत्रकार को मारकर चले गए. किसी के भी पास इस सवाल का जवाब नहीं था. बुखारी के सिर और पेट में कई गोलियां लगी थीं और उनमें जान अब नहीं बची थी.

shujat hussain murder suspect

कश्मीर मॉनीटर के लिए काम करने वाले पत्रकार निसार धर्मा ने बताया 'शुजात बुखारी खून से लथपथ थे और कार में सीट पर औंधे मुंह गिरे पड़े थे. एक पत्रकार ने उनके शरीर को हाथ लगा नब्ज पकड़ने की कोशिश की, लेकिन कोशिश बेकार साबित हुई. ड्राइवर के पास बैठा जो सुरक्षाकर्मी मारा गया था, उसका जबड़ा गोलियों के हमले से टेढ़ा हो गया था.

इस घटना का असर दूर तक देखा जाएगा

उसकी गर्दन में गोलियां आर-पार हो गईं थीं. उसकी भी मौत मौके पर ही हो गई थी. हालांकि गाड़ी के ड्राइवर में थोड़ी हरकत थी. सांसे चल रही थीं और वो कुछ बुदबुदा रहा था. उसकी आंखें बंद होने को थीं.' पुलिस के एक सिपाही ने गोलियों से छलनी बुखारी की कार को ड्राइव कर अस्पताल तक पहुंचाया, जहां डॉक्टरों ने शुजात बुखारी को मृत घोषित कर दिया.

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हमला इतनी तेजी से हुआ कि शाम को अपना रोजा तोड़ने को तैयार बैठे कश्मीर के लोग अचानक बदहवासी में डूब गए. 2008 के बाद ये पहला मौका था जब कश्मीर में किसी पत्रकार की हत्या की गई थी और बुखारी जिस कलेवर और जिस कद के पत्रकार थे, उसे देखते हुए कश्मीर के मीडिया जगत के लिए इस हत्या को ऐतिहासिक कहा जाए, तो गलत नहीं होगा क्योंकि कश्मीर को लेकर चल रही बातचीत का वो हिस्सा थे. इसीलिए इस घटना का असर भी दूर तक देख जाएगा.

बुखारी की हत्या ने कश्मीर में अलगाववादी और मुख्यधारा, दोनों ही विचारधारा के लोगों को चौंका दिया है. हर शख्स ने इस कायराना हरकत की निंदा की है. आंसू बहा रही मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती से जब पत्रकारों ने सवाल पूछे तो भरे गले से वो ज्यादा बोल नहीं पाईं. बुखारी के साथ हाल ही में हुई एक मुलाकात का हवाला देते हुए वे वहां से निकल गईं.

बुखारी को श्रीनगर के मीडिया जगत में जगह बनाने में देर नहीं लगी थी

सारे दिन इस घटना की निंदा करने में जहां घाटी के बड़े-बड़े लोगों में होड़ लगी रही, सिर्फ उनके साथ काम करने वाले पत्रकार ही थे, जो निडर हो कर खुल्लमखुल्ला इस हत्या का विरोध कर रहे थे. एक सफल लीडर की तरह बुखारी हमेशा अपनी टीम का नेतृत्व मोर्चे पर आगे रह कर करते रहे. शायद इसीलिए पत्रकारों का काफिला उनके जाने के बाद उनके लिए खड़ा रहा.

SHUJAT

कश्मीर के मशहूर फोटोजर्नलिस्ट शौकत नंदा का कहना था 'बुखारी का जाना बहुत दर्दनाक था. वो तीन साल मेरे बॉस रहे थे. मुझे यकीन है कि उनकी मौत से हर शख्स को दुख हुआ होगा, सिवाय उन लोगों के, जिन लोगों ने गौरी लंकेश की हत्या पर जश्न मनाया था.'

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श्रीनगर के मीडिया सर्कल में अपनी हैसियत बना चुके बुखारी कभी इसी प्रेस कन्क्लेव में में नए-नए रिपोर्टर बन कर आए थे. लंबे कद के बुखारी क्रीरी बारामुला इलाके से थे. बुखारी के पिता इसी इलाके में एक स्कूल में अध्यापक थे और समाज में उनकी खासी इज्जत थी. बुखारी खुद पढ़ने-लिखने और अपनी बात बेलाग तरीके से रखने वाले शख्स थे, इसलिए उन्हें श्रीनगर के मीडिया जगत में अपनी जगह बनाने में देर नहीं लगी. नब्बे के दशक में उन्होंने वेद भसीन के मशहूर अखबार कश्मीर टाइम्स से अपने पत्रकारिता के करियर की शुरुआत की थी.

बुखारी ने अपने आखिरी ट्वीट में भी बता दिया कि वो क्या हैं

बुखारी की शोकसभा में आए उनके सहयोगी रहे एक पत्रकार ने बताया 'पत्रकारिता की शुरुआत में ही वे बड़ी नपी-तुली आवाज की तरह थे. बहुत संतुलित नजरिया था उनका. लेकिन बहुत जल्दी उन्होंने अपनी छवि कुछ धुंधली सी बना ली. वो ऐसा दौर था जब पत्रकारों से भी उम्मीद की जाती थी कि उनका अपना एक नजरिया होना चाहिए. लेकिन बुखारी ने पत्रकारिता के उसूल नहीं छोड़े और निडर होकर संतुलित पत्रकारिता करते रहे.' शायद यही वजह थी कि उन्होंने अपने आखिरी ट्वीट में लिखा भी 'कश्मीर में हमने गर्व के साथ पत्रकारिता की है और आगे भी जमीनी हकीकत से लोगों को रूबरू कराने का ये काम करते रहेंगे.'

अपने यकीन के साथ पत्रकारिता करने वाला ये शख्स आखिर निशाना बन ही गया. इससे पहले भी बुखारी पर तीन हमले हो चुके थे. उन को धमकियां तब और बढ़ गईं जब वो नब्बे के दशक के आखिर में अंग्रेजी के अखबार ‘द हिंदू’ के कश्मीर ब्यूरो चीफ बने और बढ़िया स्टोरीज़ कीं. 2006 में उन्हें एक बंदूकधारी ने अगवा कर लिया था और मारने ही वाला था कि उसकी बंदूक लॉक हो गई और वो खुद अपनी जान बचा कर भागा.

Shujaat Bhukhari

कई बार उन्होंने अपने लेखों में इस बात का जिक्र भी किया था कि कश्मीर में पत्रकार होना एक खतरनाक, जोखिम भरी ज़िंदगी है. 2008 में उन्होंने अपना खुद का अखबार ‘राइजिंग कश्मीर’ निकाला. उनका अखबार कश्मीर के मीडिया सर्कल में अपने पेशेवर अंदाज की वजह से मील का पत्थर माना जाता है. बुखारी के न्यूजरूम का हिस्सा रहे कई पत्रकार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पत्रकारिता में नाम कमा रहे हैं.

पत्रकारों की जात आज बेसहारा महसूस कर रही है

टीआरटी वर्ल्ड के लिए काम कर रहे बाबा उमर इनमें से एक नाम हैं. बाबा ने उन्हें याद करते हुए कहा 'पत्रकारों की हमारी जात आज उनके जाने से बेसहारा महसूस करने लगी है. कायर लोग एक पत्रकार को क्या मार पाएंगे? मेरे दोस्त, तुम्हारी आत्मा को शांति मिले.' ये दुर्भाग्य ही है कि कश्मीर में मारे जाने वाले पत्रकारों में Dy बुखारी का नाम भी शुमार हो गया है.

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कुछ इसी तरह 23 अप्रैल 1991 को अल-सफी के संपादक मोहम्मद शबान वकील की हत्या भी इसी इलाके में हुई थी. 10 सितंबर 1995 को एएफपी के फोटोग्राफर मुश्ताक अली की प्रेस एन्क्लेव में तब हत्या हो गई, जब उन्होंने एक पार्सल खोला. पार्सल बम ने उनकी जान लेली.

इसी तरह 2008 में 13 अगस्त के दिन जावेद मीर को उस समय गोलियों से भुन दिया गया था, जब वे श्रीनगर में बागे मेहताब में प्रदर्शन कवर करने गए थे. और अब बुखारी की हत्या के बाद कश्मीर एडीटर्स गिल्ड का ये बयान सही ही है कि 'बुखारी की हत्या से कश्मीर में मीडिया के लिए पहले से खराब माहौल और बदतर हुआ है.'

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