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नक्सलियों के भय और सरकारी उदासीनता की भेंट चढ़ चुका है ऐतिहासिक श्रृंगी धाम

प्रशासनिक अधिकारी नाम नहीं छापने की शर्त पर कहते हैं कि नक्सली आतंक की वजह से विकास की रफ्तार धीमी है

Updated On: Nov 29, 2018 10:03 PM IST

Pankaj Kumar Pankaj Kumar

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नक्सलियों के भय और सरकारी उदासीनता की भेंट चढ़ चुका है ऐतिहासिक श्रृंगी धाम

प्रकृति की खूबसूरती को निहारने की अनुपम जगह है श्रृंगी ऋषि का धाम. यहां हरे-भरे जंगल पहाड़ और पौराणिक कथाओं से जुड़ा भव्य कुंड लोगों के मन को खुशियों से सराबोर कर देता है. सरकारी उदासीनता के बावजूद लोग यहां पर प्रकृति का लुत्फ उठाने आते हैं परंतु आने वालों में ज्यादातर लोग आसपास के गांव और जिले के ही होते हैं.

श्रृंगी ऋषि का सबसे रोचक जगह है यहां बना हुआ एक कुंड जिसका पानी मौसम के हिसाब से ठंढा और गरम होता है. जाड़े में हल्का गरम और गरमी में पानी की मधुर शीतलता लोगों के लिए कौतुहल का विषय बना हुआ रहती है. आलम यह है कि जब लोग इस कुंड में प्रवेश करते हैं तो हल्के नीले रंग का साफ और बेहद स्वच्छ पानी लोगों को आनंद के सराबोर में डुबो देता है. इतना ही नहीं इस पानी में पका हुआ भोजन बेहद स्वादिष्ट और सुपाच्य होता है इसलिए आसपास के लोग शिवरात्रि, मकर संक्रांति और नव वर्ष के मौके पर इकट्ठा होकर इस जगह की खूबसूरती का भरपूर आनंद लेते हैं.

श्रृंगी ऋषि के कुंड के पानी की साफ-सफाई का जिम्मा प्रकृति ने अपने ऊपर ही लिया है. यहां पहाड़ियों के दर्रे से एक पर्वत श्रृंग के नीचे कुल छह जल श्रोत फूटते हैं, जो एक सरिता में परिणत हो जाते हैं. यहीं एक छोटा सा कुंड निर्मित है, जिसमें श्रद्धालु और तीर्थयात्री स्नान करते हैं. कहा जाता है कि इस कुंड में स्नान करने से चर्म रोग ठीक हो जाता है और नि:संतान व्यक्ति को पुत्र की प्राप्ति होती है. कई किवदंतियां भी यहां से जुड़ी हुई हैं जिसका वर्णन अलग-अलग पौराणिक कथाओं और पुस्तकों में सुनने और पढ़ने को मिलता है.

श्रृंगी ऋषि के तप से हुआ था श्रीराम का जन्म

जमुई, लखीसराय और मुंगेर जिले के ट्राइजंक्शन पर बसा श्रृंगी ऋषि धाम कई मायनों में लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है. कहते हैं श्रृंगी ऋषि का आश्रम श्रीराम के जन्म से पहले का है. किंवदंति के अनुसार पुत्र पाप्ति की इच्छा से राजा दशरथ यहां पधारे थे और अपने मित्र सम्राट रोमपाद के कहने पर विभांडक ऋषि के पुत्र श्रृंगी ऋषि को यज्ञ में पुरोहित बनाया था.

shringi dham

धाम में कुंड की तस्वीर

कहा यह भी जाता है कि श्रृंगी ऋषि के प्रताप से राजा दशरथ को चार पुत्र की प्राप्ति हुई थी जो राम लक्ष्मण भरत और शत्रुघ्न के नाम से पूजे जाते हैं. इन चारों भाई का मुंडन भी यहीं कराया गया था इसलिए कई लोग पुत्र रत्न की प्राप्ति के उपरांत यहां पर मुंडन के लिए भी आते हैं और कई श्रद्धालु संतान उत्पत्ति के लिए यहां मन्नत भी मांगते हैं.

श्रृंगी ऋषि धाम में मौजूद पुरोहित पंकज झा कहते हैं कि मन्नत मांगने वालों की मांग यहां जरूर पूरी होती है इसलिए आसपास के क्षेत्रों से श्रद्धालु मुंडन संस्कार के लिए बड़ी संख्या में जुटते हैं और शिव पार्वती समेत श्रृंगीऋषि की पूजा करते हैं.

श्रृंगी ऋषि कुंड के समीप एक शिवमंदिर है, जिसका निर्माण मुंगेर गजेटियर के अनुसार 1893 में कराया गया था. वैसे अति प्राचीन शिव लिंग भी वहां मौजूद है जिसको लेकर मान्यता है कि श्रृंगी ऋषी शिव लिंग की पूजा करते थे. इस इलाके में एक अति प्राचीन बांध भी है जो दैता बांध के नाम से जाना जाता है. इस बांध को लेकर पुरोहित और पुराने लोग कहते हैं कि यह बांध ऋष्य ऋंग कालीन है और इसका निर्माण राक्षसों द्वारा किया गया था.

श्रृंगी ऋषि धाम के रास्ते में रामसिर नामक स्थान पर भगवती स्थापित है जो जलप्पा माई के नाम से प्रसिद्ध है, लेकिन प्रसिद्धी और प्राकृतिक सौंदर्य के बावजूद श्रृंगी ऋषि धाम विकास की बाट जोह रहा है.

ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण श्रृंगी ऋषि धाम विकास के इंतजार में

बिहार सरकार द्वारा राजकीय पर्यटन केन्द्र चिह्नित किए जाने के बावजूद श्रृंगी ऋषी धाम उपेक्षित पड़ा हुआ है. इस क्षेत्र के आसपास कई बौद्ध स्तूप, बौद्ध विहार आदि के अवशेष मिल चुके हैं. साल 1871 में जेनरल कनिंघम ने यहां बौद्धकालीन और ब्रह्मकालीन बहूत सी मूर्तियां देखी. उन्हें यहां दो शिलालेख भी मिले थे.

सातवीं सदी में चीनी पर्यटक ह्वेनसांग के यात्रा वृतांत से पता चलता है कि समय-समय पर भगवान बुद्ध ने यहां भ्रमण किया और अपने ज्ञान का प्रचार प्रसार भी. इस इलाके के उरैन गांव में भगवान बुद्ध ने यक्षराज नकुल को हराकर अपना शिष्य भी बनाया था. कई इतिहासकार मानते हैं कि पुरातत्विक खोज होने पर महाभारत कालीन अंगदेशीय और अन्य ऐतिहासिक जानकारियां मिलने की अधिक संभावना है.

लेकिन सरकारी उदासीनता के चलते श्रद्धालुओं और शैलानियों के लिए मौलिक सुविधाएं तक मुहैया नहीं कराई जा सकी हैं. धर्मशाला और होटल तो दूर टॉयलेट और शौचालय भी इस जगह पर बिल्कुल नदारद हैं. यही वजह है कि खनिज संपदा से भरपूर इस इलाके में नक्सलियों का बोलबाला रहा है.

नक्सलियों के आतंक के साए में धाम

इलाके में नक्सली आतंक की वजह से विकास दूर-दूर तक नदारद है. सरकार ने तीन कैंप की विशेष सुविधा मुहैया कराई है जिसमें दो सीआरपीएफ कैंप हैं. इनमें से एक बन्नू बगीचा में है वहीं दूसरा कजरा में है. तीसरा कैंप बीएमपी कैंप है जो बगुआ चक में है.

लखीसराय जिले से 10 से 20 किलोमीटर की दूरी पर तमाम कैंप नक्सलियों पर जबरदस्त निगाह बनाए तैनात रहते हैं. साल 2010 के अगस्त महीने में लखीसराय जिले में एक नक्सली अटैक में 7 पुलिसकर्मी शहीद हुए थे और 4 को अगुवा किया गया था. नक्सलियों के आतंक का दंश साल 2013 में भारतीय रेल भी झेल चुका है.

धनबाद पटना इंटरसिटी पर जबरदस्त हमले में एक सब इंस्पेक्टर और एक जवान सहित एक सिविलियन भी मौत की भेंट चढ़ चुके हैं. साल 2008 और 2009 में तो नक्सलियों ने सेंट्रल कमेटी के सदस्य को छुड़ाने के लिए कोर्ट पर हमला कर दिया था. यही वजह है कि इस इलाके में सीआरपीएफ की दो कंपनी मुस्तैदी से तैनात होकर उन पर नकेल कसने के लिए हर मिनट तैयार रहती है लेकिन इस वजह से श्रंगी धाम के विकास पर जबर्दस्त प्रभाव पड़ा है. दूर के सैलानी अभी भी यहां आने से कतराते हैं.

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फिलहाल मोरवे डैम से इलाके में सिंचाई का काम चल रहा है, जो कि बिहार के पहले मुख्यमंत्री के कार्यकाल में बनाया गया था लेकिन इलाके में बसे कई गांव पानी तक के इंतजार में हैं. दाढ़ीसीर पर एक छोटा डैम पिछले बीस साल से जनता की मांग पर बनाया नहीं जा सका है. फिलहाल इसे मूर्त रूप दिया जा रहा है जिसके बन जाने से रामसिर, दाढ़ीसिर, सिंहचक, अमरपुर और जगदीशपुर सहित कई गांव में सिंचाई की सुविधा बहाल हो पाएगी.

दाढ़ीसीर गांव के स्थानीय निवासी नीरज यादव कहते हैं कि यहां पिछले बीस साल से फसल की तबाही हो रही थी और हमलोग सिंचाई की समस्या से पीड़ित थे. सरकार बीस साल बाद ही सही हमारी समस्या का निदान तेजी से कर रही है इससे इलाके में खुशी का माहौल है.

वहीं रामसिर के रामाकांत यादव कहते हैं कि जिला मुख्यालय से चंद किलोमीटर की दूरी पर दो हजार एकड़ की अनदेखी सालों से की गई. सरकारें आईं और गईं लेकिन हमारी हालत में कोई बदलाव नहीं आया. इस बार दाढ़ीसिर पर डैम बनाए जाने को लेकर चल रहे काम से इलाके में विकास की प्रवाह तेज होगी और लोग लाभान्वित होंगे. लेकिन नक्सल की मौजूदगी से विकास पर असर पड़ता है इसको लेकर स्थानीय निवासी ने कुछ भी कहने से इनकार कर दिया.

प्रशासनिक अधिकारी नाम नहीं छापने की शर्त पर कहते हैं कि नक्सली आतंक की वजह से विकास की रफ्तार धीमी है लेकिन प्रशासन हर मोर्चे पर विकास को लेकर प्रयासरत है. लखीसराय जिले 20 किलोमीटर की दूरी पर बसा मंदिर बेहद रमणिक है. जिले से महज 10 किलोमीटर की दूरी पर दाढ़ीसिर गांव से पहाड़ी रास्ता शुरू होकर मंदिर तक जाता है. यहां पर सड़क का निर्माण हो चुका है लेकिन लाइटिंग और अन्य सुविधाएं पूरी तरह नदारद हैं.

एक ठेकेदार के मुताबिक इलाके में काम करने वालों को लेवी देना ही पड़ती है भले ही वो कितनी भी पहुंच रखता हो. जाहिर है नक्सली आतंक से आतंकित कामगार, ठेकेदार को अपनी जान बचाने के लिए इलाके के कमांडर को लेवी देना पड़ता है, जिससे नक्सली विकास के काम को रोकें नहीं. यहां के वनों में लकड़ी की अवैध कटाई और अवैध कत्था बनाने का धंधा फलता-फूलता रहा है. बालू का अवैध खनन भी यहां जगजाहिर है. अवैध उत्खनन और प्राकृतिक संपदा के दोहन की वजह से गैरकानूनी काम फल-फूल रहे हैं जिसको लेकर प्रशासन उदासीन रहा है.

सीआरपीएफ में तैनात एक अधिकारी के मुताबिक नक्सलियों को समूल नाश करने में प्रशासनिक अधिकारी द्वारा प्राकृतिक दोहन में शामिल होना भी बाधक है इसलिए केंद्र द्वारा पैरा मिलिट्री फोर्स तैनात किए जाने के बावजूद नक्सली पूरी तरह से नष्ट नहीं हो पाए हैं.

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