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हाशिए पर खड़े शरद यादव का विपक्षी सम्मेलन महज झुनझुना !

शरद यादव दूसरे दलों को साथ लाकर भले ही अपनी मजबूती दिखाने की कोशिश कर रहे हों लेकिन वास्तविकता यही है कि वो खुद कमजोर हो गए हैं

Updated On: Aug 16, 2017 04:54 PM IST

Amitesh Amitesh

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हाशिए पर खड़े शरद यादव का विपक्षी सम्मेलन महज झुनझुना !

जेडीयू के पूर्व अध्यक्ष शरद यादव आजकल अपनी ही पार्टी में पावरलेस हो गए हैं. पावरलेस शरद अब विपक्षी दलों को एक साथ एक मंच पर लाकर अपने सियासी महत्व को बरकरार रखने की कोशिश में हैं.

हालांकि एक साल पहले ही नीतीश कुमार के अध्यक्ष बनते ही शरद यादव की पार्टी से पकड़ काफी ढीली हो गई थी. लेकिन, संसदीय दल के नेता के तौर पर संसद के भीतर अपनी मौजूदगी का एहसास कराने की उनकी कोशिश लगातार होती रही.

अब तो संसदीय दल के नेता के पद से भी उनकी छुट्टी हो गई है. तैयारी उन्हें जेडीयू से बाहर करने की भी है. लेकिन, पार्टी से बाहर होने पर सियासत में हाशिए पर जाने का उनका डर अब सामने आ रहा है.

अब शरद यादव अपने-आप को राजनीतिक तौर पर जिंदा रखने की कोशिश में हैं. इसी कोशिश के तहत शरद विपक्षी दलों की एकता के सूत्रधार बनने की फिराक में हैं.

मोदी राज में साझा विरासत के खतरे की बात कर शरद यादव देश के अलग-अलग भागों में सरकार विरोधी अभियान शुरू कर रहे हैं. शुरुआत राजधानी दिल्ली से होगी. दिल्ली में 17 अगस्त को विपक्षी दलों को एक साथ एक मंच पर बुलाया गया है.

शरद यादव की तरफ से बुलाई गई इस मीटिंग में कांग्रेस, लेफ्ट समेत सभी विपक्षी दलों के नेताओं को न्योता दिया गया है. जेडीयू के भीतर के शरद समर्थक नेता भी इस मीटिंग में शिरकत करने वाले हैं.

शरद यादव की वजूद बचाने की कोशिश

sharad yadav

दरअसल, शरद यादव अब अपना वजूद तलाश रहे हैं. लंबे वक्त से बिहार की सियासत में अपने-आप को बरकरार रखने वाले शरद यादव पर हमेशा बाहरी होने का ठप्पा लगा रहता है. मध्यप्रदेश के शरद यादव ने कभी लालू के साथ तो कभी नीतीश के साथ मिलकर अपनी सियासी पारी बिहार के भीतर खेली. लेकिन, अब यह सियासी पारी लड़खड़ा रही है.

नीतीश की तरफ से किनारे किए जाने के बाद अब उनके पास फिलहाल कुछ बचा नहीं है. डर है सियासी तौर पर उनका खात्मा ना हो जाए, लिहाजा अब पुराने सियासी दुश्मन लालू के साथ पींगें बढ़ा रहे हैं.

शरद यादव की यह कवायद महज सियासी ड्रामा ही लग रही हैं. क्योंकि पार्टी के भीतर उनके पास उस तरह का ना ही कोई समर्थन दिख रहा है और ना ही वो पार्टी फोरम जाकर अपनी ताकत का एहसास कराने की हिम्मत जुटा पा रहे हैं.

अगर शरद में हिम्मत और ताकत होती तो वो 19 अगस्त की पटना की नेशनल एक्ज्क्युटिव में जाकर अपनी ताकत दिखाते. लेकिन, अपनी पार्टी के असली जेडीयू होने का दावा करने वाले शरद यादव ऐसा करने से कतरा रहे हैं.

फिलहाल शरद यादव इस मुद्दे पर कुछ बोलने के बजाए मौन धारण कर रहे हैं. शरद यादव जेडीयू की नेशनल एक्जिक्यूटिव की मीटिंग में शिरकत करने पर भी ना कुछ बोल रहे हैं और ना ही वो 27 अगस्त को लालू की रैली को लेकर ही अपने पत्ते खोल रहे हैं. लेकिन, उनके तेवर से तो यही लग रहा है कि वो पटना तो जाएंगे लेकिन, 19 की पार्टी की बैठक में नहीं लालू की रैली में मंच पर विराजमान होंगे.

शरद क्यों नहीं देते सांसद पद से इस्तीफा

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फोटो: पीटीआई

शरद यादव से सवाल यही पूछा जा रहा है कि जब नीतीश कुमार से इस तरह की नाराजगी है तो फिर पार्टी में बतौर सांसद पद से इस्तीफा क्यों नहीं दे रहे. पूरे देश में आंदोलन की बात करने वाले शरद यादव पद से चिपके क्यों हुए हैं.

क्या शरद पार्टी से निकाले जाने का इंतजार कर रहे हैं. क्या वो अपने ऊपर कार्रवाई होने के इंताजर में हैं, जिससे वो मोदी विरोधी नेता के तौर पर अपने-आप को बेहतर तरीके से स्थापित कर सकें.

शरद यादव अगर पार्टी से निलंबित होते हैं तो उस हालात में बतौर सांसद वो अपने पद पर बने रहेंगे. शरद यादव की सियासत देखकर यही लग रहा है कि वो संसद से इस्तीफा देने के बजाए निलंबित होकर साझा विरासत बचाते नजर आएंगे.

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