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भगत सिंह ने दिल्ली के घर से चिट्ठी लिखकर सुखदेव को दिया था ये जवाब

5 अप्रैल को दिल्ली के सीताराम बाजार के घर में भगत सिंह सुखदेव को लिखा था पत्र

Updated On: Sep 28, 2017 03:14 PM IST

FP Staff

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भगत सिंह ने दिल्ली के घर से चिट्ठी लिखकर सुखदेव को दिया था ये जवाब

भगत सिंह लाहौर के नेशनल कॉलेज के छात्र थे. एक सुंदर-सी लड़की आते-जाते उन्हें देखकर मुस्कुरा देती थी और सिर्फ भगत सिंह की वजह से वह भी क्रांतिकारी दल के करीब आ गई. जब असेंबली में बम फेंकने की योजना बन रही थी, तो भगत सिंह को दल की जरूरत बताकर साथियों ने उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपने से इंकार कर दिया. भगत सिंह के करीबी मित्र सुखदेव ने उन्हें ताना मारा कि तुम मरने से डरते हो और ऐसा उस लड़की की वजह से है. इसे सुन भगत सिंह ने दोबारा दल की मीटिंग बुलाई और असेंबली में बम फेंकने का जिम्मा जोर देकर अपने नाम करवाया.

8 अप्रैल, 1929 को असेंबली में बम फेंकने से पहले शायद 5 अप्रैल को दिल्ली के सीताराम बाजार के घर में उन्होंने सुखदेव को ये पत्र लिखा था, जिसे शिव वर्मा ने उन तक पहुंचाया. ये 13 अप्रैल को सुखदेव की गिरफ्तारी के वक्त उनके पास से बरामद किया गया और लाहौर षड्यंत्र केस में सबूत के तौर पर पेश किया गया.

प्रिय भाई,

जैसे ही यह पत्र तुम्हें मिलेगा, मैं जा चुका हूंगा, दूर एक मंजिल की तरफ. मैं तुम्हें विश्वास दिलाना चाहता हूं कि आज बहुत खुश हूं. मैं यात्रा के लिए तैयार हूं. अनेक-अनेक मधुर स्मृतियों और अपने जीवन की सब खुशियों के होते भी, एक बात जो मेरे मन में चुभ रही थी कि मेरे भाई, मेरे अपने भाई ने मुझे गलत समझा. मुझ पर बहुत ही गंभीर आरोप लगाए- कमजोरी का. आज मैं पूरी तरह संतुष्ट हूं. आज मैं महसूस करता हूं कि वह बात कुछ भी नहीं थी, एक गलतफहमी थी. मेरे खुले व्यवहार को मेरा बातूनीपन समझा गया और मेरी आत्मस्वीकृति को मेरी कमजोरी. मैं कमजोर नहीं हूं. अपनों में से किसी से भी कमजोर नहीं.

भाई! मैं साफ दिल से विदा होऊंगा. क्या तुम भी साफ होगे ? ये तुम्हारी बड़ी दया होगी. लेकिन ख्याल रखना कि तुम्हें जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाना चाहिए. गंभीरता और शांति से तुम्हें काम को आगे बढ़ाना है, जल्दबाजी में मौका पा लेने की कोशिश न करना. जनता के प्रति तुम्हारा कुछ कर्तव्य है. उसे निभाते हुए काम को निरंतर सावधानी से करते रहना.

सलाह के तौर पर मैं कहना चाहूंगा कि शास्त्री मुझे पहले से ज्यादा अच्छे लग रहे हैं. मैं उन्हें मैदान में लाने की कोशिश करूंगा, एक अंधेरे भविष्य के प्रति समर्पित होने को तैयार रहें. उन्हें दूसरे लोगों के साथ मिलने दो और उनके हाव-भाव का अध्यन्न होने दो. यदि वे ठीक भावना से अपना काम करेंगे तो उपयोगी और बहुत मूल्यवान सिद्ध होंगे. लेकिन जल्दी न करना जैसी सुविधा हो, वैसी व्यवस्था करना. आओ भाई, अब हम खुश हो लें.

वास्तविक बलिदान है क्या?

खुशी के वातावरण में मैं कह सकता हूं कि जिस प्रश्न पर हमारी बहस है, उसमें अपना पक्ष लिए बिना नहीं रह सकता. मैं पूरे जोर से कहता हूं कि मैं आशाओं और आकांक्षाओं से भरपूर हूं और जीवन की आनंदमयी रंगीनियों से ओत-प्रोत हूं, पर आवश्यकता के वक्त सब कुछ कुर्बान कर सकता हूं और यही वास्तविक बलिदान है. ये चीजें कभी मनुष्य के रास्ते में रुकावट नहीं बन सकतीं, बशर्ते कि वह मनुष्य हो. निकट भविष्य में ही तुम्हें प्रत्यक्ष प्रमाण मिल जाएगा.

क्या प्यार कभी किसी मनुष्य के लिए सहायक सिद्ध हुआ है?

किसी व्यक्ति के चरित्र के बारे में बातचीत करते हुए एक बात सोचनी चाहिए कि क्या प्यार कभी किसी मनुष्य के लिए सहायक सिद्ध हुआ है? मैं आज इस प्रश्न का उत्तर देता हूं – हां, यह मेजिनी था. तुमने अवश्य ही पढ़ा होगा की अपनी पहली विद्रोही असफलता, मन को कुचल डालने वाली हार, मरे हुए साथियों की याद वह बर्दाश्त नहीं कर सकता था. वह पागल हो जाता या फिर आत्महत्या कर लेता, लेकिन अपनी प्रेमिका के एक ही पत्र से वे मजबूत हो गया, बल्कि सबसे अधिक मजबूत हो गया.

जहां तक प्यार के नैतिक स्तर का संबंध है, मैं यह कह सकता हूं कि ये अपने में कुछ नहीं है, सिवाए एक आवेग के, लेकिन यह पाशविक वृत्ति नहीं, एक मानवीय अत्यंत मधुर भावना है. प्यार अपने आप में कभी भी पाशविक वृत्ति नहीं है. प्यार तो हमेशा मनुष्य के चरित्र को ऊपर उठाता है. सच्चा प्यार कभी भी गढ़ा नहीं जा सकता. वह अपने ही मार्ग से आता है, लेकिन कोई नहीं कह सकता कि कब?

मनुष्य में प्यार की गहरी भावना होनी चाहिए

हां, मैं यह कह सकता हूं कि एक युवक और एक युवती आपस में प्यार कर सकते हैं और वे अपने प्यार के सहारे अपने आवेगों से ऊपर उठ सकते हैं, अपनी पवित्रता बनाए रख सकते हैं. मैं यहां एक बात साफ कर देना चाहता हूं कि जब मैंने कहा था की प्यार इंसानी कमजोरी है, तो ये एक साधारण आदमी के लिए नहीं कहा था, जिस स्तर पर कि आम आदमी होते हैं. वे एक अत्यंत आदर्श स्थिति है, जहां मनुष्य प्यार-घृणा आदि के आवेगों पर काबू पा लेगा, जब मनुष्य अपने कार्यों का आधार आत्मा के निर्देश को बना लेगा, लेकिन आधुनिक समय में ये कोई बुराई नहीं है, बल्कि मनुष्य के लिए अच्छा और लाभदायक है. मैंने एक आदमी के एक आदमी से प्यार की निंदा की है, पर वह भी एक आदर्श स्तर पर है. इसके होते हुए भी मनुष्य में प्यार की गहरी भावना होनी चाहिए, जिसे की वह एक ही आदमी में सिमित न कर दे बल्कि विश्वमय रखे.

मैं सोचता हूं, मैंने अपनी स्थिति अब साफ कर दी है. एक बात मैं तुम्हें बताना चाहता हूं की क्रांतिकारी विचारों के होते हुए हम नैतिकता के सम्बन्ध में आर्यसमाजी ढंग की कट्टर धारणा नहीं अपना सकते. हम बढ़-चढ़ कर बात कर सकते हैं और इसे आसानी से छिपा सकते हैं, पर असल जिंदगी में हम थर-थर कांपना शुरू कर देते हैं.

भगत सिंह ने चिट्ठी में सुखदेव को दिए कुछ सुझाव

मैं तुम्हे कहूंगा की ये छोड़ दो. क्या मैं अपने मन में बिना किसी गलत अंदाज के गहरी नम्रता के साथ निवेदन कर सकता हूं की तुममे जो अति आदर्शवाद है, उसे जरा कम कर दो. और उनकी तरह से तीखे न रहो, जो पीछे रहेंगे और मेरे जैसी बिमारी का शिकार होंगे. उनकी भर्त्सना कर उनके दुखों-तकलीफों को न बढ़ाना. उन्हें तुम्हारी सहानभूति की आवशयकता है.

क्या मैं ये आशा कर सकता हूं कि किसी खास व्यक्ति से द्वेष रखे बिना तुम उनके साथ हमदर्दी करोगे, जिन्हें इसकी सबसे अधिक जरूरत है? लेकिन तुम तब तक इन बातों को नहीं समझ सकते जब तक तुम स्वयं उस चीज का शिकार न बनो. मैं यह सब क्यों लिख रहा हूं? मैं बिल्कुल स्पष्ट होना चाहता था. मैंने अपना दिल साफ कर दिया है.

तुम्हारी हर सफलता और प्रसन्न जीवन की कामना सहित,

तुम्हारा भाई भगत सिंह

(1929)

(साभार न्यूज18)

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