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उत्कल एक्सप्रेस हादसा: लापरवाही की पटरी पर 'डीरेल' होती संवेदनशीलता

रेलमंत्री सुरेश प्रभु को विरासत में वही ट्रेन और पटरियां मिले हैं जो पिछले सत्तर साल में दुर्घटनाओं की तारीखों में दर्ज हैं

Updated On: Aug 21, 2017 10:54 PM IST

Kinshuk Praval Kinshuk Praval

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उत्कल एक्सप्रेस हादसा: लापरवाही की पटरी पर 'डीरेल' होती संवेदनशीलता

रेल दुर्घटनाओं की त्रासदी एक सी ही होती हैं. मातमी मंजर में लिपटी इन तस्वीरों में क्रंदन और कराह एक सी होती है बस वक्त और तारीखें बदल जाती हैं.

ट्रेन से पटरी के उतरने की वजह को रेलवे की तकनीकी भाषा के शब्दकोश में मानवीय भूल कहा जाता है लेकिन रेलवे की गंभीर लापरवाही दरअसल शून्य हो चुकी संवेदना है. लापरवाही और संवेदनहीनता का सबसे बड़ा सबूत उत्कल एक्सप्रेस की दुर्घटना है. आखिर रेलवे को मानना ही पड़ गया कि ये कर्मचारियों की लापरवाही का मामला है.

लेकिन क्या इसे सिर्फ लापरवाही मान कर भूला जा सकता है? किसी की लापरवाही की वजह से जान चली जाए क्या तब भी वो सिर्फ लापरवाही के दायरे में ही अपराध रहेगा या फिर अपराध भी नहीं माना जाएगा?

पुरी और हरिद्वार देश के बड़े तीर्थस्थल माने जाते हैं. तीर्थयात्रियों की सुगमता के लिये इन दो तीर्थ स्थानों को रेल से जोड़ा गया. लेकिन उत्कल एक्सप्रेस पर सवार तीर्थयात्रियों के लिये ये हादसा कभी न भूलने वाला साबित हुआ. ट्रेन की बोगियां पटरी से उतरकर एक इंटर कालेज और ट्रैक किनारे बने घर में घुस गईं. 23 लोगों की मौत हो गई जबकि 156  से अधिक लोग घायल हुए. गैस कटर से डिब्बे काटकर लोगों को बाहर निकाला गया.

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दुर्घटनाग्रस्त कलिंगा-उत्कल एक्सप्रेस की एक बोगी को क्रेन की मदद से हटाया जा रहा है (फोटो: पीटीआई)

उत्कल एक्सप्रेस हादसे में हुईं इतनी मौतों का आखिर जिम्मेदार कौन है?  क्या सिर्फ दोषी रेलवे के अधिकारी या कर्मचारियों पर कार्रवाई जिंदगी के नुकसान की भरपाई कर सकेगी? आखिर एक यात्री की सुरक्षा के लिए रेलवे की जिम्मेदारियों की क्या सीमा तय होनी चाहिए?

हिंदी का सफर बन चुका है इंग्लिश का 'सफर'

एक यात्री रेलवे का टिकट खरीदता है. सुरक्षा और सुविधों के नाम पर टिकट की कीमत में बढ़ोतरी हो तो विरोध भी दर्ज नहीं करता क्योंकि उसके पास चारा दूसरा नहीं होता है. ट्रेन लेट हो तो भी शिकायत नहीं करता. ट्रेन में खाना न मिले या खराब भी मिले तो उस पर चुप ही रह जाता है.

उसे सिर्फ अपनी मंजिल तक पहुंचने का इंतजार होता है. हिंदी के सफर में अंग्रेजी के ‘सफर’ का वो आदी हो चुका है क्योंकि भारतीय रेल में कई पीढ़ियां गुजर चुकी हैं. डिब्बे में होने वाली परेशानियों पर वो खुद को दिलासा देता है कि रात भर की बात है या फिर दूरी ज्यादा है तो सोचता है कि एक दिन की बात है. अपने गंतव्य में पहुंचने के लिये हर किसी की कोई न कोई मजबूरी या फिर जरूरी वजह होती है. वो एक भरोसे के साथ रेलवे के डिब्बे में सवार होता है. अपनों को फोन पर रास्ते भर बताता भी रहता है कि वो कहां पहुंचा और कब पहुंचने वाला है.

अचानक ही उसका फोन या तो स्विच ऑफ हो जाता है या फिर उस पर घंटी बजती रहती है और कोई फोन उठाता नहीं. परिवार वालों के दिमाग में आशंकाओं के बीच कई कयास भी चलते हैं. इसी बीच एक खबर आती है कि पटरी से ट्रेन उतर कर दुर्घटनाग्रस्त हो गई जिससे कुछ यात्रियों की मौत हो गई.

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क्या ये इन ‘कुछ यात्रियों’ की मौत की खबर रेलवे के लिये दुर्घटना को बड़ा या छोटा बनाने का काम करती हैं?

ये खबरें आजादी के बाद से ही रेलवे के सफर का हिस्सा रही हैं. कभी रेल हादसों से दुखी हो कर तत्कालीन रेल मंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने इस्तीफा दे दिया तो कभी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए नीतीश कुमार ने इस्तीफा दे दिया.

पहले हादसा हो जाए तो रेलमंत्री दे देते थे इस्तीफा

1956 में महबूबनगर रेल हादसे में 112 लोगों की मौत हुई थी. हादसे ने तत्कालीन रेल मंत्री लालबहादुर शास्त्री को इतना भावुक किया कि उन्होंने नैतिक आधार पर इस्तीफा दे दिया. लेकिन उसे तत्कालीन पीएम जवाहर लाल नेहरू ने स्वीकार नहीं किया. तीन महीने बाद ही तमिलनाडु के अरियालूर में रेल दुर्घटना में 114 लोगों की मौत हो गई.

जिसके बाद शास्त्री जी ने इस्तीफा दे दिया क्योंकि वो चाहते थे कि उनका इस्तीफा एक नजीर बने. साल 1999 में गैसाल में हुई रेल दुर्घटना में 200 लोगों की मौत हो गई थी. जिसके बाद तत्कालीन रेल मंत्री नीतीश कुमार ने भी इस्तीफा दे दिया था.

इस्तीफा सिर्फ नजीर हो सकता है लेकिन समस्या का निदान नहीं. इस बार हादसे के बाद रेलवे ने जिम्मेदार कर्मचारियों को सस्पेंड कर दिया तो कुछ का ट्रांसफर कर दिया. लेकिन आज भी सवाल इस्तीफे या फिर निलंबन की कार्रवाई का नहीं है. सवाल उन जिंदगियों का है जो हादसे का शिकार हुईं. क्या सिर्फ मुआवज़ा ही उसकी भरपाई है या फिर एक कठोर सजा की कमी लगातार दिखाई देती है जिसकी कमी से रेलवे में मानवीय भूल का सिलसिला जारी है.

रेलवे ट्रैक से बाहर निकल कर शहरों-कस्बों की सड़कों का रुख किया जाए. शहरों की सड़कों पर होने वाली दुर्घटनाओं के दोषियों के लिये कई कानून हैं. सड़क दुर्घटना के मामले में गैर इरादतन हत्या का मामला तक दर्ज होता है. बॉलीवुड के स्टार सलमान खान से बेहतर कोई नहीं समझ सकता कि रसूख के बावजूद सड़क पर हादसे के क्या क्या नतीजे भुगतने पड़ते हैं.

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मोटर व्हीकल एक्ट से लेकर कानून की कई धाराएं दोषी होने पर जेल भेजने का काम करती हैं. इस डर की वजह से सड़क पर एक अनुशासन बना रहता है. हालांकि दुर्घटनाएं बता कर नहीं आतीं या होती हैं. लेकिन दोषी व्यक्ति के लिए सजा का प्रावधान है. अवचेतन में एक संशय सावधानी का बल्ब जलाए रखता है.

अब पल्ला झाड़ने से बाज नहीं आते नेता

रेलवे में इसके उलट जिम्मेदारी से ही पल्ला झाड़ लिया जाता है. अगर मानवीय भूल का मामला सामने आता है तो जांच कमेटी बना दी जाती है. लेकिन उसके बाद जांच रिपोर्ट का अगली दुर्घटना तक इंतजार होता रहता है. पिछले साल कानपुर में हुई रेल दुर्घटना में 150 लोगों की जान गई थी. अब तक रेल हादसे की जांच रिपोर्ट सामने नहीं आई और उत्कल एक्सप्रेस की नई दुर्घटना सामने है.

रेलवे में दुर्घटनाओं की एक बड़ी वजह ये भी है कि सेफ्टी पर जोर नहीं है. जबकि छह साल पहले साल 2011 में रेलवे की सेफ्टी को लेकर ही तत्कालीन रेलमंत्री दिनेश त्रिवेदी ने डॉ अनिल काकोदकर की अध्यक्षता में कमेटी का गठन किया था.

काकोदकर कमेटी की रिपोर्ट में रेलवे सेफ्टी अथॉरिटी के गठन का सुझाव दिया गया था. साथ ही रेलवे रिसर्च एंड डेवलपमेंट काउंसिल बनाने और सुरक्षा स्टॉफ की कमी दूर करने का भी सुझाव दिया था. सूत्रों के मुताबिक सेफ्टी से जुड़े एक लाख 24 हजार से ज्यादा पद खाली पड़े हैं.

काकदोकर कमिटी से पहले साल 1962 में कुंजरू कमेटी, 1968 में बांचू समिति, 1978 में सीकरी समिति, 1998 में खन्ना समिति ने भी रेल में सुधार और यात्रियों की सुरक्षा के लिये कई सुझाव दिये थे. लेकिन बढ़ते रेल नेटवर्क के दायरे की रफ्तार में सेफ्टी के ‘स्टेशन’ पीछे छूटते चले गए.

उत्कल एक्सप्रेस भी ढाई मीटर कटी लाइन का शिकार हुई. पिछले दो दिनों से इस ट्रैक पर पटरियों की मरम्मत का काम चल रहा था. पास में मौजूद औजारों ने रेल कर्मचारियों की लापरवाही को तस्दीक किया. इस ट्रैक से ट्रेन को कम स्पीड में निकलना था लेकिन पुरी एक्सप्रेस को कॉशन नहीं दिया गया. इससे साफ है कि रेलवे के कर्मचारी दुर्घटना को लेकर इतने संवेदनहीन हो चुके हैं कि वो अपनी ड्यूटी की गंभीरता तक भूल चुके हैं.

पिछले पांच साल में 586 रेल दुर्घटनाएं हो चुकी हैं. एक साल में 104 दुर्घटनाओं में 66 हादसों में रेल कर्मचारियों की लापरवाही सामने आई. वहीं एक अप्रैल से 30 जून तक 11 हादसों में से 8 में रेलकर्मियों की गलती सामने आई.

हादसों की लेनी होगी सामूहिक जिम्मेदारी

हालांकि हाल की कुछ दुर्घटनाओं में रेलवे ने पल्ला झाड़ने की भी कोशिश की है. हादसों के लिये कभी पटरियों से छेड़छाड तो आतंकी साजिश को भी जिम्मेदारी बताया. जबकि माना जाता है नियमों की अनदेखी की वजह से कई हादसे होते हैं. ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि रेलवे की लापरवाही से होने वाली मौतों को सामूहिक हत्या क्यों न माना जाए?

Kuneru: Rapid action force team performs rescue operations after Hirakhand Express had an accident near Kuneru station in Vizianagaram, Andra Pradesh on Sunday. PTI Photo(PTI1_22_2017_000019B)

रेल की सुरक्षा की जिम्मेदारी को किसी एक सरकार या फिर मंत्री तक सीमित कर सिर्फ हंगामा बरपाने से कुछ नहीं होगा. रेलमंत्री सुरेश प्रभु को भी विरासत में वही ट्रेन, वही पटरियां, वही पुल और डिब्बे मिले हैं जो पिछले सत्तर साल में दुर्घटनाओं की तारीखों में दर्ज हैं.

जैसे सेना के जवानों के भीतर देश की सुरक्षा का जज्बा होता है ठीक वही जज्बा रेलवे के कर्मचारियों के भीतर यात्रियों की सुरक्षा के लिये पैदा होने की जरूरत है क्योंकि सिर्फ एक रेलमंत्री एशिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्क में होने वाली जिम्मेदारी के नाम पर कब तक जिम्मेदार ठहराया जाएगा?

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