S M L

धारा 377 पर फैसला: अब गे मैरिज, समलैंगिकों में उत्तराधिकार और बच्चा गोद लेने के कानून पर क्या रुख होगा?

सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले के बाद अब दूसरे चरण में गे मैरिज, समलैंगिकों के लिए बच्चा गोद लेने और उत्तराधिकारी चुनने का हक दिलाने की मांग उठेगी

Updated On: Sep 07, 2018 05:58 PM IST

Markandey Katju

0
धारा 377 पर फैसला: अब गे मैरिज, समलैंगिकों में उत्तराधिकार और बच्चा गोद लेने के कानून पर क्या रुख होगा?
Loading...

देश में समलैंगिकता को अपराध नहीं माना जाएगा. सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले के बाद अब दूसरे चरण में गे मैरिज, समलैंगिकों के लिए बच्चा गोद लेने और उत्तराधिकारी चुनने का हक दिलाने की मांग उठेगी.

हालांकि ये मांगे सिर्फ कानून के जरिए ही पूरी हो सकती है. विधायिका कानून बनाकर इन मांगों को पूरा कर सकती हैं लेकिन वर्तमान हालात में ऐसा होगा, ये कह पाना मुश्किल है. लोकतंत्र में नेताओं के बहुसंख्य आबादी की सोच का ख्याल रखना पड़ता है. भारतीय समाज में ज्यादातर संकीर्ण सोच के लोग हैं और इस तरह की मांग के बेहद खिलाफ हैं.

कोई भी नेता इस मसले में खुलकर समर्थन करने के लिए आगे नहीं आएगा, क्योंकि उन्हें डर है कि ऐसी मांगों का समर्थन करने पर वो चुनाव हार सकते हैं. यहां तक की भारत में बहुत से लोग गे सेक्स के भी खिलाफ हैं. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने आर्टिकल ने 14 (समानता का अधिकार) और आर्टीकल 21 (जीने और स्वतंत्रता के अधिकार) की मदद से सेक्शन 377 को काफी हद खत्म कर दिया है.

लेकिन गे मैरिज, समलैंगिकों के लिए गोद लेने और वसीयत में उनको जगह दिए जाने की मांग सुप्रीम कोर्ट किसी प्रावधान को कमजोर कर पूरी नहीं कर सकता. इसके लिए विधायका के जरिए कानून बनाना होगा.

मौजूदा समय में भारत में विवाह धार्मिक समुदायों पर बने पर्सनल लॉ के आधार पर होते हैं. इसमें एक पुरुष और महिला के बीच विवाह की परिकल्पना की जाती है. हिंदू मैरिज एक्ट 1955 के सेक्शन 5(iii) में हिंदू विवाह को लेकर शर्तें रखी गई हैं, जिसके मुताबिक, दूल्हे की उम्र कम से कम 21 साल और दुल्हन की उम्र 18 साल होनी चाहिए. इसमें 'वर' और 'वधू' शब्द का मतलब है, जिसका मतलब है कि ऐसे विवाह हेट्रोसेक्सुएल मैरिज हैं. जिन्हें कानूनन मान्यता मिलती है.

सेक्शन 5 हिंदुओं, बौद्ध, जैन, सिख समेत हिंदू धर्म की दूसरी शाखाएं वीरशवा, लिंगायत, ब्रह्मा के अनुयायियों, आर्य समाज से जुड़े लोगों पर लागू होता है. इसमें साफतौर पर ये भी कहा गया है कि दो हिंदुओं के बीच शादी तभी संपन्न हो सकती है, जब इसके अंतर्गत आने वाली शर्तें पूरी हों. मुस्लिम लॉ भी अलग सेक्स के लोगों की शादी को अनुमति देता है. यहां तक इंटर रीलिजियस मैरिज (सिविल मैरिज) भी, जो स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 के दायरे में आते हैं, इसमें विवाह दो अलग-अलग सेक्स के बीच हो सकता है.

ऐसे में कानून में बदलाव के बिना गे मैरिज कैसे हो सकती है? और कानून में बदलाव करने का काम विधायिका का है न्यायपालिका का नहीं. हिंदुओं में उत्तराधिकारी चुनना हिंदू सक्सेशन एक्ट, 1956 के अंतर्गत आता है. इसके सेक्शन 8 में कहा गया है कि पति की मौत के बाद (अगर वसीयत न लिखी गई हो) उसकी संपत्ति पर पत्नी का हक होता है. ऐसे ही सेक्शन 15 में पत्नी की मौत के बाद उसकी संपत्ति पर पति का हक होता है. इसमें 'विधवा' और 'पति' शब्द का इस्तेमाल ये दर्शाता है कि विवाह एक पुरुष का महिला से हुआ है. ये सेम सेक्स रिलेशनशिप नहीं है.

वहीं बात अगर गोद लेने की जाए हिंदुओं और मुस्लिमों में तभी गोद लिया जा सकता है, जब उनकी शादी हो चुकी हो और इसमें भी पति या पत्नी में से कोई एक ही किसी बच्चे को गोद ले सकता है.

सुप्रीम कोर्ट के लिए गे सेक्स को वैध करार देना इसलिए भी आसान था, क्योंकि इसमें बदलाव सिर्फ सेक्शन 377 में ही करना था. लेकिन वो ऐसा क्या करेंगे कि गे मैरिज, समलैंगिकों के लिए गोद लेने और उन्हें उत्तराधिकारी चुनने के हक को कानूनी वैधता मिल पाए?

2016 में मशहूर Obergefell v. Hodges सिविल राइट केस में यूएस सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि अमेरिका के सभी 50 स्टेट्स में गे मैरिज को वो सभी अधिकार मिलने चाहिए जो कि हेट्रोसेक्सुएल मैरिज में किसी को मिलते हैं. लेकिन मुझे नहीं लगता कि सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया इतना बड़ा फैसला सुना सकता है. अमेरिका में लोगों ने इसका समर्थन किया था. लेकिन भारत में लोग इसका कड़ा विरोध कर रहे हैं.

साथ ही अमेरिका में कैलिफोर्निया जैसे कुछ राज्य पहले ही गे मैरिज को वैध करार दे चुके थे. ऐसे में यूएस सुप्रीम कोर्ट के लिए ये कहना आसान हो गया था कि अगर गे मैरिज को अन्य स्टेट्स में वैध करार नहीं किया गया तो इससे अमेरिकी संविधान में समानता के प्रावधान का उल्लंघन होगा. वहीं भारत के किसी भी राज्य में गे मैरिज की अनुमति नहीं है. इसलिए Obergefell v. Hodges सिविल राइट केस का भारत पर कोई असर पड़ेगा, ये कहना मुश्किल होगा.

(मार्कंडेय काटजू सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज हैं)

0
Loading...

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
फिल्म Bazaar और Kaashi का Filmy Postmortem

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi