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धारा 377 पर सुनवाई LIVE: SC में बहस जारी, नैचुरल है होमो सेक्सुएलिटी- मुकुल रोहतगी

सर्वोच्च अदालत ने दिसंबर 2013 में दिल्ली हाईकोर्ट के 2 जुलाई, 2009 के फैसले को बदलते हुए दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बनाए गए रिलेशनशिप को अपराध की श्रेणी में डाल दिया था.

| July 10, 2018, 02:16 PM IST

FP Staff

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हाइलाइट

Jul 10, 2018

  • 16:24(IST)

    एनडीआरएफ, कोस्ट गार्ड यात्रियों को बचाने पहुंचे. वेस्टर्न रेलवे ने एक ट्वीट करके बताया कि उसने एनडीआरएफ की टीम को मदद के लिए बुलाया है. यह टीम नालासोपारा और विरार के बीच ट्रेन में फंसे यात्रियों को बचाने के काम में जुट गए हैं. 

  • 16:18(IST)

    आज की सुनवाई खत्म हुई. 

  • 15:11(IST)

    जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, धारा 21 के तहत पार्टनर चुनने का अधिकार है. 

  • 14:57(IST)

    पूर्व अटॉर्नी जनरल ने मुकुल रोहतगी ने तर्क दिया, 'सेक्शन-377 के होने से एलजीबीटी समुदाय अपने आप को अघोषित अपराधी महसूस करता है. समाज भी इन्हें अलग नजर से देखता है. इन्हें संवैधानिक प्रावधानों से सुरक्षित महसूस करना चाहिए.'

  • 13:26(IST)

    एडिशनल सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, 'यह केस धारा 377 तक सीमित रहना चाहिए. इसका उत्तराधिकार, शादी और संभोग के मामलों पर कोई असर नहीं पड़ना चाहिए'

  • 13:24(IST)

    केंद्र सरकार का प्रतिनिधित्व करने वाले एडिश्नल सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, 'मैं इस मुद्दे पर बहस करने की प्रक्रिया में हूं, यह (धारा 377) कानून का सवाल है'

  • 13:16(IST)
  • 12:22(IST)

    याचिकाकर्ताओं में से एक के तरफ से कोर्ट में उपस्थित होते हुए मुकुल रोहतगी ने कहा, 'धारा 377 किसी के मानवाधिकारों का उल्लंघन है. यह मुद्दा केवल यौन अनुकूलन से संबंधित है और इसका लिंग से कोई लेना-देना नहीं है. जैसे-जैसे समाज बदलता है, मूल्य बदलते हैं, हम कह सकते हैं कि 160 साल पहले जो नैतिक था, वो अब नैतिक नहीं हो सकता है'

  • 12:13(IST)

    हमें लगता है कि इस बार हमारे लिए अच्छा होगा. अगर कानून हर किसी को कुछ सुविधा देता है तो ये हमारे लिए अलग क्यों है. हम लोग जिस तरह से हैं वो गैर प्राकृतिक नहीं है- एलजीबीटी समुदाय की सदस्य जया

  • 12:09(IST)

    राज्यसभा सांसद और बीजेपी नेता ने सुनवाई से पहले कहा है कि ये नॉर्मल चीज नहीं है. हमें इस पर जश्न नहीं मनाना चाहिए. ये हिंदुत्व के खिलाफ है. हमें मेडिकल रिसर्च करना चाहिए कि ये बीमारी किस तरह से ठीक हो.

  • 12:05(IST)
  • 12:05(IST)

    सामाजिक कार्यकर्ता, एलजीबीटी समुदाय के अधिकारों के लिए लड़ने वाले और एनजीओ आज की सुनवाई पर नजर बनाए हुए हैं. लोगों ने सोशल मीडिया में इस बारे में पोस्ट करना शुरू कर दिया है.

  • 12:03(IST)

    केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि इस मामले में सरकार को अपना जवाब दाखिल करना है. केंद्र का हलफनामा इस केस में महत्वपूर्ण हो सकता है. इसलिए केस को चार हफ्ते के लिए टाला जाए. मुख्य न्यायाधीश ने केंद्र से कहा कि मंगलवार को याचिकाकर्ता बहस करेंगे.

  • 12:02(IST)

    समलैंगिकता को अपराध  मानने वाली IPC की धारा 377 को अंसवैधानिक करार देने की मांग करने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में पांच जजों की संविधान पीठ में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस रोहिंग्टन आर नरीमन, जस्टिस ए एम खानविलकर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड और जस्टिस इंदू मल्होत्रा का संविधान पीठ शामिल है. इससे पहले सुप्रीम कोर्ट केंद्र को नोटिस जारी कर जवाब मांग चुका है.

धारा 377 पर सुनवाई LIVE: SC में बहस जारी, नैचुरल है होमो सेक्सुएलिटी- मुकुल रोहतगी
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सुप्रीम कोर्ट में 5 जजों की संवैधानिक बेंच आज यानी मंगलवार से समलैंगिकता (होमो सेक्सुअलिटी) को अपराध ठहराने वाली भारतीय दंड धारा (आईपीसी) की सेक्शन-377 पर सुनवाई करेगी.

सर्वोच्च अदालत ने दिसंबर 2013 में दिल्ली हाईकोर्ट के 2 जुलाई, 2009 के फैसले को बदलते हुए दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बनाए गए रिलेशनशिप को अपराध की श्रेणी में डाल दिया था.

सुप्रीम कोर्ट ने 8 जनवरी को समलैंगिकता मामले को 5 जजों की संविधान पीठ को सौंपा था. समलैंगिकता को अपराध मानने वाली आईपीसी की धारा- 377 को लेकर दायर हुई याचिकाओं की सुनवाई करने जा रही जजों की इस बेंच में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) दीपक मिश्रा, जस्टिस रोहिंग्टन आर नरीमन, जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदू मल्होत्रा शामिल हैं.

नाज फाउंडेशन समेत कई लोगों द्वारा दायर याचिकाओं में 2013 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई है. सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी में कहा था कि ऐसे लोग जो अपनी मर्जी से जिंदगी जीना चाहते हैं, उन्हें कभी भी डर की स्थिति में नहीं रहना चाहिए. स्वभाव का कोई तय पैमाना नहीं है. उम्र के साथ नैतिकता बदलती है.

दिल्ली हाईकोर्ट ने दो वयस्कों के बीच समलैंगिकता को वैध करार दिया था. हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि 149 वर्षीय कानून ने इसे अपराध बना दिया था, जो मौलिक अधिकारों का उल्लंघन था.

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