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दिल्ली सीलिंग: मास्टर प्लान ने बढ़ाई व्यापारियों की मुसीबत, DDA की शक्तियां समस्या में बड़ी बाधा

लोगों ने आवासीय संपत्तियों को वाणिज्यिक संपत्तियों में बदलने के लिए लाखों रुपए का भुगतान किया है, लेकिन दिल्ली के सरकारी विभागों ने कानून में ऐसी कसर छोड़ दी है, जिसके बहाने वो व्यापारियों का लगातार उत्पीड़न करते रहते हैं

Updated On: Aug 27, 2018 01:23 PM IST

Pallavi Rebbapragada Pallavi Rebbapragada

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दिल्ली सीलिंग: मास्टर प्लान ने बढ़ाई व्यापारियों की मुसीबत, DDA की शक्तियां समस्या में बड़ी बाधा

दिल्ली के विश्वास नगर इलाके की भीम गली अब इतनी तंग हो चुकी है कि यहां से गाड़ियों का गुजरना लगभग नामुमकिन हो गया है. उत्तर पूर्व दिल्ली के आखिरी छोर पर स्थित यह इलाका बेहद घना है. कभी यह इलाका पूरी तरह से रिहाइशी क्षेत्र (रेजीडेंशियल एरिया) हुआ करता था, लेकिन अब यहां कतार से मिठाइयों की दुकानें नजर आती हैं. यहां कई छोटी और मझोली फैक्ट्रियां भी हैं. ज्यादातर फैक्ट्रियां बेसमेंट में बनाई गई हैं. जबकि वर्ष 2010 में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स से पहले डेमोलिशन का शिकार होकर इलाके की कई फैक्ट्रियां उत्तर पश्चिमी दिल्ली के उपनगर बवाना में शिफ्ट हो गईं थीं. विश्वास नगर की स्मॉल स्केल मैन्युफेक्चरिंग एंड ट्रेडर्स एसोसिएशन ने नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल (एनजीटी) से कहा था कि, इस इलाके के 70 फीसदी से ज्यादा भूखंडों (प्लॉट) में व्यावसायिक और औद्योगिक उत्पादन का काम होता है. लिहाजा दिल्ली सरकार द्वारा किए गए सर्वे के मुताबिक विश्वास नगर को औद्योगिक क्षेत्र घोषित किया जा सकता है.

इस हफ्ते विश्वास नगर में उस वक्त तूफान खड़ा हो गया जब पूर्वी दिल्ली नगर निगम ने प्रदूषण फैलाने वाली 70 औद्योगिक इकाइयों (इंडस्ट्रियल यूनिट) को सील कर दिया. फैक्ट्रियों की सीलिंग से इलाके के कारोबारियों में खासा रोष है. लिहाजा फ़र्स्टपोस्ट ने ग्राउंड जीरो पर जाकर मामले की पड़ताल की और दिल्ली की प्रशासनिक एजेंसियों, सुप्रीम कोर्ट और सिविल सोसाइटी के समीकरण और उनके बीच चल रही खींचतान को समझने की कोशिश की. फ़र्स्टपोस्ट ने यह भी पता लगाने की कोशिश की कि आखिर वो कौन से कारण हैं जिनके चलते दिल्ली में बीते एक दशक में इलाके के हजारों छोटे-बड़े व्यापारिक प्रतिष्ठान सीलिंग की भेंट चढ़ गए. इनमें से करीब 6000 फैक्ट्रियां और दुकानें तो बीते एक साल में ही सीलिंग की शिकार हुई हैं.

कुछ खास इलाकों पर सीलिंग का खतरा सबसे ज्यादा मंडराता है

दिल्ली के कुछ खास इलाकों पर सीलिंग का खतरा सबसे ज्यादा मंडराता है. इनमें सदर बाजार, चांदनी चौक, चावड़ी बाजार, लाजपत नगर और करोल बाग शामिल हैं. सदर बाजार दिल्ली में घरेलू सामानों का थोक का सबसे बड़ा बाजार है. वहीं चांदनी चौक पुरानी दिल्ली में खाने-पीने के सामान और कपड़ों का बाजार है. चावड़ी बाजार भी भीड़भाड़ वाली पुरानी दिल्ली में ही स्थित है. चावड़ी बाजार पीतल, तांबे और कागज के खास उत्पादों का थोक बाजार है. जबकि लाजपत नगर दक्षिण दिल्ली की रिहाइशी कॉलोनियों के बीच बना एक लोकप्रिय वाणिज्यिक बाजार (कमर्शियल मार्केट) है. वहीं करोल बाग पश्चिम दिल्ली में रिहाइशी/वाणिज्यिक बाजार (रेजीडेंशियल/कमर्शियल मार्केट) है.

आवासीय संपत्तियों का दुरुपयोग कर के उसमें वाणिज्यिक प्रतिष्ठान चलाने के आरोप में पूर्वी दिल्ली नगर निगम (ईडीएमसी) विश्वास नगर में संपत्तियों को सील कर रहा है. डीएमसी एक्ट, 2000 के तहत ईडीएमसी ने इलाके के कई वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों को नोटिस जारी किए हैं. विश्वास नगर मैन्युफेक्चरर्स एंड ट्रेडर्स एसोसिएशन के एक सदस्य के मुताबिक, 'अगर विश्वास नगर इलाके की फैक्ट्रियां सील की गईं तो यहां काम करने वाले 1 लाख से ज्यादा लोग बेरोजगार हो जाएंगे. साल 2010 में कॉमनवेल्थ गेम्स से पहले चले डेमोलिशन अभियान के दौरान कुछ फैक्ट्रियों को बवाना स्थानांतरित (ट्रांसफर) कर दिया गया था. लेकिन वो इलाका भी औद्योगिक क्षेत्र के मानकों पर खरा नहीं उतरता है. बवाना में औद्योगिक क्षेत्र सिर्फ 69 फीसदी है, जोकि एक इंडस्ट्रियल जोन के लिए अनिवार्य क्षेत्रफल से एक फीसदी कम है.'

विश्वास नगर के एक बेसमेंट में बर्तन बनाने की फैक्ट्री चलाने वाले रंगलाल का कहना है कि, नगर निगम ने उनकी फैक्ट्री पर सीलिंग की चेतावनी वाला नोटिस चस्पा किया था. लिहाजा उन्होंने 15 दिन पहले ही फैक्ट्री बंद कर के जगह खाली कर दी थी. रंगलाल के मुताबिक, सभी जरूरी कार्रवाई पूरी करने के बाद उन्होंने सभी कागजात ईडीएमसी को भी सौंप दिए थे. लेकिन इसके बावजूद उनकी  फैक्ट्री को सील कर दिया गया.

सीलिंग अभियान की मार सबसे ज्यादा विश्वास नगर पर पड़ी है

पिछले दिनों विश्वास नगर में प्रदूषण फैलाने वाली 70 औद्योगिक इकाइयों को सील कर दिया गया था

इस हफ्ते विश्वास नगर में उस वक्त तूफान खड़ा हो गया जब पूर्वी दिल्ली नगर निगम ने प्रदूषण फैलाने वाली 70 औद्योगिक इकाइयों (इंडस्ट्रियल यूनिट) को सील कर दिया

राष्ट्रीय राजधानी ने कारोबारियों की किस्मत कैसे की सील

दिल्ली में सीलिंग की कहानी साल 1985 में शुरू हुई. उस वक्त पर्यावरणविद एमसी मेहता ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी. उस याचिका में कहा गया था कि, राष्ट्रीय राजधानी के कई रिहाइशी इलाकों को वाणिज्यिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है, जहां कई तरह की अवैध गतिविधियां हो रही हैं. दिल्ली में घरों के नीचे दुकानों का होना अब असामान्य बात नहीं है. वो चाहे दिल्ली का दिल यानी कनॉट प्लेस हो, सिविल लाइंस हो, पूर्व दिल्ली का लक्ष्मी नगर हो या उत्तरी दिल्ली का मुखर्जी नगर हो, हर जगह घरों के नीचे बनी दुकानें नजर आ जाती हैं. साल 2004 में सुप्रीम कोर्ट ने आवासीय परिसर के दुरुपयोग संबंधी मानदंडों के उल्लंघन को लेकर एक निगरानी समिति की स्थापना की थी. साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि, अगर रिहाइशी संपत्तियों का दुरुपयोग बंद नहीं किया गया, तो सीलिंग की प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी.

सुप्रीम कोर्ट के इस बयान के बाद दिल्ली में व्यापारियों ने बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन किए. इन प्रदर्शनों में 4 लोगों को अपनी जान तक गंवाना पड़ी. व्यापारियों के जबरदस्त विरोध के चलते सरकार ने अदालत के आदेश में टालमटोल की और उसे दांव-पेंच में फंसाने का प्रयास किया. उस समय दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए), जो केंद्रीय निकाय है, ने दिल्ली मास्टर प्लान 2001 में मिश्रित भूमि उपयोग (मिक्स्ड लैंड यूज) वाले अध्याय में संशोधन किया. जिसके तहत मिश्रित उपयोग वाली सड़कों और गलियों को अब यातायात और पार्किंग के आधार पर पहचाना जाना था. पहचान के आधार पर आवासीय भूखंडों में ग्राउंड फ्लोर पर मिश्रित उपयोग की इजाजत दी गई थी. वहीं खुदरा दुकानों (रिटेल शॉप) के मिश्रित उपयोग के संबंध में ग्राउंड फ्लोर के अधिकतम स्वीकार्य क्षेत्र तक इस्तेमाल की इजाजत थी. आखिर में, सरकारी प्लॉटिंग द्वारा विकसित हुए इलाकों के भूखंडों के 25 फीसदी क्षेत्रफल और एक मंजिल तक में पेशेवर गतिविधियों की अनुमति दे दी गई. सरकार ने 19 मई को दिल्ली लॉ (स्पेशल प्रोविजन) बिल, 2006 अधिसूचित किया. यह विधेयक मिश्रित भूमि उपयोग (मिक्स्ड लैंड यूज) पर यथा स्थिति की पुर्नबहाली के लिए लाया गया था. इससे मास्टर प्लान की पुष्टि नहीं होती थी और न ही इसमें स्वीकृत योजना के परे जाकर निर्माण कार्य कराने को लेकर स्पष्ट संकेत थे. इस बिल ने व्यापारियों को एक साल तक सीलिंग से राहत प्रदान की. इसके बाद सरकार की आगे की अधिसूचनाओं में कहा गया कि, यह अधिनियम दिसंबर 2017 तक प्रभावी होगा.

15 दिसंबर, 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने निगरानी समिति की शक्तियों को पुनर्जीवित किया. इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली मास्टर प्लान में प्रस्तावित संशोधनों के अपने प्रतिरोध को भी जारी रखा. दरअसल दिल्ली मास्टर प्लान को पहली बार 1962 में तैयार किया गया था. लेकिन 1982 में मास्टर प्लान 2001 के रूप में इसे संशोधित किया गया. बाद में 2007 में भी इसमें संशोधन हुआ और आज यह मास्टर प्लान 2021 के रूप में कार्य करता है. सुप्रीम कोर्ट ने जो निगरानी समिति गठित की थी उसका काम रिहाइशी परिसरों के वाणिज्यिक उपयोग से संबंधित कानून के कार्यान्वयन की निगरानी करना है. इस निगरानी समिति में चुनाव आयुक्त के पूर्व सलाहकार केजे राव, ईपीसीए के चेयरमैन भूरे लाल और रिटायर्ड मेजर जनरल सोम झिंगन शामिल हैं. इस समिति को कानून का उल्लंघन करने वाले किसी भी परिसर को सील करने का अधिकार है. दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) के अधिकारियों ने अगर अपने विवेकाधिकार पर किसी परिसर को सीलिंग से रोक दिया हो, तब भी यह समिति उसे सील कर सकती है.

प्रशासनिक एजेंसियों और कारोबारियों की जंग से दिल्ली पर लगा दाग

दिल्ली मास्टर प्लान में संशोधन ढाल बनकर स्थानीय व्यापारियों को सीलिंग से बचा सकता है. इनमें विशेष तौर पर फ्लोर एरिया अनुपात (एफएआर) की बढ़ोतरी शामिल है. यह बिल्डिंग की जमीन के आकार के मुकाबले उसके कुल  फ्लोर एरिया का अनुपात होता है. प्रस्तावित संशोधनों के अनुसार, डीडीए ने दुकान से जुड़े आवासीय भूखंडों या मिश्रित भूमि (मिक्स्ड लैंड) और परिसरों के लिए 350 के फ्लोर एरिया अनुपात (एफएआर) को मंजूरी दी है. अन्य परिवर्तन व्यवसाय चलाने के लिए बेसमेंट के उपयोग और रूपांतरण शुल्कों (कन्वर्जन चार्जेंस) को तर्कसंगत बनाने के लिए होंगे. संशोधित मास्टर प्लान में वाणिज्यिक और मिश्रित उपयोग के लिए 351 मिश्रित सड़कों को अधिसूचित करने का प्रस्ताव भी है. संशोधन में आवासीय क्षेत्रों में घरेलू/गैर-प्रदूषण सेवा उद्योगों में 5 किलोवाट से 11 किलोवाट तक बिजली भार बढ़ाने का प्रावधान और गैर-अनुरूप क्षेत्रों में गोदाम बनाने की अनुमति, इलाके के सर्कल रेट के मुताबिक शुल्क के निर्धारण के प्रावधान शामिल हैं.

Delhi Sealing Notice

रेजीडेंशियल इलाकों में स्थित कमर्शियल प्रतिष्ठानों पर एमसीडी का सीलिंग के लिए लगाया गया नोटिस. पिछले 7 महीने में 6000 प्रतिष्ठानों को सील किया गया है

मास्टर प्लान में हुए संशोधन से प्रशासनिक एजेंसियों और व्यापारियों पर पड़े प्रभाव को जानने के लिए फ़र्स्टपोस्ट ने दिल्ली और उसके आसपास के व्यापारिक संगठनों के प्रमुख सदस्यों से मुलाकात की. सुंदर नगर बाजार संघ के सदस्य अजय गुप्ता ने बताया कि, उनके इलाके को मास्टर प्लान में वाणिज्यिक क्षेत्र के रूप में अधिसूचित किया गया है. लेकिन इसके बावजूद वहां लगातार सीलिंग चल रही है. अजय गुप्ता ने आरोप लगाया कि, 'निगरानी समिति का कहना है कि हमने आपके इलाके को सील नहीं किया है, लेकिन एमसीडी बिना किसी नोटिस या सबूत के दुकानों को सील कर रही है. सुंदर नगर में अबतक 21-22 दुकानें सील की जा चुकी हैं. सुंदर नगर इलाका 50 के दशक में आबाद हुआ था. अपनी स्थापना के बाद से यह इलाका वाणिज्यिक क्षेत्र रहा है. लेकिन अब मिक्स्ड यूज लैंड के नियमों के उल्लंघन के आधार पर वहां सीलिंग की जा रही है. मैंने अपनी दुकान की सीलिंग खुलवाने के लिए मॉनिटरिंग कमेटी और एसडीएमसी में अर्जी दे रखी है. लेकिन मेरी अर्जी अभी तक लंबित पड़ी है.'

दिलचस्प बात यह है कि, दिल्ली नगर निगम अधिनियम 1957 में डेमोलिशन की सूचना देने या इमारत को गिराने को लेकर एक शर्त थी. जिसमें यह निर्दिष्ट किया गया था कि, संपत्ति करों के भुगतान के लिए उत्तरदायी कोई बिल्डिंग या बिल्डिंग का कोई हिस्सा जब डेमोलिश (ध्वस्त) किया जाता है या हटाया जाता है, तो निर्दिष्ट करों के भुगतान के लिए उत्तरदायी व्यक्ति को मुख्य रूप से कमिश्नर द्वारा लिखित में नोटिस भेजना जरूरी है. इस साल जनवरी में एनडीएमसी की स्थायी समिति ने एक प्रस्ताव पारित किया. जिसके तहत किसी इलाके में सीलिंग अभियान चलाने से पहले व्यापारियों को 48 घंटे का नोटिस देने की व्यवस्था की गई.

दुकानदारों, कारोबारियों और जमीन मालिकों को एहसास है कि उन्होंने कानून का उल्लंघन किया है

जब फ़र्स्टपोस्ट ने निगरानी समिति के सदस्य केजे राव से संपर्क किया, तो उन्होंने कहा कि, कौन सा कानून यह कहता है कि सरकारी भूमि पर अतिक्रमण और गैरकानूनी प्रतिष्ठानों को ढहाने के लिए किसी नोटिस की जरूरत है. केजे राव ने उदाहरण देते हुए बताया कि, दक्षिण दिल्ली की अमर कॉलोनी में कैसे एक ही दिन में 450 दुकानों को सील किया गया था. केजे राव के मुताबिक, सीलिंग की जद में आए सभी दुकानदारों, कारोबारियों और जमीन मालिकों को एहसास है कि उन्होंने कानून का उल्लंघन किया है.

कुछ व्यापारिक संगठनों का कहना है कि, उन्हें सीलिंग से संबंधित नोटिस मिले थे. वहीं कई व्यापारिक संगठनों ने सीलिंग से पहले किसी प्रकार की सूचना या नोटिस मिलने की बात से इनकार किया है. कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (सीएआईटी) के महासचिव प्रवीण खंडेलवाल ने फ़र्स्टपोस्ट से बातचीत में बताया कि, व्यापारिक संगठनों की मांग है कि, दिल्ली में कमर्शियल, मिक्स्ड लैंड यूज और रेजीडेंशियल क्षेत्रों को फिर से चिन्हित किया जाना चाहिए. ताकि भ्रम के बादल हटें और लोगों के दिल-ओ-दिमाग से सीलिंग का खौफ खत्म हो. मास्टर प्लान में शामिल होने और कमर्शियल स्टेटस के तहत आने के बावजूद दिल्ली के कई हिस्सों में सीलिंग का खतरा मंडरा रहा है. लेकिन कई मुद्दे स्पष्ट नहीं होने पर भी सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त निगरानी समिति धड़ाधड़ दुकानों की सीलिंग में जुटी है.

खंडेलवाल ने आगे कहा कि, एक सदी से भी पहले से दिल्ली के सभी विशेष इलाके वाणिज्यिक क्षेत्र हैं. वहां बेरोकटोक व्यापारिक गतिविधियां होती आ रही हैं. लेकिन अभी भी यहां सीलिंग और कन्वर्जन शुल्कों के खतरे का सामना करना पड़ रहा है. चावड़ी बाजार, सदर बाजार, खान बाजार और चांदनी चौक के नाम से ही साफ जाहिर हो जाता है कि यह व्यापारिक/वाणिज्यिक क्षेत्र हैं.

खंडेलवाल के मुताबिक, 'स्थानीय शॉपिंग सेंटर और सामुदायिक शॉपिंग सेंटर खुद वाणिज्यिक उपयोग कर रहे हैं. 1962 से अब तक एमसीडी ने दिल्ली में बड़ी संख्या में कमर्शियल और मिक्स्ड लैंड यूज क्षेत्रों की घोषणा की है. लेकिन फिर भी इन क्षेत्रों को कन्वर्जन शुल्क का भुगतान करने के लिए मजबूर किया गया है. वहीं यह क्षेत्र अभी भी सीलिंग के खतरे का सामना कर रहे हैं. यह सब कब खत्म होगा?'

Delhi Shops Sealing Lajpat Nagar

दक्षिण दिल्ली के मशहूर लाजपत नगर मार्केट के अमर कॉलोनी में 1000 से ज्यादा दुकानों को सील कर दिया गया है

उचित समाधान के लिए एक कार्यकारी समूह के गठन का सुझाव दिया 

खंडेलवाल ने बताया कि, सीलिंग की समस्या के उचित समाधान के लिए सीएआईटी ने केंद्रीय शहरी विकास मंत्री हरदीप सिंह पुरी को एक कार्यकारी समूह (वर्किंग ग्रुप) के गठन का सुझाव दिया है. जिसमें शहरी विकास मंत्रालय, दिल्ली सरकार, डीडीए, एमसीडी,  लैंड एंड डेवेलपमेंट ऑफिस (L&DO), दिल्ली पुलिस और अन्य संबंधित विभागों के अधिकारियों के साथ व्यापारिक संगठनों के प्रतिनिधियों को शामिल करने को कहा गया है.

खान मार्केट में 19 साल से ट्रेडर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष संजीव मेहरा ने इस बारे में एक कहानी सुनाई कि, कानूनों में संशय और अस्पष्टता किस तरह की होती है. मेहरा ने कहा, 'लोगों ने आवासीय संपत्तियों को वाणिज्यिक संपत्तियों में बदलने के लिए लाखों रुपए का भुगतान किया है, लेकिन दिल्ली के सरकारी विभागों ने कानून में ऐसी कसर छोड़ दी है, जिसके बहाने वो व्यापारियों का लगातार उत्पीड़न करते रहते हैं.'

सीलिंग के अलावा दिल्ली में कन्वर्जन शुल्क को लेकर भी भ्रम की स्थिति है. यह भ्रम पिछले कुछ महीनों में कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है. दरअसल साल 2017 में, डीडीए ने नगर निगम के अधिकारियों को निर्देश दिया था कि, वो दुकानदार से शपथ पत्र के साथ 22 हजार रुपए प्रति वर्गमीटर के हिसाब से कन्वर्जन शुल्क जमा करने को कहें. डीडीए की दर अधिसूचित होने से पहले, डिफेंस कॉलोनी में 89 हजार रुपए प्रति वर्गमीटर की दर से कन्वर्जन शुल्क न चुकाने पर सीलिंग की कार्रवाई हो चुकी थी.

मार्च 2018 में, डिफेंस कॉलोनी में सीलिंग से संबंधित एक याचिका पर सुनवाई करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने डीडीए से एक हलफनामा दाखिल करने के लिए कहा था. जिसमें निर्माण के लिए पर्यावरण मंजूरी, पानी और बिजली की आपूर्ति के प्रावधानों के बारे में बताने के लिए कहा गया था. सुप्रीम कोर्ट ने डीडीए से यह भी पूछा था कि, उसने किस आधार पर वन टाइम कन्वर्जन शुल्क को घटा दिया था. नियम में हुए नए संशोधन से उन व्यापारियों को राहत मिलेगी, जो 10 साल की अवधि के लिए कन्वर्जन शुल्क अदा कर चुके हैं. लेकिन व्यापारी अब इस बात से चिंतित हैं कि, क्या कन्वर्जन शुल्क के रूप में उनसे वसूली गई राशि को मार्केट कॉम्प्लेक्सों के रख-रखाव पर खर्च किया जाएगा या नहीं.

विशेषज्ञों ने दी मास्टर प्लान से परे सोचने की राय

एमसीडी द्वारा जारी सार्वजनिक नोटिस के अनुसार, मास्टर प्लान 2021 में मिक्स्ड यूज रेगुलेशन के तहत संशोधन किए गए हैं. डॉक्टर, वकील, वास्तुकार (आर्किटेक्ट), चार्टर्ड एकाउंटेंट, कंपनी सेक्रेटरी, कोस्ट एंड वर्क अकाउंटेंट, इंजीनियर, टाउन प्लानर, मीडिया प्रोफेशनल्स और डॉक्यूमेंटरी फिल्म मेकर्स जैसे व्यावसायिक कौशल रखने वाले लोगों को प्लॉटेड डेवलपमेंट और ग्रुप हाउसिंग की इजाजत होगी.

रोमी खोसला ने 1974 में दिल्ली में ग्रुप फॉर रूरल एंड अर्बन प्लानिंग (जीआरयूपी) की स्थापना की थी. उन्होंने कई बड़े संस्थागत परिसरों के साथ-साथ छोटे समुदाय आधारित ग्रामीण परियोजनाओं को डिजाइन किया है. उन्होंने समझाया कि, मास्टर प्लान में दी गईं कई सुविधाएं क्यों व्यर्थ हैं. रोमी खोसला के मुताबिक, 'ऐसे कई बड़े फ्लैट हैं जो पूरी तरह से दफ्तरों के तौर पर काम कर रहे हैं. नगर निगम के अधिकारी जब निरीक्षण के लिए आते हैं, तो वो दफ्तर बंद हो जाते हैं और गेट पर गार्ड खड़े रहते हैं. जब तक निगरानी विकेंद्रीकृत नहीं होती है, तब तक कानून का उल्लंघन यूं ही होता रहेगा. ऐसे शहर में जहां 60 फीसदी लोग अनधिकृत इलाकों में रहते हैं, वहां एक मास्टर प्लान से विकास कर पाना संभव नहीं हैं. इसके लिए तो प्रत्येक क्षेत्र को ध्यान में रखकर छोटी-छोटी कई विशिष्ट योजनाएं बनानी होंगी.'

 

दिल्ली विकास प्राधिकरण

दिल्ली विकास प्राधिकरण का दफ्तर

खोसला ने आगे कहा कि, 'शहरी नियोजन (अर्बन प्लानिंग) के लिए डीडीए अखबारों में विज्ञापन देकर या अपने दफ्तर के बाहर नोटिस लगाकर स्थानीय लोगों से सुझाव मांगती है. लेकिन डीडीए का यह तरीका अब कारगर नहीं रहा है. क्योंकि प्रत्येक क्षेत्र में पानी, जल निकासी और सड़कों की समस्याएं अलग-अलग होती हैं. जिन्हें डीडीए के प्लान में शामिल नहीं किया जाता है.' खोसला का यह भी कहना है कि, मास्टर प्लान में हर बार भूमि उपयोग बदल जाता है, वह चाहे कृषि से आवासीय हो या वाणिज्यिक. लेकिन इस प्रक्रिया में शहर की यादें मिट जाती हैं.

डीडीए एक केंद्रीय निकाय (सेंट्रल बॉडी) है. इसके पास असीमित शक्तियां हैं. डीडीए ने साल 2016 में राज्य सरकार को यह अधिकार दिया कि, वो राजधानी के किसी भी ग्रामीण (रूरल) इलाके को शहरी (अर्बन) इलाके में बदल सकती है. जिसके बाद दिल्ली सरकार ने दिल्ली भूमि सुधार अधिनियम (दिल्ली लैंड रिफॉर्म) एक्ट 1954 में संशोधन के लिए सुझाव आमंत्रित किए थे. दस्तावेजों से पता चलता है कि, गांवों और छोटे कस्बों से बड़ी तादाद में लोग शहरी इलाकों में पलायन कर रहे हैं. जिसके चलते बड़े शहरों पर बढ़ती आबादी का निरंतर दबाव बना हुआ है. लिहाजा आवास और गैर-कृषि गतिविधियों के लिए अन्य संरचनाओं की मांग पैदा हो रही है. लेकिन दिल्ली भूमि सुधार अधिनियम में इस मुद्दे का कोई जिक्र तक नहीं है. उसका उद्देश्य तो केवल कृषि था. इस अधिनियम की धारा 81/82 में कृषि और उससे जुड़ी गतिविधियों के अलावा अन्य प्रयोजनों के लिए भूमि के उपयोग पर जुर्माने का प्रावधान है. वहीं इसमें राज्य सरकार को कृषि भूमि को गैर-कृषि उपयोग में परिवर्तित करने की अनुमति भी मिली हुई है. अर्बन प्लानिंग की दिशा में मोहाला क्लिनिक एक विकेंद्रीकृत दृष्टिकोण की तरह नजर आता है. इसके जरिए जल निकासी (ड्रेनेज), अपशिष्ट प्रबंधन (वेस्ट मैनेजमेंट) और अग्नि सुरक्षा (फायर सेफ्टी) जैसे मुद्दों के बारे में लोगों की जागरूकता को बढ़ाया जा सकता है.

दस्तावेज के जरिए शहरी नियोजन की कई बारीक कमियों को भी उजागर किया

खोसला का मानना है कि, एक तरफ तो छोटे और मझोले व्यापारियों पर सीलिंग का डंडा चलाया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ बड़े आवासीय भूखंडों को मल्टी-स्टोरी बिल्डिंगों में बदलने की बेरोकटोक अनुमति मिल रही है. लिहाजा उनकी निगरानी की जानी चाहिए. क्योंकि वो अपने पड़ोस के लिए पानी और जल निकासी की समस्या खड़ी कर सकते हैं. खोसला के मुताबिक, 'मास्टर प्लान 2021 यह निर्धारित करता है कि, सभी भूखंडों का ग्राउंड फ्लोर पार्किंग के लिए उपयोग में लाया जाना चाहिए. वहीं अग्नि सुरक्षा मानकों (फायर रेगुलेशन) के चलते बिल्डिंग की ऊंचाई केवल 45 फीट हो सकती है. नतीजतन, फ्लैटों की ऊंचाई कम हो जाती है.' खोसला ने एक दस्तावेज के जरिए शहरी नियोजन (अर्बन प्लानिंग) की कई बारीक कमियों को भी उजागर किया.

संविधान के 74वें संशोधन में, 12वीं अनुसूची में उल्लेखित विषयों के लिए नगर पालिकाओं को जिम्मेदार बनाया जाना था. जिसमें अर्बन प्लानिंग, भूमि उपयोग (लैंड यूज), जल आपूर्ति, सड़कें, पुल, स्वास्थ्य, स्वच्छता और झोपड़पट्टियों में सुधार जैसे मुद्दे शामिल थे. अनुच्छेद 243S में संशोधन वार्ड समितियों के गठन के बारे में बताता है. जिसके मुताबिक, '3 लाख या उससे ज्यादा आबादी वाली सभी नगर पालिकाओं के भीतर एक या एक से अधिक वार्डों वाली वार्ड समितियां गठित की जाएंगी.' खोसला का मानना है कि, इस अधिनियम को दिल्ली में लागू किया जाना चाहिए. साथ ही स्थानीय समुदायों को क्षेत्र के इतिहास से परिचित कराया जाना चाहिए, जो कि आज अर्बन प्लानिंग की मांग का हिस्सा हो सकती है.

दिल्ली में जारी सीलिंग को लेकर व्यापारी सड़कों पर उतरते हैं

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद दिल्ली के कई इलाकों में सीलिंग की जा रही है

राजनीतिक पारिस्थितिक विज्ञानी (पॉलिटिकल इकोलॉजिस्ट) दुनू रॉय ने बताया कि, 'मास्टर प्लान शहर की वास्तविकता के अनुरूप होना चाहिए इसके विपरीत नहीं. दुकानें किसी योजना को नकारने के लिए नहीं बनती हैं, वो तो उन चीजों की मांग के लिए खड़ी होती हैं जो वहां बेची जा रही हैं. यह जगहें कोई समस्या नहीं हैं, बल्कि रोजगार, उद्योग, आवास और वाणिज्य के क्षेत्रों में कई समस्याओं का समाधान हैं.'

मास्टर प्लान औपनिवेशिक काल से उपजा विचार है. ब्रिटिश तरीके से लैंड यूज जोन के जरिए दिल्ली को विभाजित करने से हम शहर को समझने में नाकाम हो जाते हैं. क्योंकि इस शहर का चरित्र शरणार्थियों और प्रवासियों ने काफी हद तक बदल दिया है. यह वो लोग हैं जो आज नहीं तो कल इस शहर में हमेशा के लिए बसने वाले हैं.

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