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एडल्टरी पर SC की टिप्पणी अहम- औरत 'संपत्ति' नहीं, जेंडर न्यूट्रल कानून बनाने की जरूरत

अभी तक जो सुप्रीम कोर्ट ने फुसफुसाहटों और अग्रिम उम्मीदों के बावजूद जो स्पष्ट रूप से कहा है वो आवेग में नहीं कहा है

Updated On: Aug 04, 2018 04:40 PM IST

Kartik Maini

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एडल्टरी पर SC की टिप्पणी अहम- औरत 'संपत्ति' नहीं, जेंडर न्यूट्रल कानून बनाने की जरूरत

औपनिवेशिक सत्ता से आजादी के बाद स्वाधीनता प्राप्त देशों के सामने अनिश्चय की स्थिति थी. ऐसे देशों में भारत भी था जिसे इस बात का पूरा भान था कि जो शक्ति उसने अपने ऊपर शासन करने वाले देश से प्राप्त की है उसे योजनाबद्ध तरीके से नियंत्रित करना होगा तभी देश में जिस प्रजातंत्र की कल्पना की जा रही थी उसको पूरा किया जा सकेगा.

इसके लिए शक्ति को एक जगह सीमित न रखकर उसको बांटना पड़ेगा और इसके लिए सबसे पहले इसे संभालने के लिए कानूनी मान्यता की जरुरत पड़ेगी. यहीं पर आजादी प्राप्त किए हुए देशों ने इस पर विचार किया कि आखिर कानून का राज्य बनाने की क्या हड़बड़ी है जिसमें संप्रभुता एक आवश्यक अवयव है. हालांकि शासन के इस कानून में महीन रास्ता भी है और निश्चित रूप से इसमें थोड़ी बाधा भी है लेकिन कानूनी बाधा के पथ पर इतिहास का भार भी है जो कि ये सुनिश्चित करता है कि हरेक अधिकार खास करके मूलभूत अधिकारों को लेकर हमेशा बातचीत जारी रहे.

सेक्शन 497

इंडियन पीनल कोड के सेक्शन 497 में ये लिखा हुआ है कि 'कोई भी व्यक्ति, जिसे वो जानता हो या ये जानता हो कि वो किसी और व्यक्ति की पत्नी है, उसके साथ बिना उस व्यक्ति की सहमति या उसकी जानकारी के उस महिला के साथ शारीरिक संबंध बनाता है, जोकि बलात्कार की श्रेणी में नहीं आता, उसे अपराधी माना जाएगा और उसपर व्याभिचार का आरोप लगेगा, जिसमें उसे किसी एक अवधि के लिए कारावास की सजा जिसे 5 साल तक बढ़ाया जा सकता है या आर्थिक दंड या फिर दोनों से दंडित किया जा सकता है. ऐसे मामले में पत्नी दुष्प्रेरक के रूप में दंडनीय नहीं होगी.'

ये एक ऐतिहासिक कानून है और इस कानून का आधार अंग्रजों के जमाने जैसा पुराना है. जिसमें ये माना जाता है कि एक पुरुष और एक महिला की शादी एक ऐसा गठबंधन है जिसका उल्लंघन करना अपराध जैसा है. विक्टोरियन नैतिकता के इस कानून में पत्नी केवल मूक विषय है यानी कि उसका कोई मत नहीं है. इस मामले की सुनवाई करते हुए देश के चीफ जस्टिस ने ठीक ही कहा था कि इस कानून के मुताबिक पत्नी ‘संपत्ति’ जैसी है जिसे या तो सुरक्षित रखा जाता है या फिर बिगाड़ दिया जाता है.

ये एक ऐसा कानून है जो कि समाज के हरेक परिवेश में विवाह को मान्यता देता है और उसको संरक्षित करता है. 2 अगस्त 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता जोसफ शाईन की इसी कानून से संबंधित याचिका पर सुनवाई की. केस के संदर्भ को यहां दोहराने की जरूरत नहीं है. लेकिन ये एक महत्वपूर्ण पड़ाव है जहां शाईन और उसके वकील एडल्टरी को लेकर वैधानिक मान्यता पर कोर्ट के सामने अपने सवाल रख रहे हैं. अभी तक जो सुप्रीम कोर्ट ने फुसफुसाहटों और अग्रिम उम्मीदों के बावजूद जो स्पष्ट रूप से कहा है वो आवेग में नहीं कहा है.

जेंडर न्यूट्रल कानून बनाने की बात

इस मामले की सुनावई कर रही जस्टिस आर.एफ.नरीमन, जस्टिस ए.एम.खानविलकर, जस्टिस डी.वाय.चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदु मल्होत्रा की बेंच ने अभी तक जैसे संकेत दिए हैं उससे ये साफ लग रहा है कि वो एडल्टरी कानून में महिलाओं की स्थिति से संतुष्ट नहीं हैं. इस बेंच को लगता है कि आईपीसी की इस धारा में बदलाव किया जाना चाहिए और उसमें बदलाव लाकर उसे जेंडर न्यूट्रल बनाना चाहिए. उन्होंने ऐसा करने के लिए दो तर्क दिए हैं. पहला कोई शादीशुदा औरत अगर अपने पति की सहमति लेकर किसी के साथ शारीरिक संबंध बनाती है तो वो कानूनी रूप से सही होगा लेकिन दूसरी तरफ कानून उस महिला के अपराध को नजरंदाज करता है यहीं पर कोर्ट को लगता है कि ये कानून संविधान के उस आर्टिकल 14 का पालन नहीं करता है जो कि देश के सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देता है खास करके कानूनी मामलों में.

यदि लिंग-तटस्थ कानून बनाने से महिलाओं की सामाजिक स्थिति में सुधार होगा और वो मैकॉले के ‘मूक विषयों’ से बदलकर ऐसी हो जाएंगी जहां पर वो सामाजिक वास्तविकता और राजनीतिक स्थिति से अपने आपको संबद्ध कर सके तो उनके लिए इस मामले का जजमेंट बहुत मायने रखेगा. कौन कानून सम्मत है और कौन गैरकानूनी है इसका फैसला करने में अगर महिलाओं को शामिल कर लिया जाए तो एक निर्णय इसे नारीवादी नहीं बना देगा.

कौन ज्यादा असुरक्षित है? ये बड़ा सवाल

कानून के नजर में समानता या विस्तृत रूप से कहें तो राजनीतिक समानता एक उत्कृष्ट विचार है लेकिन केवल भारत में, जबकि अन्य जगहों पर इसे सामाजिक आर्थिक और सांस्कृतिक विषमता को दूर करने में इस्तेमाल किया जाता है. समानता को लेकर ये हमारे संविधान निर्माता बीआर अंबेडकर की चेतावनी की याद दिलाता है और शायद सुप्रीम कोर्ट भी इससे कुछ सहायता ले सकता है.

कानून में बदलाव लाकर उसे जेंडर न्यूट्रल बनाया जा सकता है लेकिन कौन अपराधी है और कौन कानून सम्मत है इससे ज्यादा जरूरी सवाल ये है कि कौन ज्यादा असुरक्षित है? शादी का बंधन समानता के कानूनों से ऊपर एक ऐसा इंस्टीट्यूशन है जो कि ऐतिहासिक और सामाजिक रूप से समानता वाला माना जाता रहा है वैसे यहां पर कई ऐसे अपराध भी हैं जो कि कानून की पहुंच से दूर हैं और उसकी सजा भी कानूनी सजा से ऊपर होती है. वैसे अगर इसी कानून में अपराधीकरण के दायरे में महिलाओं को भी शामिल कर लिया जाएगा तो पुर्ननिर्मित इस कानून को पूरी शक्ति के साथ अच्छे से लागू किया जा सकेगा.

इस कानून में बदलाव कैसे लाया जाए इसको लेकर चल रही चर्चा में ये सवाल उठाया नहीं जा रहा है कि ये कानून है ही क्यों? सुप्रीम कोर्ट की बेंच का कहना है कि निश्चित रुप से वैवाहिक शुचिता का मामला इसमें है. वैसे जितना इस कानून की वैधता पर बहस की जा सकती है, उतना ही अनुमान भी लगाया जा सकता है, क्योंकि यह माना जाता है कि एक कानूनी विचार के रूप में व्याभिचार केवल वैध नहीं है बल्कि यह पवित्रता के लिए भी वांछनीय नहीं है.

वापस अंबेडकर पर लौटते हैं, जिन्होंने हमें ये याद दिलाया शादियां असमानता के बीच मध्यस्थता कायम करती है. ये धारा 497 नहीं है जो कि महिलाओं को संपत्ति की तरह से समझती है बल्कि समाजिक व्यवस्था है जो कि शादी और व्याभिचार के बीच में इस कानून को इसी तरह से परिभाषित करती है.

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