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धारा 377 पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से LGBT कम्युनिटी में जगी उम्मीद

धारा 377 को खत्म करने से LGBT कम्युनिटी उस आशंका के साये से बाहर निकल सकेगी, अभी जिसके साथ उसे जीना पड़ता है, इससे भारत अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार के दायरे में सक्रिय रूप से शामिल हो जाएगा

Updated On: Jan 09, 2018 02:53 PM IST

Ashok Row Kavi

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धारा 377 पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से LGBT कम्युनिटी में जगी उम्मीद
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सोमवार की सुबह LGBTQ की जिंदगी में एक अनोखी घटना घटित हुई. हमें आशा की एक किरण ने छुआ- सुप्रीम कोर्ट ने तीन जजों की संविधान पीठ द्वारा “धारा 377 के खिलाफ याचिका को सुनवाई के लिए मंजूर कर लिया.” गे, लेस्बियन, ट्रांसजेंडर्ड कम्युनिटी ने ना सिर्फ राहत की सांस ली, बल्कि उनमें उम्मीद भी जगी है कि लंबे समय से चली आ रही आईपीसी की धारा 377 के दायरे से मुक्ति की लड़ाई में अब अंतिम फैसला भी आ जाएगा.

फिजाओं में बदलाव की आहट कुछ समय से महसूस की जा रही है. नाल्सा केस में अप्रैल 2014 में आए फैसले ने ट्रांसजेंडर और हिजड़ा समुदाय को आखिरकार कानूनी लांछन और भेदभाव से आजादी दिलाई. इसने उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने एक साधारण सा शपथपत्र जमा करके अपनी लैंगिक पहचान घोषित करने की छूट दी. हालांकि इस फैसले के पेज 96 ने धारा 377 को किनारे छोड़ उनकी सैक्सुअल और संतानोत्पत्ति के मुद्दे पर कोई फैसला देने से इनकार कर दिया और उन्हें ‘ अलैंगिक व्यक्ति’ बना दिया.

सुप्रीम कोर्ट ने निजता को मौलिक अधिकार माना था

बीते साल, 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने निजता पर अपने ऐतिहासिक फैसले में लैंगिक झुकाव को मानवाधिकार के तहत रखते हुए साफतौर पर कहा कि इसकी हर हाल में सुरक्षा की जानी चाहिए. हालांकि यह फैसला मोटे तौर पर आधार और यूनिक आइडेंटिटी कार्ड के मुद्दों को लेकर था, लेकिन जजों ने अपने फैसले में यहां तक कहा कि लैंगिक झुकाव एक स्थापित मानव अधिकार है, जिसकी निजता के कानून के तहत सुरक्षा की जानी चाहिए.

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इस तरह, एक आशा जगती है कि धारा 377 का मुकदमा एक कदम आगे बढ़ेगा क्योंकि दो अन्य कानूनों ने इसे व्यावहारिक रूप से बेकार बना दिया है. निर्भया के वीभत्स रेप केस के बाद स्वाभाविक था कि जस्टिस वर्मा कमेटी ने दुष्कर्म और औरत के खिलाफ हिंसक लैंगिक हमले के दायरे को विस्तार देती.

इसने दुष्कर्म और स्त्री पर लैंगिक हमले को परिभाषित करने वाली धारा 376 को दोबारा परिभाषित करने के लिए विधि विशेषज्ञों व महिला संगठनों से चर्चा की. धारा 377 का भी इस्तेमाल महिला पर लैंगिक हमले के मामलों में किया जाता है, अगर ओरल एंड अनल पेनेट्रेशन किया गया है.

दूसरी तरफ पाक्सो (प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल अफेंसेस) एक्ट नाबालिगों पर लैंगिक हमलों के मामले में कानून को नई ताकत देता है. ऐसे मामलों में पहले धारा 377 के तहत “अप्राकृतिक सेक्स” शब्दावली के साथ मुकदमा चलता था.

इस तरह जस्टिस जीएस सिंघवी द्वारा 2013 में दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए और समान लिंग के दो भारतीयों द्वारा बालिग होने और एकांत में स्थापित होने वाले संबंध को अपराध घोषित कर देने के बाद अब धारा 377 होमोसेक्सुअल और लेस्बियन का उत्पीड़न करने और फंसाने का हथियार बन गई है. यह कानून की खामी है, जिसे सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ के सामने उठाया जाना चाहिए.

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LGBT कम्युनिटी में दिखी उम्मीद की किरण

LGBT कम्युनिटी को आशा है कि उन लोगों के साथ होने वाली नाइंसाफी को दूर करने के लिए तीन सदस्यीय पीठ इस मामले की फास्ट ट्रैक आधार पर जल्द से जल्द सुनवाई पूरी करेगी. धारा 377 इस युग और समय में एक उत्पीड़नकारी और खतरनाक कानून है. नैतिक पॉलिसिंग में भी इसका फायदा शून्य है, क्योंकि इसमें पेनेट्रेशन को साबित करने के लिए कठोर फोरेंसिक साक्ष्य की जरूरत होती है. यहां तक कि ब्रिटिश राज में ऐसे पहले मामले (खैरुन्निसा बनाम क्वीन) में जो 1889 में दर्ज हुआ था, अभियोजन पेनेट्रेशन साबित नहीं कर सका और मुकदमा खारिज हो गया. तब से बहुत थोड़े से मामले उस स्तर पर पहुंचे हैं, जहां अभियोजन आरोपी को दोषी साबित कर सका. इधर, गे ग्रुप की तरफ से देश भर में पुलिस और सिपाहियों के खिलाफ बड़े पैमाने पर ऐसी शिकायतें बढ़ी हैं, जिनमें उन्हें मामूली पैसों की उगाही के लिए ब्लैकमेल किया गया.

धारा 377 को खत्म करने से LGBT कम्युनिटी उस आशंका के साये से बाहर निकल सकेगी, अभी जिसके साथ उसे जीना पड़ता है. इससे भारत अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार के दायरे में सक्रिय रूप से शामिल हो जाएगा.

यह काम काफी पहले 1972 में योग्याकार्टा प्रिंसिपल्स के माध्यम से शुरू हुआ था, जिसमें सेक्सुअल ओरियंटेशन और जेंडर आइडेंटिटी (एसओजीआई) अधिकार लिखित रूप में पेश किए गए और इन्हें साल 2016 में न्यूयार्क में संयुक्त राष्ट्र को अग्रसारित किया.

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