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अबॉर्शन की अर्जी खारिज कर महिलाओं की मूल आजादी छीन रहा है सुप्रीम कोर्ट

गर्भपात के कानून के बारे में एक लिहाज से यह ऐतिहासिक मामला साबित होता

Deya Bhattacharya Updated On: Mar 02, 2017 01:16 PM IST

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अबॉर्शन की अर्जी खारिज कर महिलाओं की मूल आजादी छीन रहा है सुप्रीम कोर्ट

गर्भपात के कानून के बारे में एक लिहाज से यह ऐतिहासिक मामला साबित होता. 37 साल की एक महिला ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी डाली थी कि उसे गर्भपात कराने की इजाजत दी जाय.

उस महिला के पेट में पल रहा भ्रूण 26 हफ्ते का हो चुका था और यह बात सामने आ चुकी थी कि भ्रूण को डाउन सिंड्रोम नाम की बीमारी है.

लेकिन, कोर्ट ने गर्भपात की अर्जी खारिज कर दी. महिला ने जब कोर्ट में अर्जी लगायी थी, तब उसके पेट में पल रहा भ्रूण 23 हफ्ते का था. कोर्ट ने इस मामले में कहा कि महिला की जिंदगी को कोई खतरा या नुकसान पहुंचने की आशंका नहीं है सो वह गर्भ ना गिराये.

मामले में कोर्ट ने एक मेडिकल बोर्ड नियुक्त किया और इस बोर्ड ने गर्भपात ना कराने की सलाह दी.

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मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट 1971 (एमटीपीए) के मुताबिक गर्भ अधिकतम 20 हफ्ते तक ही गिराया जा सकता है. अगर गर्भधारण करने वाली मां या उसके पेट में पल रहे बच्चे के जीवन को कोई खतरा हो तो गर्भपात की अवधि की यह सीमा मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के आधार पर बढ़ायी जा सकती है.

मौजूदा मामले में जस्टिस एकेए बोब्डे और एल नागेश्वर राव की पीठ ने डाक्टरों के एक पैनल की रिपोर्ट के आधार पर महिला की अर्जी के खिलाफ फैसला सुनाते हुए कहा, 'सैंतीस वर्षीया महिला की जांच के लिए गठित मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार गर्भ को जारी रखने पर महिला के जीवन को कोई खतरा नहीं है. हर कोई जानता है कि डाऊन सिंड्रोम से ग्रस्त बच्चे बाकियों की तुलना में जरूर मंदबुद्धि होते हैं लेकिन वे ठीक-ठाक होते हैं.'

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डाउन सिंड्रोम

बेंच ने कहा कि डाउन सिन्ड्रोम की स्थिति से जीवन को कोई खतरा नहीं होता और गर्भ को जारी रखने से महिला की सेहत को कोई नुकसान नहीं होगा.

बेंच ने यह तो माना कि जन्म लेने वाले बच्चे को शारीरिक या मानसिक चुनौतियां अपनी चपेट में ले सकती हैं लेकिन यह भी कहा कि हमारे हाथ बंधे हुए हैं- 'दुख की बात है कि जन्म लेने वाले बच्चे को शारीरिक या मानसिक चुनौतियां पेश आ सकती हैं और जन्म देने वाली मां के लिए यह बात बड़ी दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन हम गर्भपात की इजाजत नहीं दे सकते. हमारे हाथ से एक जिंदगी का फैसला होना है और हम कानून से बंधे हुए हैं.'

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यौन-जीवन और प्रजनन संबंधी अधिकारों से जुड़े मसलों पर भारत ने बेशक प्रगति की है लेकिन गर्भपात का मसला देश में अब भी विवाद का विषय है. भारतीय दंड संहिता की धारा 312 (1860) में गैरकानूनी ढंग से गर्भ गिराने का जिक्र तो आता है लेकिन उसमें 'गर्भपात' शब्द का इस्तेमाल नहीं हुआ है.

इसमें 'कॉजिंग मिसकैरिज' यानी गर्भधारण के बाद भ्रूण के ना टिकने और 'अनबॉर्न चाइल्ड' यानी अजन्मा शिशु जैसे शब्द का इस्तेमाल तो हुआ है, लेकिन इन शब्दों के अर्थ और प्रसंग को कानूनी दायरे में परिभाषित नहीं किया गया है

प्रावधान के मुताबिक पेट में पलते भ्रूण को गिराने का फैसला मां की जिंदगी की हिफाजत और नेकी की भावना के साथ लिया जाना चाहिए.

एमटीपीए में कहा गया है कि भ्रूण 20 हफ्ते से ज्यादा दिन का हो जाय तो उसे नहीं गिराया जा सकता. बशर्ते, मां की जिंदगी को कोई खतरा ना हो. यह खतरा शारीरिक भी हो सकता है और मानसिक भी.

अगर गर्भ को जारी रखने से मां को बहुत अधिक मानसिक पीड़ा पहुंचे तो इसे मानसिक खतरा माना जायेगा. यहां गौर करने लायक बात यह है कि एमटीपीए में गर्भवती महिला के निजता के अधिकार, स्वास्थ्य के अधिकार और गरिमा के अधिकार की अनदेखी हुई है जबकि संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) में इनकी गारंटी दी गई है.

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गर्भ गिराने की इजाजत

साल 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने एक बलात्कार-पीड़िता को निर्धारित  समय-सीमा (20 हफ्ते) से आगे जाते हुए 24 हफ्ते के भ्रूण को गिराने की इजाजत दी. कोर्ट का कहना था कि महिला अगर उस गर्भ को पूरे समय तक पेट में पालती है तो उसे बहुत ज्यादा शारीरिक और मानसिक चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा.

जस्टिस जेएस खेहर और जस्टिस अरुण मिश्र की बेंच ने एमटीपीए के सेक्शन पांच का लाभ देते हुए कहा कि, 'हम अर्जी लगाने वाले को छूट देते हैं, अगर वह गर्भपात कराने का फैसला करना चाहे तो उसको ऐसा करने की अनुमति दी जाती है.'

साल 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट के एक फैसले को उलट दिया था. गुजरात हाईकोर्ट ने चौदह साल की एक बलात्कार पीड़िता को पच्चीस हफ्ते का गर्भ गिराने की इजाजत नहीं दी थी.

हालांकि, हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह तो माना कि गर्भपात की अनुमति के लिए अर्जी लगाने वाले की जिंदगी पर फैसले के शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक दुष्परिणाम हो सकते हैं, लेकिन लेकिन एमटीपीए कानून की सकारात्मक और पंडिताऊ व्याख्या के आधार पर कोर्ट ने गर्भपात की इजाजत नहीं दी

बलात्कार-पीड़िता ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की. सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल पैनल की सिफारिश पर गौर किया और बलात्कार-पीड़िता के हित को ध्यान में रखते हुए अपना फैसला सुनाया. साल 2008 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महिला को 26 हफ्ते का गर्भ गिराने की अनुमति नहीं दी थी.

इस महिला के पेट में पल रहे गर्भ को दिल की बीमारी थी . मामले में याच ने एमटीपीए के सेक्शन 5 की सांवैधानिकता को चुनौती दी लेकिन हाईकोर्ट ने फैसले में कहा कि हम सेक्शन 5 की व्याख्या इस तरह नहीं कर सकते जिससे लगे कि कोर्ट ने विधायिका के दायरे में दखलंदाजी की है.

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रुढ़ीवादी व्याख्या

मतलब ये कि इस मामले में भी एमटीपीए की एक तंग और रुढ़ीवादी व्याख्या हुई और कोर्ट ने फैसला सुनाया कि भ्रूण में गंभीर किस्म का विकार पाया जाता है तो इस आधार पर गर्भपात की अनुमति उसी सूरत में मिल सकती है जब भ्रूण अधिकतम 20 हफ्ते का हो. मामले में कोर्ट ने अर्जी लगाने वाले के गर्भपात के अधिकार को एक तरह से खारिज कर दिया.

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एक और मामला पंजाब बनाम हरियाणा का है. इसमें पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने गर्भपात की अनुमति नहीं दी. अर्जी बलात्कार-पीड़िता की तरफ से लगायी गई थी. मामले में मेडिकल बोर्ड की सिफारिश गर्भपात के पक्ष में नहीं थी. कोर्ट ने आगाह करने के स्वर में एम्स के डाक्टरों से निवेदन किया कि वे एक बार फिर से विचार करें कि गर्भपात की अनुमति दी जा सकती है या नहीं.

बहरहाल, अदालती सुनवाई की अवधि में ही अर्जी देने वाली महिला को प्रसव हो गया जबकि वह इस बच्चे को जन्म नहीं देना चाहती थी.

गर्भवती महिला का जीवन का अधिकार बनाम अजन्मे बच्चे का जीवन का अधिकार की कानूनी बहस में महिला के स्वतंत्र व्यक्तित्व की अहम और जरुरी धारणा कहीं न कहीं एक तरह से गुम हो जाती है

बात को और ज्यादा साफ तरीके से कहें तो कहना होगा कि एमटीपीए में दरअसल महिला को गर्भपात का अधिकार दिया ही नहीं गया है. दरअसल, यह कानून गर्भपात के अधिकार के प्रयोग की राह में ढेर सारी जटिल प्रक्रियागत बाधा यानी किन्तु-परन्तु खड़े करता है.

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कानून में कमी

एक बात यह भी है कि कुछ मामलों मे मौजूदा कानून न्यायपूर्ण नहीं हैं और उनके जरिए किसी मामले में सही समाधान नहीं निकाला जा सकता है. मामला ऐसे कानूनों के आधार पर फैसला सुनाने का हो तो न्यायपालिका ज्यादातर प्रसंगों में ज्यूडीशियल एक्टिविज्म( न्यायिक अधिसक्रियता) दिखाने में चूक जाती है.

मेरे ख्याल से गर्भपात के मामलों मे अदालत का मेडिकल पैनल की सिफारिश के आधार पर फैसला सुनाना सही नहीं है, क्योंकि मेडिकल बोर्ड की सिफारिश मनमानी भी हो सकती है.

ऐसी सिफारिश को फैसले का आधार बनाने का मतलब है भारतीय महिला के यौन-जीवन और प्रजनन संबंधी अधिकारों के लिए एक खतरनाक नजीर कायम करना.

सुप्रीम कोर्ट का मौजूदा फैसला इस बात की ओर संकेत करता है कि बगैर प्रसंग का ध्यान रखे जब किसी कानून की तंग और रूढ़ीवादी व्याख्या की जाती है तो वह कैसे महिलाओं के मां बनने संबंधी बुनियादी अधिकारों का हनन है.

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