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पटाखा इंडस्ट्री के होश उड़ा सकता है सुप्रीम कोर्ट का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने बीते मंगलवार को देश में पटाखों के सीमित उपयोग के संबंध में आदेश जारी किया था.

Updated On: Oct 26, 2018 09:43 AM IST

Kangkan Acharyya

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पटाखा इंडस्ट्री के होश उड़ा सकता है सुप्रीम कोर्ट का आदेश
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पटाखा मेन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले से उनकी दिक्कतें काफी बढ़ सकती हैं. दरअसल, सर्वोच्च अदालत ने पटाखों को बनाने में बेरियम के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है. पटाखा मेन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री का कहना है कि अदालत के इस फैसले से त्योहारों के दौरान न सिर्फ पटाखे फोड़ना असंभव जैसा हो जाएगा, बल्कि इससे पटाखा इंडस्ट्री दिवालिया होने की कगार पर भी पहुंच सकती है. साथ ही, पटाखा इंडस्ट्री के पास 2,000 करोड़ से भी ज्यादा के बैड डेट (वसूल न होने वाला कर्ज) का संकट खड़ा हो जाएगा.

पटाखा इंडस्ट्री से जुड़े कई कारोबारी हो जाएंगे दिवालिया !

तमिलनाडु फायरवर्क्स एंड एमोर्सेज मेन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (टीएएनएफएएमए) के जनरल सेक्रेटरी के. मरियप्पन ने बताया, 'दुनिया भर में तमाम जगहों पर पटाखों को तैयार करने में बेरियम नामक केमिकल का इस्तेमाल किया जाता है. यह पटाखों की मेन्युफैक्चरिंग से संबंधित एक अनिवार्य केमिकल है. पटाखों को तैयार करने के लिए हमारे पास अभी इसका कोई विकल्प नहीं है.

अगर इस पर पाबंदी लगाई जाती है तो हम पहले जो अधिकांश पटाखे तैयार कर चुके हैं, वह आखिरकार प्रतिबंधित हो जाएगा.'

मरियप्पन का दावा है कि अगर इस आदेश का पालन किया जाता है, तो पटाखा निर्माण इंडस्ट्री से जुड़े लाखों लोग दिवालिया हो सकते हैं और इससे 2,000 करोड़ रुपए से भी ज्यादा का बैड डेट तैयार हो जाएगा.

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने बेरियम के इस्तेमाल को लेकर पाबंदी हाल में लगाई है, जबकि दिवाली के मद्देनजर पटाखों की बड़े पैमाने पर मेन्युफैक्चरिंग की प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है. उन्होंने बताया, 'इस इंडस्ट्री से जुड़ी कई इकाइयों ने सरकारी बैंकों से अपने कारोबार के सिलसिले में काफी कर्ज ले रखा है. हालांकि, अगर अदालत के फैसले के कारण हमारा कारोबार रुकता है तो हम अपनी बकाया रकम का भुगतान करने में सक्षम नहीं होंगे.'

fire cracker

तमिलनाडु फायरवर्क्स एंड एमोर्सेज मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन नामक संस्था तमिलनाडु के शिवकाशी में मौजूद 1,070 पटाखा मैन्युफैक्चरिंग इकाइयों का प्रतिनिधित्व करती है. शिवकाशी देश में पटाखा इंडस्ट्री का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र है. यहां पर मौजूद पटाखा इंडस्ट्री से संबंधित इकाइयां देश में पटाखा की तकरीबन 90 फीसदी मांग को पूरा करती हैं. सुप्रीम कोर्ट के आदेश में साफ-साफ कहा गया है, 'इसके(आदेश) द्वारा पटाखों में बेरियम सॉल्ट के प्रयोग को प्रतिबंधित किया जाता है.'

मरियप्पन का कहना था, 'पटाखा मेन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री को पूरी तरह से बंद किए बिना कोई किस तरह से इस आदेश का पालन कर सकता है?'

बेरियम के उपयोग से पटाखे में आवाज और रंग मुमकिन होता है

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के रिटायर्ड वैज्ञानिक महेंद्र पांडे ने पटाखों में केमिकल के इस्तेमाल के बारे में विस्तार से बताया. उनका कहना था, 'बेरियम पटाखों की मैन्युफैक्चरिंग से जुड़ा एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. इसके इस्तेमाल के कारण धमाका पैदा करने और पटाखों के फूटने के दौरान इसमें रंग का नमूना पेश करने में मदद मिलती है.'

उन्होंने आगे बताया, 'पटाखों के फूटने के वक्त उसमें जो हरा रंग दिखाई पड़ता है, वह बेरियम के कारण ही संभव हो पाता है.' जाहिर तौर पर अगर पटाखों को तैयार करने में बेरियम का उपयोग नहीं किया जाए, तो इसके मुख्य आकर्षण आवाज और रंग के लिए मेन्युफैक्चरिंग इकाइयों को कोई अन्य उपाय ढूंढना पड़ेगा.

पांडे ने यह भी बताया कि धमाके का असर पैदा करने के लिए बेरियम नाइट्रेट में जिंक और एल्युमीनियम पाउडर मिलाया जाता है. उन्होंने कहा, 'बेरियम पर पाबंदी लगाए जाने से दिवाली के दौरान भारत में उपयोग किए जाने वाले अधिकांश पटाखों पर रोक लग सकती है.' पांडे के मुताबिक, 'हालांकि, कई इंडस्ट्री अपने-अपने उत्पादों में धड़ल्ले से बेरियम का उपयोग करते हैं, लेकिन पटाखा इंडस्ट्री में इसका इस्तेमाल भरपूर मात्रा में और अन्य उद्योगों के मुकाबले ज्यादा किया जाता है.'

बेरियम पर प्रतिबंध के साथ-साथ इसका विकल्प भी मुहैया कराने की मांग

मरियप्पन का कहना था कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश को इस लिहाज से भी अव्यवहारिक माना जा सकता है कि इसने वैसे अन्य केमिकल्स पर भी पाबंदी लगा दी है, जिनका इस्तेमाल भारत में पटाखा मेन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री की तरफ से बिल्कुल नहीं किया जाता है. सर्वोच्च अदालत के आदेश में लिथियम, आर्सेनिक, एन्टमोनी, लेड और मर्करी जैसे केमिकल के इस्तेमाल पर रोक लगाने की बात कही गई है. उन्होंने बताया, 'हम इन केमिकल्स का किसी भी रूप में बिल्कुल इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं, लिहाजा इन पर प्रतिबंध लगाना कतई जरूरी नहीं था.'

सुप्रीम कोर्ट के आदेश में कहा गया है, 'पेट्रोलियम और विस्फोटक सुरक्षा संस्थान (पीईएसओ) पर यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी होगी कि दिवाली और अन्य धार्मिक त्योहारों और शादी-विवाह जैसे अन्य अवसरों पर सिर्फ मंजूरी प्रदान किए गए केमिकल वाले पटाखों की खरीदारी, बिक्री और इस्तेमाल सुनिश्चित हो सके.

दरअसल, इसके तहत पेट्रोलियम और विस्फोटक सुरक्षा पटाखों में लिथियम, आर्सेनिक, एन्टीमोनी, लेड, मर्करी जैसे प्रतिबंधित केमिकल्स की मौजूदगी की जांच करेगा.'

मरियप्पन का यह भी कहना था कि अदालत को इस आदेश के साथ-साथ पटाखा इंडस्ट्री को बेरियम का विकल्प भी मुहैया कराना चाहिए था, क्योंकि यह (बेरियम) ज्यादातर पटाखों का जरूरी हिस्सा है. बेरियम पर प्रतिबंध के बाद इसका विकल्प उपलब्ध नहीं कराए जाने की स्थिति में इंडस्ट्री के सामने बड़ा संकट खड़ा होने की आशंका है.

उन्होंने बताया, 'हम उम्मीद कर रहे थे कि पेट्रोलियम और विस्फोटक सुरक्षा संस्थान या संबंधित अधिकारी अदालत की सुनवाई के दौरान बेरियम के एवज में वैकल्पिक उपाय पेश करेंगे. हालांकि, जाहिर तौर पर ऐसा नहीं हुआ.'

कई संस्थानों के सुझाव के आधार पर आया सुप्रीम कोर्ट का फैसला

बेरियम पर पाबंदी लगाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च (सीएसआईआर), नेशनल एनवायरमेंट इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (एनईईआरआई), पीईएसओ और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की तरफ से अदालत में पेश किए गए सुझावों पर आधारित था. इन संस्थानों की तरफ से दिवाली के दौरान पटाखों से पैदा होने वाली प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए ठोस समाधान और तात्कालिक उपायों के तहत इस संबंध में सुझाव पेश किए गए थे.

सर्वोच्च अदालत के आदेश में कहा गया है, 'बेरियम सॉल्ट से निकलने वाली जहरीली गैस छोटी अवधि में सांस संबंधी दिक्कत पैदा करती है और इसकी वजह से लंबी अवधि में स्वास्थ्य संबंधी अन्य दिक्कतें भी पैदा हो सकती हैं. इन बातों को ध्यान में रखते हुए तात्कालिक उपाय के तहत पटाखों में बेरियम सॉल्ट पर पाबंदी लगाने पर विचार किया जा सकता है.'

यहां जिक्र करने लायक एक और अहम बात यह है कि आदेश में एक ऐसे अध्ययन का भी हवाला दिया गया, जिसके मुताबिक पटाखों के इस्तेमाल वाले इलाकों में लोगों के पेशाब के सैंपल में बेरियम और स्ट्रॉन्टीएम के स्तर में बढ़ोतरी पाई गई.

supreme court

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक, 'इस तरह के कुछ धातुओं का उपयोग पटाखा इंडस्ट्री द्वारा इस तरह के उत्पादों को तैयार करने में किया जाता है. पेशाब में इन धातुओं के स्तर में बढ़ोतरी इसके प्रभाव की आशंका की तरफ इशारा करती है. हालांकि, पटाखों फोड़ने के असर की पुष्टि करने के लिए बाकी चीजों में बढ़ोतरी नहीं की गई. यह भी मुमकिन है कि लोग इसलिए इससे प्रभावित हुए क्योंकि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तरीके से उनके इलाके में पटाखों फूटे.'

बहरहाल, मरियप्पन ने सर्वोच्च अदालत के आदेश के सिलसिल में एक और महत्वपूर्ण बात की तरफ इशारा किया. उनका कहना था कि सुप्रीम कोर्ट ने ग्रीन और कम धुआं फैलाने वाले पटाखों के इस्तेमाल का आदेश दिया है, लेकिन पटाखों से संबंधित इस तरह की दोनों किस्मों को पर्यावरण कानून के तहत ठीक-ठीक पारिभाषित नहीं किया गया है.' उन्होंने बताया, 'हम इस आदेश की समीक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने की तैयारी कर रहे हैं.'

गौतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने बीते मंगलवार को देश में पटाखों के सीमित उपयोग के संबंध में आदेश जारी किया था. हालांकि, उसने पटाखों पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने संबंधी आदेश देने से मना कर दिया था और सिर्फ कम धुआं वाले और ग्रीन पटाखों के उपयोग की इजाजत दी थी.

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