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एक संभावित सत्याग्रही का 'सत्याग्रही चिंतन'

आज के दौर में सामाजिक सत्याग्रह की बजाए राजनीतिक सत्याग्रह की महिमा बढ़ रही है

Piyush Pandey Updated On: May 11, 2017 05:09 PM IST

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एक संभावित सत्याग्रही का 'सत्याग्रही चिंतन'

मैं भी सोच रहा हूं कि सत्याग्रह कर दूं. पत्नी से मांग की थी कि मेरी पॉकेटमनी 100 रुपए प्रतिदिन से बढ़ाकर 200 रुपए की जाए. लेकिन-उसने मेरी मांग न केवल सिरे से खारिज कर दी बल्कि ज्यादा बिलबिलाने पर मायके जाने, बच्चों को मेरे पास छोड़ जाने, सासू मां को भेज देने, बॉस की मेरी नाजायज छुट्टियों की शिकायत करने जैसे कई कदम एक साथ उठाने की धमकी दे डाली.

सत्याग्रह की मेरी कोई भी कोशिश मुझे खासी महंगी पड़ सकती है, लिहाजा मैंने सत्याग्रह का फैसला टाल दिया. फिर मुझे लगा कि अगर मैंने सत्याग्रह उर्फ धरना उर्फ अनशन उर्फ भूख हड़ताल टाइप का कोई भी कदम उठाया तो भी अपना हाल पूछने कौन आएगा ?

जब मीडिया मैनेजमेंट सही हो तभी करिए सत्याग्रह 

मीडिया में सुर्खियां ही नहीं बनी तो फिर काहे का सत्याग्रह? और इस सत्याग्रह के चक्कर में कहीं अपनी टें बोल गई तो एक करोड़ के बीमे की रकम लेकर श्रीमती तो वर्ल्ड टूर पर निकल लेंगी, और मैं स्वर्ग से उसे देखने और कोसने के सम्मिलत भाव से फिर मर जाऊंगा.

फिर, एक सच यह भी है कि जिस तरह एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकतीं, उसी तरह एक शहर में एक ही वक्त पर दो सत्याग्रही पब्लिसिटी नहीं पा सकते.

इन दिनों कपिल भइया सत्याग्रह पर बैठे हैं. 100 बरस पहले अप्रैल-मई की इन्हीं गर्मियों में चंपारण में महात्मा गांधी सत्याग्रह पर बैठे थे.

नील की खेती करने वाले किसानों के हक की लड़ाई में सत्याग्रह कर बापू ने आजादी के मतवालों को एक अहिंसक हथियार से परिचित कराया था. 100 बरस बाद उसी सत्याग्रह के हथियार को लेकर कपिल भइया मैदान में हैं. आम आदमी पार्टी के नेताओं से कह रहे हैं-विदेश यात्राओं पर क्या क्या गुलछर्रे उड़ाए-बताओ? उनकी इस मांग का छुपा अर्थ जानकार ये भी बता रहे हैं कि मुझे क्यों नहीं ले गए कमबख्तों, ये बताओ?

राजनीतिक और सामाजिक सत्याग्रह में अंतर

सत्याग्रह दो किस्म के होते हैं. राजनीतिक सत्याग्रह और सामाजिक सत्याग्रह. राजनीतिक सत्याग्रह जहां आयोजित होता है, उस स्थान को आप दूर से पहचान सकते हैं.

वहां समर्थकों की भीड़ होगी. कैमरों का हुजूम होगा. चैनलों की ओबी वैन होंगी. लंपट होंगे. उठाईगिरे होंगे. गोलगप्पे के ठेले होंगे. कुल मिलाकर एक मेला चल रहा होगा, जिसमें तंबू के नीचे बेचारा सत्याग्रही महात्मा गांधी, भगत सिंह या चंद्रशेखर आजाद जैसे कुछ दिग्गजों की तस्वीरें लगाए 'लेटा कम बैठा' होगा. सत्य के प्रति घनघोर आग्रह करता हुआ.

सत्य जानने के प्रति उसकी जिज्ञासा इतनी प्रबल होती है कि कई बार सत्य को खुद लगने लगता है कि चलो मैं ही बंदे को बता आऊं कि मामला क्या है.

सामाजिक सत्याग्रह आर्ट फिल्म के खाली थिएटर सरीखा होता है, जो या तो किसी को समझ नहीं आता या समझ में आने के बावजूद जहां कोई जाना नहीं चाहता. सामाजिक सत्याग्रह में आयोजन स्थल पर सत्याग्रही के साथ होता है सन्नाटा.

सत्याग्रही और सन्नाटा अकसर आपस में बात करते रहते हैं, और छह-आठ महीने में कोई उनके पास पहुंच जाए तो उसे बता देते हैं कि वो जिंदा हैं. चूंकि वे जिंदा है, इसलिए कोई खबर भी नहीं. जंतर मंतर पर तंबू में बैठे ऐसे सत्याग्रहियों को आप देख सकते हैं, जो बेचारे अपने हक की लड़ाई लड़ते हुए जाने कहां कहां से जंतर मंतर पर आ पहुंचे हैं. ये सोचकर कि सत्ता उनकी सुनेगी. मीडिया उनकी सुनेगा.

लेकिन-दिल्ली में इतना कोलाहल है कि किसी को किसी की बात नहीं सुनाई दे रही. या कहें कोई किसी की नहीं सुन रहा. सब अपनी कह रहे हैं बस.

सत्याग्रह के बाजार में मुनाफे की सेल

इतने भयंकर प्रदूषण के बीच मैंने एक एक्सपीरियंस्ड सत्याग्रही को पकड़ा और पूछा-'भइया, सत्याग्रह का फायदा क्या है?'

वो बोले, 'देखो, इसके तीन फायदे हैं. पहला, एक प्रोफाइल बन जाता है. राजनीति में प्रोफाइल बहुत जरूरी है. आपने कुछ किया हो या न किया हो-प्रोफाइल है तो टिकट मिलने की संभावना बन जाती है. कुछ करना है तो उसमें टाइम लगता है, ऊर्जा लगती है, पैसा लगता है, समर्थक चाहिए होते हैं. लेकिन सत्याग्रह में कुछ नहीं करना होता. बस, भोंदू सा मुंह बनाकर चुपचाप लेट जाना होता है. सत्य का आग्रह लेकर.'

मैंने पूछा, 'दूसरा फायदा ?'

वो बोले, 'दूसरा फायदा यह कि इस महंगाई में बंदा कुछ दिन भूखा रहता है तो पैसे बचते हैं, और भूख पर थोड़ा कंट्रोल हो जाता है.'

और तीसरा ?

वो बोले, 'तीसरा फायदा ये कि सत्याग्रही होने के चलते घरवाले थोड़ा घबराते हैं. सोचते हैं कि बुरा मान गया तो अभी सत्याग्रह पर बैठ जाएगा. अनशन कर देगा. घरवाले मासूम होते हैं. लेकिन इससे सत्याग्रही का काम बन जाता है.'

मैने पूछा- तो क्या सत्याग्रह से मांग पूरी हो ही जाती है?

उन्होंने मुझे अब हिकारत की नजर से देखा और बोले-'हट बुड़बक, मांग-वांग का क्या लेना देना सत्याग्रह से. रामलीला मैदान पर हुआ था सत्याग्रह लोकपाल की मांग को लेकर. करने वाले सब सत्ता में आ गए, लोकपाल आजतक किसी स्टेशन पर अटका ही पड़ा है.'

मैं सत्याग्रह की महिमा समझ चुका था. मेरा भी मन हुआ कि किसी सत्याग्रही के दर्शन कर आऊं. मैं पहुंचा, जहां सत्याग्रही सत्य के प्रति घनघोर आग्रह कर रहा था.

आहा! कितना सुंदर दृश्य है. नए जमाने का सत्याग्रही बैठा हुआ है. बापू की तस्वीर पीछे है. सत्याग्रही को मारने एक युवक पहुंचा तो भीड़ ने उसकी पिटाई कर दी. लेकिन सत्याग्रही में बापू की आत्मा प्रवेश कर चुकी है. वो कह रहा है- किसी ने भी मुझे मारने वाले की पिटाई की तो मैं जल भी त्याग दूंगा.

आहा ! कितना सुंदर दृश्य है. आज बापू बहुत याद आ रहे हैं !!!!!

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