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वॉट्सऐप के नारे स्वदेशी, लेकिन फोन तो चाइनीज है

नए सीमा विवाद के बाद चाइनीज सामान के बायकॉट का नारा फिर से बुलंद है लेकिन क्या ऐसा कर पाना संभव है?

Rakesh Kayasth Updated On: Jul 06, 2017 12:16 PM IST

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वॉट्सऐप के नारे स्वदेशी, लेकिन फोन तो चाइनीज है

वॉट्सऐप पर सेना मार्च कर रही है. फेसबुक पर भारतीय शेर दहाड़ रहे हैं. न जाने कितने लोग गदर के तारा सिंह बनने को बेचैन हैं. पाकिस्तान जाकर हैंडपंप उखाड़ने के लिए नहीं बल्कि चीनी सामान भारतीय बाजार से निकाल फेंकने के लिए. उधर सीमा पर तनाव की खबरें आईं और इधर सोशल मीडिया पर देशभक्ति का नया दौर शुरू हो गया— चीनी सामान का बायकॉट करो.

सीमा विवाद और उसके संभावित नतीजों से जुड़े सवाल बेहद गंभीर हैं, जो विस्तार से चर्चा की मांग करते हैं. फिलहाल वह सवाल जो काफी समय से भारत में उठता आ रहा है, क्या चीनी सामानों का बायकॉट संभव है? भारतीय लोगों को शायद यह अंदाजा भी नहीं है कि वो जितना सोचते हैं, चीन में बने प्रोडक्ट्स की घुसपैठ उनकी जिंदगी में उससे बहुत ज्यादा है.

किस-किस चीज का बायकॉट होगा?

malls in india

प्रतीकात्मक तस्वीर

आप जिस प्रोडक्ट को चाइनीज मानकर खरीदते हैं, वो तो चाइनीज है ही. जिसे अमेरिका या किसी और देश की कंपनी का प्रोडक्ट मानते हैं, उनमें से भी आधे से ज्यादा चीन में बने होते हैं.

मैं चाइनीज प्रोडक्ट नहीं खरीदता लेकिन अमेरिकी कंपनी के जो सेलफोन और लैपटॉप इस्तेमाल करता हूं, दोनों 'मेड इन चाइना' हैं. मुझे याद है बहुत साल पहले दिल्ली में फर्नीचर शॉप में गया था. दुकानदार से मलेशियन वुड का वैसा ही टेबल दिखाने की फरमाइश की थी, जो मेरे दोस्त के घर है.

दुकानदार ने हंसते हुए जवाब दिया—  मलेशियन बुलाओ या इंडोनेशियन, माल तो सारा चाइनीज ही है. मैं हैरान होकर देखने लगा, तो दुकानदार ने जवाब दिया— सस्ते होने की वजह से चाइनीज प्रोडक्ट्स की इमेज आजकल थोड़ी खराब हो रही है. इसलिए अब वो भारतीय बाजार तक अपने प्रोडक्ट्स पहुंचाने के लिए नए रूट का सहारा ले रहे हैं.

`स्वदेशी’ भी चाइनीज है

बहुत से ऐसे प्रोडक्ट भी चाइनीज हैं, जिन्हें आप भारतीय मानकर खरीदते आए हैं. इसका सबसे बड़ा उदाहरण बाजार में बिकने वाली हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियां हैं. बाजार ऐसी सस्ती और सुंदर मूर्तियां से अटा पड़ा है. दिवाली के समय जब चीनी सामान के बहिष्कार का नारा बुलंद होता है, इन मूर्तियों की बिक्री सबसे ज्यादा होती है.

बायकॉट के नारे चलते रहते हैं और दिवाली में लाखों घर सस्ते चीनी झालरों से सजते हैं. खरीदने वाले बहुत से लोग इस बात से बेखबर होते हैं कि वो कहां का माल खरीद रहे हैं.

मोदी

आप सौ फीसदी स्वदेशी कंपनी शर्ट खरीद खरीदकर लाते हैं और पहनते वक्त आपको याद भी नहीं रहता कि जो बटन आप बंद कर रहे हैं, वे पूरी तरह चीनी हैं. घर में लगे बिजली के सामान से लेकर कार में रखे डेकोरेटिव पीस और परफ्यूम तक सब कुछ चाइनीज हैं. आखिर किस-किस चीज का बायकॉट करेंगे?

चीनी सामान के बायकॉट के कैंपेन देखकर तिब्बत में हुए चीन विरोधी प्रदर्शन की याद आ रही है. प्रदर्शनकारी जो झंडे इस्तेमाल कर रहे थे, वे भी चीन में ही बने थे. ठीक उसी तरह जैसे जिन लैपटॉप और सेलफोन के जरिए भारत में सोशल मीडिया कैंपेन चल रहा है, वे सब के सब 'मेड इन चाइना' हैं.

चीन भारत का सबसे बड़ा बिजनेस पार्टनर

सीमा विवाद और ग्लोबल लेवल पर एक-दूसरे से कंप्टीशन के बावजूद भारत और चीन के व्यापारिक रिश्ते वक्त के साथ लगातार मजबूत होते जा रहे हैं. मौजूदा समय चीन और भारत के बीच होनेवाला सालाना कारोबार लगभग 70 अरब डॉलर का है.

हालांकि व्यापार संतुलन पूरी तरह से चीन के पक्ष में है, फिर भी सच यह है कि भारत में चीनी निवेश भी बढ़ रहा है. चीनी कंपनियों ने नये इनवेस्टमेंट और अधिग्रहण के जरिए भारत के रीटेल बाजार में अपनी स्थिति लगातार मजबूत की है.

नारों से नहीं बना चीन दुनिया का मैन्युफैक्चरिंग हब

एक समय दुनिया भर के कंज्यूमर मार्केट में अमेरिका की तूती बोलती थी. लेकिन 1968 के बाद से कहानी बदल गई. चीन ने अमेरिका को पीछे छोड़कर दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक होने का तमगा हासिल कर लिया. पिछले पचास साल से ग्लोबल एक्सपोर्ट मार्केट पर चीन का ही राज है.

हाल ये है कि दुनिया भर के एक्सपोर्ट में चीन की हिस्सेदारी इस समय 14 फीसदी है. यानी विश्व भर में इस्तेमाल होनेवाले सात प्रोडक्ट में एक प्रोडक्ट चाइनीज जरूर है. क्या चीन ने ये हैसियत सिर्फ नारा लगाकर हासिल की है? क्या चीनी जनता के अमेरिका हाय-हाय कह देने भर से चीन दुनिया का नंबर वन एक्सपोर्टर हो गया? बिना दीर्घकालिक योजना के ऐसा हो पाना संभव नहीं था. चीन ने यह कर दिखाया है जबकि, भारत में अभी 'मेक इन इंडिया' की शुरुआत हुई है.

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सीमा विवाद और व्यापारिक रिश्ते

यह सच है कि भारत और चीन के रिश्तों में आजकल जो तनाव नजर आ रहा है, वह दशकों के बाद देखने को मिला है. सिक्किम से लगी सीमा के पास चीन सड़क बनाने की कोशिश कर रहा है और भारतीय सेना ने काम रोक दिया है. चीन इसे घुसपैठ करार दे रहा है और भारतीय फौज के पीछे ना हटने की स्थिति में युद्ध तक की चेतावनी दी है. जाहिर सी बात है कि ये आम स्थिति नहीं है.

चीन निर्विवाद रूप से एक सुपर पावर है. दूसरी तरफ भारत एक आर्थिक और सैन्य महाशक्ति बनने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रहा है. दो बड़ी ताकतों का यह टकराव दुनिया के लिए भी अच्छा नहीं होगा. तनाव चरम पर होने के बावजूद दोनों देश मौके की नजाकत को समझ रहे हैं. रक्षा मंत्री अरुण जेटली के बयान को छोड़ दें तो अब तक भारत की तरफ से कोई ऐसा बयान नहीं आया है, जिससे कि जनभावना भड़के.

भारत और चीन का सीमा विवाद बहुत पुराना होने के साथ जटिल भी है. इसका एक झटके में सुलझना संभव नहीं है. व्यापार ही वह कड़ी है, जो दोनों देशों को मतभेद ठंडे बस्ते में डालकर आगे बढ़ने को प्रेरित करती है. सड़क पर नारे लगाने से ना तो सीमा विवाद सुलझेगा और ना ही मैन्युफैक्चरिंग के मामले में भारत चीन को पछाड़ पाएगा. ये समय भारत के लिए चीन हाय-हाय से ज्यादा 'मेक इन इंडिया' पर ध्यान देने का है.

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