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माय लॉर्ड, भाषा की ये जलेबी अदालत के बाहर किसी को नहीं पचती 

कई जजों की अंग्रेजी के आदेश ऐसे हैं जो लंबे से लंबे मुकदमों से भी ज्यादा पेचीदा हैं

Updated On: Feb 17, 2017 10:25 AM IST

Bikram Vohra

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माय लॉर्ड, भाषा की ये जलेबी अदालत के बाहर किसी को नहीं पचती 

अगर आप सोचते हैं कि आप अंग्रेजी पढ़ सकते हैं, तो नीचे लिखे पैरे को पढ़िए! पढ़ लिया तो फिर दोबारा पढ़िए, बार-बार पढ़िए! माथा घूम गया ना !

जस्टिस अमिताव रॉय के फैसले का एक हिस्सा कुछ यूं है :

यूं समझिए कि अगर उसी लहजे और जबान में इस पैरे का अनुवाद किया जाए तो अंग्रेजी तो जाने दीजिए आप हिंदी में भी नहीं समझ पाएंगे.

''समकालीन अस्तित्व के भीतर यह भाव जोर पकड़ रहा है कि जीवन का प्रत्येक पक्ष सर्वग्रासी अहितकर भ्रष्टाचार की जकड़ में है मानो जीवन इस विशालकाय जोंक की पंजे में अचंभित होकर निस्सहायता में कुंडलीवत पड़ा हो.

दिन-प्रतिदिन के अनुभव वस्तुतः अपनी अटूट निरंतरता में किसी को यह जताने के लिए काफी हैं कि भ्रष्टाचार का चित्तीदार कैंसरकारी काढ़ा अदंडित और निर्भय होकर राष्ट्रीय जीवन के ताने-बाने के सारतत्त्व का क्षjण कर रहा है.

इस महाविकारी भौतिकतावाद की प्रभूत प्राप्तियों से प्रोत्साहित होकर इस व्याधि के प्रसारकर्ताओं ने समाज के मनस्तत्व पर अपनी पकड़ पुख्ता कर ली है.उपचार के व्यक्तिगत और सामूहिक प्रयास प्रत्येक स्तर पर आवश्यक हैं ताकि बढ़ती जा रही रिश्वतखोरी के दमघोंटू पिंजरे से नागरिक-जीवन को निकाला जा सके.''

आप सोच रहे होंगे कि यह किस जमाने की कानूनी भाषा है. ऐसी अंग्रेजी तो अंग्रेज़ी के महान 14वीं सदी के महान अंग्रेजी के कवि ज्यॉफ्री चौसर के जमाने में भी नहीं लिखी गई. इस बात पर हैरान मत होइए कि यह गुरु-ज्ञान  भारत की अदालत के एक फैसले में दिया गया है. वह भी 21 वीं सदी के दूसरे दशक में!

जज का हक है कि वह अपने फैसले में भाषा का जौहर दिखाए. जज के इस अधिकार की हर हालत में इज्जत की जानी चाहिए. इसपर किसी को क्या ऐतराज हो सकता है? लेकिन यहां एक सवाल पूछना बनता है. सवाल यह कि फैसला लोगों को समझ में आये इस बात को अदालत कितना अहम मानती है ?

छोड़ दें ऐसे हजारों हजार मामलों को. यहां नुक्ते की बात कहने के लिए मिसाल के तौर पर इसी मामले को देखें जिसमें शशिकला को कई सालों की जेल होनी थी और तमिलनाडु सियासी भंवर में पड़ा हुआ था.

आम आदमी को समझ में आए ऐसा नहीं हो सकता?

क्या यह बेहतर नहीं होगा कि अदालत अपनी अंग्रेजी भाषा को नये रंग-रुप में ढाले, ऐसी भाषा का अधिक से अधिक फायदा उठाते हुए इसका इस्तेमाल लोगों को शिक्षित करने में करे?

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वादी-प्रतिवादी के रुप में हमारा आधा वक्त तो इसी मगजमारी में गुजर जाता है कि दरअसल हमारा वकील कह क्या रहा है. अपनी बेचारगी में हम बस वकील की बातों पर ‘हां’ में सिर हिलाते हैं.

नेता सीख गए आप भी कोशिश कीजिए

जमाना झटपट पाठ रचने का है. छोटे-संक्षिप्त संदेश गढ़िए और तुरंत-फुरंत भेजिए. ऐसे वक्त में हमारे राजनेता भी अपनी लंबी-चौड़ी सियासी कहानी को 140 अक्षरों की चौहद्दी में समेटकर पेश कर रहे हैं.

दूसरी तरफ अदालत है जहां वक्त की मांग से बेमेल एक ऐसी ठहरी हुई भाषा लिखने का चलन है जिसे पढ़कर देश की एक फीसद आबादी भी नहीं समझ सकती कि आखिर कहा क्या गया है.

ऐसा जान पड़ता है मानो कोई शब्दकोश खोलकर बैठा हो और सरल शब्दों के कठिन पर्यायवाची खूब जतन से चुनकर एक खास असर पैदा करने के लिए उन्हें तरतीब से सजा रहा हो.

अदालत के बहुत से अहम फैसले सिर्फ अंग्रेजी में लिखे होते हैं, सो ज्यादातर लोगों के पल्ले नहीं पड़ते. तिसपर सितम ये कि लार्ड मैकाले की जबान में लिखे इन अदालती फैसलों की भाषा- शैली इतनी जलेबीदार होती है कि उनके रूपक और उपमा-उपमान को समझने में खूब अंग्रेजी पढ़ा-लिखे आदमी की भी सांस उखड़ जाएं.

अदालत का फैसला एक पुल की तरह होता है, यह जनता और कानून को आपस में जोड़ने वाला पुल है लेकिन भाषा के दुरुह होने से यही पुल एक खाई में तब्दील हो जाता है. लोगों की समझ के आगे खड़ी इस बाधा को दूर करने की जरुरत है.

बुरा ना मानें लेकिन ये हिंगलिश का जमाना है 

यह 2017 का हिंदुस्तान है जब अंग्रेजी पर हिंदुस्तानीपन का छौंक लग चुका है. टाइमपास, बिंदास, बंदोबस्त और घेराव जैसे शब्द हमारे अंग्रजी बोल-चाल में सहज भाव से अपना लिए गए हैं.

ऊपर के पैरे में जैसी अंग्रेजी दिख रही है वैसी अंग्रेजी में अब कोई लेखक नहीं लिखता. यह अंग्रेजी ना तो अब स्कूल-कॉलेज में चलती है, ना मीडिया में और ना ही लोगों के बोल-चाल में ही उसके दर्शन होते हैं.

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इस अंग्रेजी का हमारी नयी पीढ़ी के लिए कोई मायने-मतलब नहीं. हमारी फिल्म, किताब, समाचार कहीं भी इस भाषा का बरताव नहीं होता तो फिर अदालत की ही जबान इतनी दुरुह क्यों बनी रहे?

शायद कानूनी मामलों को जानकार इस बात पर कुछ और रोशनी डाल सकें कि ऐसी घिसी-पिटी भाषा क्यों जारी है. लेकिन यह बात तय है कि कानून जब ज्यादा समझ में आये तो इंसाफ में आसानी होती है.

अगर अदालत ‘ इन सो फॉर मच’ और ‘हिथरटोफोर’ सरीखी भाषा में ना लिखकर, जो कुछ कहना हो उसे नये तर्ज के सीधे-सरल शब्दों में लिखे तो शायद लोगों को ज्यादा जानकारी मिलेगी.

कल्पना करें कि कोई ऊपर के पैराग्राफ का किसी और भाषा में अनुवाद करना  चाहे तो क्या होगा. वही होगा जो हमने किया.

दरअसल, ऊपर के पैरे के अनुवाद की कोशिश वैसी ही होगी जैसे पत्थर पर सिर मारना!

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