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सरदार सरोवर बांध: नर्मदा का आशीर्वाद या एक नदी की हत्या?

सरदार सरोवर के दुष्प्रभावों को समझने के लिए हमारे पास पहले से कई उदाहरण मौजूद हैं

Animesh Mukharjee Animesh Mukharjee Updated On: Sep 18, 2017 11:40 AM IST

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सरदार सरोवर बांध: नर्मदा का आशीर्वाद या एक नदी की हत्या?

नर्मदा नदी पर बन रहे सरदार सरोवर बांध का रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उद्घाटन कर दिया. रविवार को केवड़िया में जिस बांध का उद्घाटन हुआ है वो अभी तक पूरा नहीं हुआ है. इससे जुड़ी नहरों का इंफ्रास्ट्रक्चर अभी 30 प्रतिशत ही बन पाया है, साथ ही इसका रिजरवायर भी अभी नहीं भरा गया है.

सरदार सरोवर बांध के समर्थकों का कहना है कि इस परियोजना से पश्चिमी भारत के कई सूखाग्रस्त इलाके हरे भरे हो जाएंगे और बिजली की समस्या दूर होगी. दूसरी तरफ इसका विरोध करने वाले इसे नर्मदा नदी की हत्या करना बता रहे हैं. वर्ल्ड बैंक और जापान पहले ही इस परियोजना को फंड करने से मना कर चुके हैं.

सरदार सरोवर बांध एक जलाशय पर आधारित परियोजना है. उत्तराखंड का टिहरी बांध भी लगभग ऐसी ही परियोजना पर आधारित है. टिहरी का भी एक समय पर काफी विरोध हुआ था. सरदार सरोवर के क्या प्रभाव होंगे वो आज टिहरी के आसपास के इलाकों की हालत देख कर समझा जा सकता है.

हमने एक बहुत बड़े बांध बनने के प्रभावों को जानने के लिए टिहरी बांध के आस-पास रह रहे लोगों और एक्सपर्ट्स से बात की ताकि वहां इस समय लोगों पर पड़ रहे प्रभाव के जरिए नर्मदा विस्थापितों के भविष्य का अंदाजा लगाया जा सके.

बांध का विरोध लंबे समय से चल रहा है. फोटो सोर्स- रॉयटर्स

बांध का विरोध लंबे समय से चल रहा है. फोटो सोर्स- रॉयटर्स

अपने ही देश में बेगाने हो गए लोग

रिजरवायर से जुड़े बांधों की सबसे बड़ी समस्या विस्थापन है. माना जा रहा है कि सरदार सरोवर बांध के चलते भी 5 लाख से ज्यादा लोग विस्थापित होंगे. ये विस्थापन दो तरह का होता है पहला जिसमें लोगों को पूरी तरह से विस्थापित होना पड़ता है. दूसरा जिसमें लोग बांध के आसपास ही रहते हैं मगर उनकी जमीन आदि का कुछ हिस्सा बांध की जद में आता है.

पूरी तरह से विस्थापितों की समस्याएं

टिहरी के कई विस्थापितों को सरकार ने ऋषिकेश के आसपास बसाया है. इनके साथ सबसे बड़ी समस्या पहचान की है. इनकी जमीनें पुरानी संपत्ति टिहरी बांध के नाम हो गई है, जिसके चलते इन विस्थापितों को अपने तमाम पहचान पत्र जैसे आधार कार्ड, पासपोर्ट बनवाने में बड़ी समस्याएं आती हैं. कुछ एक विस्थापित तो ये तक कहते हैं कि लगता है हम अब इस देश के नागरिक रहे ही नहीं.

जो छूट गए वो नरक के भागी हैं

उत्तराखंड से जुड़े जियोलॉजिस्ट डॉ मोहन सिंह पंवार कहते हैं कि असल प्रभावित वो होते हैं, जो बांध के आसपास रह जाते हैं. सरकार इन्हें विस्थापित नहीं मानती और ये कई पीढ़ियों तो तक इन प्रभावों को जीने के लिए बाध्य हो जाते हैं. टिहरी के आसपास 120-130 गांव इसी तरह से प्रभावित हैं.

सबसे पहला प्रभाव रिजरवायर के आसपास के गांवों के कुछ हिस्से डूबने का पड़ता है. हर गांव का अपना एक ईको सिस्टम होता है जिसमें खेत के साथ-साथ लकड़ी लाने के लिए जंगल और जानवरों के लिए चारागाह भी बराबर जरूरी होते हैं. इन गांवों में बांध के चलते चारागाह और आसपास के जंगल अक्सर डूब जाते हैं जिससे इनका पूरा तंत्र बिखर जाता है.

जलाशय मौसम को बदल देता है

बांध के बनने का सबसे बड़ा असर इलाके की जलवायु पर पड़ता है. डॉ पंवार बताते हैं कि जलाशय के दो खराब असर पड़ते हैं. एक तो इन जलाशयों में तमाम पेड़ पौधे, गाद और दूसरी चीजें डूब जाती हैं जिनके चलते मीथेन गैस बड़ी मात्रा में बनती हैं. इन ग्रीनहाउस गैसों की वजह से ग्लोबल वॉर्मिंग भी बढ़ती है और इलाके के लोगों की बीमारियां भी बढ़ जाती हैं.

जलाशय एक और तरह से इलाके की आबोहवा पर फर्क डालता है. बड़ी मात्रा में पानी जमा होने के चलते माइक्रोलेवल क्लाइमेट चेंज होते हैं और ह्यूमिडिटी (उमस) बहुत बढ़ जाती है. इन सबके साथ ही कई और समस्याएं भी हैं. जैसे टिहरी के जिन गांवों से बड़े अस्पताल पहले 25-30 किलोमीटर दूर थे अब 150 किलोमीटर तक दूर हो गए हैं.

सरदार सरोवर बांध में और क्या समस्याएं हो सकती हैं

सरदार सरोवर बांध के संभावित खतरों में से एक भूकंप की आशंका है. गुजरात और महाराष्ट्र पिछले कुछ दशकों में कई भीषण भूकंप देख चुके हैं. एक्सपर्ट्स बताते हैं कि इतनी बड़ी तादाद में जमा होने वाला पानी ज़मीन में भूकंप आने की संभावनाओं को बढ़ाता है. माना जा रहा है कि इस प्रभाव की जद में इंदौर तक आएगा.

इस बांध की दूसरी समस्या अभी भी नहर इंफ्रास्टक्चर का पूरा न होना है. बांध में अब तक 56,000 करोड़ की लागत लग चुकी है और माना जा रहा है कि इतनी ही लागत और लगने की संभावना है. ऐसे में जिन इलाकों में सही में ज़रूरत है वहां पानी पहुंचने में अभी बहुत लंबा वक्त लगेगा.

बांध के विरोध में अनशन पर बैठी मेधापाटकर फोटो सोर्स- रॉयटर्स

बांध के विरोध में अनशन पर बैठी मेधापाटकर फोटो सोर्स- रॉयटर्स

कुल मिला कर ये कहा जा सकता है कि देश की तरक्की के लिए बिजली और दूसरे इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत है. बांध बनाना इसका एक उपाय है मगर इस तरह की किसी भी परियोजना के लिए तमाम दूसरे पहलुओं का ध्यान रखा जाना चाहिए जो नहीं होता है.

सरदार सरोवर बांध की परिकल्पना आज से 60-70 साल पहले रखी गई थी. तब से अब तक दुनिया बहुत बदल चुकी है. ग्लोबल वार्मिंग एक समस्या बन गई है. उस जमाने में भूकंप और ग्रीन हाउस गैसों पर इतना अध्ययन नहीं हुआ था. ऐसे में सरकार को चाहिए था कि वो अतीत का जरूरत से ज्यादा गौरवगान करने की जगह आज के मानकों पर योजना को आगे बढ़ाती, जो नहीं हुआ है.

भारत की राजनीति में हमने चुनावों के चलते कई बार आधी-अधूरी तैयारियों के साथ लिए गए फैसले और उनके दुष्प्रभाव देखे हैं. ऐसे में शक होता है कि कहीं सरदार सरोवर बांध को आधी-अधूरी तैयारी के साथ शुरू कर देना भी आने वाले गुजरात चुनावों की हड़बड़ाहट का हिस्सा तो नहीं.

जिन लोगों की जमीन और रोजीरोटी पर आगे चलकर विकास होगा उनके लिए अज्ञेय की कविता याद आ रही है,

जो पुल बनाएंगे वे अनिवार्यत: पीछे रह जाएंगे. सेनाएँ हो जाएंगी पार मारे जाएंगे रावण जयी होंगे राम, जो निर्माता रहे इतिहास में बन्दर कहलाएंगे

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