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आसाराम पर फैसला: पंचकूला हिंसा से सबक लेकर सफल हुई राजस्थान पुलिस

ऐसा लगता है कि राजस्थान पुलिस ने पूर्व के अनुभवों से सबक सीखा है, 2013 में आसाराम के जेल जाने पर उसके ताकतवर समर्थकों की तोड़फोड़ और बीते साल अगस्त में राम रहीम के भक्तों की पुलिस से भिड़ंत.

Sat Singh Updated On: Apr 26, 2018 12:44 PM IST

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आसाराम पर फैसला: पंचकूला हिंसा से सबक लेकर सफल हुई राजस्थान पुलिस

जोधपुर में भी 25 अगस्त, 2017 की पंचकूला जैसी हिंसा और हंगामा हो सकता था, जहां एक और स्वघोषित धर्मगुरू गुरमीत राम रहीम सिंह को रेप में सजा सुनाई गई थी. लेकिन 25 अप्रैल को कुछ भी अलग नहीं हुआ. आसूमल सिरुमलानी उर्फ आसाराम की खबर ने मीडिया और ऑनलाइन में बवंडर मचा रखा था, लेकिन जमीनी तौर पर काफी बेचैनी भरी शांति बनी रही. जिस देश ने बीते कुछ महीनों में हिंसक प्रदर्शनों की श्रृंखला देखी हो, एक और पुनरावृत्ति से बच गया.

जोधपुर किस तरह एक ठग बाबा को रेप केस में सजा होने पर उनके अंधभक्तों के हुल्लड़ से बचा, सवाल पेश करता है जिसका जवाब पाने के लिए शहर के हर गली-कोने में दिख रही पुलिस से परे जाकर देखना होगा. यह सवाल हरियाणा पुलिस के एक अधिकारी का है. वह कहते हैं कि दो राज्यों की पुलिस के बीच सीधी तुलना में वह बात सामने नहीं आ पाएगी, जो जोधपुर में काम कर गई और पंचकूला में नाकाम रही. स्पेशल एससी/एसटी कोर्ट द्वारा वर्ष 2012 के रेप केस में जिस जोधपुर जेल में आसाराम को आजीवन कारावास का फैसला सुनाया गया, वहां पांच साल की कैद काट चुका था.

‘हरियाणा की मिलीभगत’

ऐसा लगता है कि राजस्थान पुलिस ने पूर्व के अनुभवों से सबक सीखा है, जब 2013 में आसाराम के जेल जाने पर उसके ताकतवर समर्थकों ने तोड़फोड़ शुरू कर दी थी और जब बीते साल अगस्त में डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख राम रहीम के भक्तों और पुलिस के बीच भिड़ंत हो गई थी. सीबीआई कोर्ट द्वारा राम रहीम को मुजरिम ठहराए जाने पर भड़की हिंसा में कम से कम 38 लोग मारे गए और सैकड़ों जख्मी हुए, जिनमें से ज्यादातर पंचकूला में जमा हुए डेरा समर्थक थे.

मध्य प्रदेश में पुलिस महानिदेशक पद से रिटायर हुए नंदन दुबे कहते हैं कि ऐसे मामलों में इंटेलिजेंस की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है.

दुबे कहते हैं कि 'धारा 144 (जोधपुर में) लागू करने के साथ ही पुलिस ने पूरा इंतजाम किया कि कोई इसका उल्लंघन ना कर सके. यह दिखाता है कि इन्होंने इंटेलिजेंस इनपुट का समझदारी के साथ इस्तेमाल किया. ऐसे मामलों में इंटेलिजेंस इनपुट की मदद लेकर ही रणनीति बनाई जानी चाहिए.'

वरिष्ठ पत्रकार ललित शास्त्री कहते हैं कि डेरा समर्थकों के मामले में हरियाणा सरकार की मिलीभगत बहुत साफ थी. शास्त्री कहते हैं कि, 'अगर पुलिस चाहती तो कोई उसके आदेश का उल्लंघन नहीं कर सकता था. लेकिन उन्होंने लिखित आदेश होने के बाद भी पंचकूला में धारा 144 लगाने की कोशिश भी नहीं की, जिसके चलते शहर में भारी संख्या में डेरा समर्थक जमा हो गए. पंचकूला में इंटेलिजेंस इनपुट की पूरी तरह अनदेखी की गई.'

सिरसा और पंचकूला हिंसा के केंद्र थे और अन्य जिलों से भी हिंसा की खबरें आ रही थीं, और हरियाणा पुलिस को हिंसा पर रोक लगाने की कोशिशों के बीच सेना को तैयार रहने को कहना पड़ा.

डेरा का प्रभाव

जोधपुर में एक प्रशासनिक अधिकारी अपना नाम छापने से मना करते हुए कहते हैं कि आसाराम पांच साल से जेल में है, उसका अपने विशाल संख्या में मौजूद समर्थकों से सीधा संपर्क नहीं है और उसके करीबी मैनेजर उसके साम्राज्य का कामकाज संभाल रहे हैं. उसका बेटा नारायण साई भी रेप के एक मामले में जेल में है. जबकि राम रहीम सीबीआई कोर्ट द्वारा रेप का मुजरिम ठहराए जाने से पहले तक अपनी बनाई एमएसजी सूरीज की फिल्मों के सुपरमैन की तरह जेड-प्लस सिक्योरिटी के घेरे में रहता था. सत्तारूढ़ दल के नेताओं की वो तस्वीरें हेडलाइंस बनती थीं, जिनमें वो सिरसा में डेरा मुख्यालय में राम रहीम के पैर छूते दिखते थे. खेल मंत्री अनिल विज ने तो स्थानीय खेलों को बढ़ावा देने नाम पर 50 लाख रुपये का अनुदान सिरसा डेरा को देने का ऐलान किया, हालांकि असल में यह 2014 में हरियाणा में पहली भगवा सरकार बनवाने में राम रहीम की मदद के एवज में रिटर्न गिफ्ट था. दोषी ठहराए जाने से कुछ महीने पहले करनाल में मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर स्वच्छता अभियान के एक कार्यक्रम में राम रहीम के साथ एक ही मंच पर नजर आए थे.

राजस्थान पुलिस की सक्रियता

जोधपुर में राजस्थान पुलिस ने आसाराम के वफादारों पर निशाना साधा और बवाल पैदा करने वाले फैसले से कई दिन पहले 2,500 से ज्यादा पुलिस वालों की तैनाती कर दी. इसके साथ ही उन्होंने फैसले वाले दिन अचानक हिंसा की आशंका को देखते हुए पांच बटालियन पैरा-मिलिट्री फोर्स की भी मांग भेज दी थी. जोधपुर में पुलिस ने जिस प्रोफेशनल तरीके से काम किया, वह बताता है कि उन पर कोई राजनीतिक दबाव नहीं था.

अहमदाबाद में आसाराम केएक आश्रम के बाहर पुलिस तैनात की गई थी. (फोटो- पीटीआई)

अहमदाबाद में आसाराम केएक आश्रम के बाहर पुलिस तैनात की गई थी. (फोटो- पीटीआई)

जिन राज्यों में आसाराम का अच्छा आधार है, मुसीबत पैदा करने वालों पर लगाम लगाने के लिए वहां से आने वाले वाहनों की बारीकी से जांच की जा रही थी. शहर में दाखिल होने और निकलने के सभी रास्तों पर निगरानी रखी जा रही थी. जोधपुर कमिश्नर ने ट्विटर पर कह दिया था कि समाजविरोधी तत्वों से सख्ती से निपटा जाएगा. उन्होंने सोशल मीडिया चैनलों पर डाले जाने वाले किसी भी तरह के भड़काऊ कंटेंट पर निगरानी रखने के लिए भी एक टीम सक्रिय कर दी थी.

लखनऊ यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान के प्रोफेसर पी.सी. मिश्रा बताते हैं कि दोनों मामलों में एक महत्वपूर्ण अंतर यह था कि राम रहीम सुनवाई के दौरान जेल से बाहर था और नियमित रूप से अपने समर्थकों के साथ बैठकें कर रहा था, जबकि आसाराम अपने कम होते करिश्मे के साथ करीब पांच साल से जेल में बंद था. वह कहते हैं कि अगर कोई जेल के अंदर है , तो उसके लिए अपने समर्थकों को काबू में रखना असंभव हो जाता है. प्रोफेसर पी.सी. मिश्रा के अनुसार, 'यह दिखाता है कि आसाराम के समर्थकों का उस पर से भरोसा उठ गया है और उन्होंने आसानी से फैसला स्वीकार कर लिया. इसका दूसरा पहलू यह हो सकता है कि मीडिया में जोधपुर में सुरक्षा प्रबंध को लेकर चर्चाओं से अंधभक्त गिरफ्तारी या जख्मी हो जाने से डर गए.'

पंचकूला में, धारा 144 लगाने के बावजूद रेपिस्ट बाबा के समर्थक सीबीआई कोर्ट परिसर के करीब या जहां कहीं भी वो पैदल पहुंच सकते थे, वहां तक पहुंचते और जमा होते रहे.

शिक्षा मंत्री रामबिलास शर्मा ने तो यहां तक कह दिया था कि निषेधाज्ञा के आदेश राम रहीम के भक्तों के लिए नहीं हैं और सरकार की तरफ से उनको खाना-पानी मुहैया कराना चाहिए. पंचकूला के डीसीपी अशोक कुमार ने भी यह कर निषेधाज्ञा के आदेश को हल्का किया कि आदेश सिर्फ हथियार लेकर आने वाले लोगों के लिए है, अन्य लोगों के लिए नहीं. डेरा समर्थकों को दबाव बनाने और अपनी ताकत का प्रदर्शन करने का भरपूर वक्त दिया गया.

हालांकि एक पीटीआई रिपोर्ट के अनुसार हरियाणा सरकार के एडिशनल चीफ सेक्रेटरी (होम) राम निवास के यह कहने के बाद कि डिप्टी पुलिस कमिश्नर (पंचकूला) द्वारा त्रुटिपूर्ण निषेधाज्ञा आदेश जारी किए जाने के बड़ी संख्या में डेरा समर्थक पंचकूला में जमा हुए, डीसीपी अशोक कुमार को निलंबन का सामना करना पड़ा.

जोधपुर पुलिस ने सुनवाई के मद्देनजर किसी बवाल से बचने के लिए बड़ी तैयारियां कर रखी थी. (फोटो- पीटीआई)

जोधपुर पुलिस ने सुनवाई के मद्देनजर किसी बवाल से बचने के लिए बड़ी तैयारियां कर रखी थी. (फोटो- पीटीआई)

पहले से की गई थीं बड़ी तैयारियां

जोधपुर डीआईजी विक्रम सिंह ने फ़र्स्टपोस्ट को बताया कि उनका काम पहले ही नाकेबंदी कर देना था. विक्रम सिंह ने बताया कि, 'सिर्फ जज, वकील को जेल के अंदर जाने की इजाजत थी, जहां आसाराम का फैसला सुनाया गया. मुख्य द्वार पर सीसीटीवी कैमरा लगा दिया गया था और आसाराम के समर्थक अगर घुसपैठ की कोशिश करें तो उनको कैद रखने के लिए दो अलग जगहों पर अस्थायी जेल बना दी गई थीं.'

जोधपुर के डीसीपी अमनदीप कपूर का कहना है कि आसाराम के मुकदमे में अग्रिम तैयारियां अनचाही घटनाएं रोकने में फायदेमंद रहीं. वह कहते हैं कि आसाराम की अपने समर्थकों से शांति बनाए रखने की अपील ने भी काफी हद तक काम किया.

कपूर बताते हैं कि, 'चूक की कोई गुंजाइश नहीं थी. अगर कोई भी चूक हो जाती तो हमारे पास टीम तैयार थी, जो अपने स्तर पर हालात से निपटती.' राजस्थान पुलिस ने पड़ोसी जिलों की पुलिस को भी सावधान कर दिया था कि वो 25 अप्रैल तक आसाराम के समर्थकों को जोधपुर ना जाने दें. पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने 2017 की घटना में ‘राजनीतिक मकसद’ के लिए आम लोगों की जिंदगी खतरे में डाल देने के लिए केंद्र और राज्य सरकार की खिंचाई की थी. हाईकोर्ट की फटकार के बाद हरियाणा पुलिस महानिदेशक कानून हीनता की स्थिति को संभालने के लिए फौज की बटालियन के साथ सक्रिय हुए लेकिन तब तक उस भीड़ को काबू करने में काफी देरी हो चुकी थी, जिसे उन्होंने ही आमंत्रित किया था.

जोधपुर में संगीता शर्मा और भोपाल में शहरोज अफरीदी के इनपुट के साथ.

(कॉन्ट्रीब्यूटर फ्रीलांस राइटर हैं और देशव्यापी जमीनी पत्रकारों के नेटवर्क 101reporters.com के सदस्य हैं)

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