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असम: बच्चों पर जबरदस्ती 'संस्कृत' थोपने से किसका भला होगा?

असम में तीसरी भाषा के रूप में अनिवार्य वहां के बोलचाल की भाषा 'बोडा' भी हो सकती है

Mayur Bora Updated On: Mar 09, 2017 08:55 AM IST

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असम: बच्चों पर जबरदस्ती 'संस्कृत' थोपने से किसका भला होगा?

आयरिश नाटककार और आलोचक जॉर्ज बर्नार्ड शॉ की कही एक बात बड़ी मशहूर है कि 'अमेरिका और इंग्लैंड ऐसे दो देश हैं जिन्हें एक साझा भाषा ने बांटा है.' उन्हें साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार मिला था. अपने शानदार साहित्यिक योगदान के अलावा वह अपनी हाजिर जवाबी के लिए भी जाने जाते थे.

आजकल असम में कई ताकतवर संगठन, एक भाषा को लेकर विरोध प्रदर्शन और रैलियां कर रहे हैं. यह भाषा है संस्कृत. असम कई दिनों से उबल रहा है और ये उबाल राज्य के शिक्षा मंत्री डॉ हिमांता विस्वा शर्मा की घोषणा के बाद आया है. उन्होंने कहा कि, राज्य सरकार ने सभी सरकारी स्कूलों में आठवीं क्लास सभी छात्रों के लिए संस्कृत को एक अनिवार्य विषय बनाने का फैसला लिया है. इस घोषणा के साथ ही, असम में लगभग हर किसी को संस्कृत का भूत सता रहा है.

भाषा पर बवाल

साफ तौर पर लगता है कि एक अतिउत्साहित सरकार ने यकायक यह फैसला अपने वैचारिक आकाओं को खुश करने के लिए लिया है. इसे देख कर लग रहा है उन लोगों के तार नागपुर के उसी मशहूर पते से जुड़े दिखते हैं.

चूंकि केंद्र में एनडीए की मजबूत सरकार है, इसलिए हो सकता है कि बहुत से दूसरे बीजेपी शासित राज्यों में भी यही लक्षण देखने को मिले. जिससे एक भाषा के प्रति सम्मान दिखाने के नाम पर देश भर में शैक्षणिक रूप से दमघोटू माहौल पैदा होगा. इसीलिए किसी एक भाषा को थोपे जाने के फैसले पर ठंडे दिमाग से विचार किए जाने की जरूरत है.

पाठकों को याद ही होगा कि, पूर्व मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने सभी केंद्रीय विद्यालयों में जर्मन के स्थान पर तीसरी भाषा के रूप में 'संस्कृत' पढ़ाने का आदेश दिया था तब कितना हंगामा हुआ था. उनका यह आदेश आरएसएस के संस्कृत भारती जैसे संगठनों की इच्छा के अनुरूप ही था. ये संगठन चाहते हैं कि सभी स्कूलों में संस्कृत को अनिवार्य कर दिया जाए.

इसके बाद भी, मौजूदा एचआरडी मिनिस्टर प्रकाश जावड़ेकर के तहत, केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने त्रिभाषा फॉर्मूला को दसवीं कक्षा तक लागू करने की इच्छा जताई. साथ ही जावड़ेकर ने भरोसा दिलाया कि स्कूलों में कोई भाषा थोपी नहीं जाएगी.

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त्रिभाषा फॉर्मूला

राष्ट्रीय शिक्षा नीति में दिए गए त्रिभाषा फॉर्मूला के तहत हिंदी भाषी राज्यों में छात्रों को हिंदी और अंग्रेजी के अलावा कोई एक आधुनिक भारतीय भाषा भी सीखनी चाहिए. जबकि गैर हिंदी भाषी राज्यों में छात्र अपनी क्षेत्रीय भाषा और अंग्रेजी के अलावा हिंदी सीखनी चाहिए. शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले ज्यादातर अकादमिक और शिक्षाविदों ने यह फॉर्मूला स्वीकार किया था.

लेकिन असम की सरकार एक अलग ही रास्ते पर जा रही है. वह राज्य के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों को बलि का बकरा बना रही है. विपक्षी पार्टियों के अलावा, असॉम गण परिषद (एजीपी) और बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट (बीपीएफ) जैसे बीजेपी के सहयोगी दलों ने भी छात्रों के व्यापक हित में 'संस्कृत' लागू करने के फैसले को वापस लेने को कहा है.

तीन शक्तिशाली गैर राजनीतिक संगठनों ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (एएएसयू), असॉम जातीयबादी युबा छात्र परिषद (एजेवाईसीपी) और कृषक मुक्ति संग्राम समिति (केएमएसएस) ने भी इस कदम के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराया है.

सिर्फ आरएसएस से जुड़े दक्षिणपंथी छात्र संघ एबीवीपी और राज्य की ब्राह्मण आबादी के एक वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाले एक अनजाने से संगठन ने इस कदम का स्वागत किया है.

भाषा की सियासत

यह बात भी दिलचस्प है कि बीपीएफ की नेता और राज्य की वन मंत्री प्रमिला रानी ब्रह्मा ने संकेत दिया है कि, कैबिनेट ने पहले ही इस फैसले की पुष्टि कर ली है  लेकिन अगर जरूरत पड़ी तो दोबारा विचार हो सकता है.

कुछ विश्लेषक मानते हैं कि ब्राह्मण इसलिए भी इस फैसले के पक्ष में हो सकते हैं क्योंकि प्रतिबंधित वार्ता विरोधी उल्फा-आई ने संस्कृत के स्थान पर 'बोडो' भाषा को अनिवार्य बनाने की मांग की है. संख्या के हिसाब से असम में बोडो सबसे बड़ा स्थानीय आदिवासी समुदाय है. उनकी विरासत सामाजिक-सांस्कृतिक और साहित्यिक रूप से बहुत समृद्ध रही है. प्रमिला रानी ब्रह्मा भी एक वरिष्ठ बोडो नेता हैं.

असम में सौ साल पुरानी प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था असॉम साहित्य सभा और बहुत से बुद्धिजीवियों ने भी सरकार के फैसले का विरोध किया है. उनका कहना है कि संस्कृत की बजाय इतिहास और भूगोल पढ़ाना कहीं ज्यादा अहम है.

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संस्कृत एक ‘मृत भाषा’

इस संदर्भ में एक जरूरी सवाल ये उठता है कि, असम का एक बड़ा हिस्सा और खास तौर से ब्रहमपुत्र घाटी क्यों सरकार के फैसले का इतना कड़ा विरोध कर रही है? क्या असमिया भाषा का संस्कृत से कोई संबंध नहीं रहा है?

असम के ज्यादातर शिक्षित और पढ़े लिखे लोग संस्कृत भाषा के प्रति कोई दुर्भावना नहीं रखते. बल्कि इस भाषा के प्राचीन गौरव और इसकी वास्तविक सुंदरता के लिए उनकी नजरों में बहुत सम्मान है. किसी को इस बात से इनकार नहीं है कि एक अद्भुत आधुनिक भाषा के रूप में असमिया के विकास पर संस्कृत का कितना सकारात्मक असर रहा है.

आज असमिया लाखों लोगों के दिलों में बसती है. तमिल और कुछ अन्य आदिवासी बोलियों को छोड़कर अन्य सभी भारतीय भाषाओं की जड़ें संस्कृत में ही हैं, ये सभी इसी से जन्मी हैं. लेकिन साथ ही साथ, इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि संस्कृत अब एक मृत भाषा है.

लोगों को इस बात से ठेस पहुंच सकती है. 'संस्कृत' भारत में अब वैसी ही है जैसे यूरोप में लैटिन. इसका आधुनिक इस्तेमाल बहुत ही सीमित है, ज्यादातर जगहों पर सिर्फ पुजारी ही इस भाषा का इस्तेमाल करते हैं.

पुराने समय भी ये भाषा ज्यादातर ब्राह्मण ही इस्तेमाल करते थे क्योंकि बुद्ध, महावीर और अशोक ने तो लोगों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए पाली और प्राकृत भाषाओं का सहारा लिया था. यही वजह है कि व्याकरण के लिहाज से मजबूत और भाषाई दृष्टि से खूबसूरत होने के बावजूद, संस्कृत आम लोगों की भाषा नहीं रही.

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धार्मिक पहचान

जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता गया, धीरे धीरे यह धारणा भी बनती गई कि संस्कृत मुख्य रूप से हिंदू धर्म से जुड़ी है, जिससे आम लोगों के बीच इसका दायरा और सिमट गया. हालांकि यह धारणा गलत है क्योंकि संस्कृत में बहुत सारा धर्मनिरपेक्ष साहित्य मौजूद है. लेकिन यह धर्मनिरपेक्ष साहित्य भाषा की धार्मिक छवि से आजाद नहीं हो पाता.

इन्हीं कारणों से लोग संस्कृत को अनिवार्य बनाने का विरोध कर रहे हैं. कोई भी छात्रों के लिए एक वैकल्पिक विषय के तौर पर इसे हटाने की मांग नहीं कर रहा है. बहुत से शिक्षाशास्त्री सरकार से कहते रहे हैं कि वह 'संस्कत' टोल में सुविधाएं बढ़ाए. संस्कृत टोल ऐसे सरकारी स्कूल है जहां मुख्य तौर पर प्राचीन लिपियां पढ़ाई जाती हैं. कुछ साल पहले राज्य में संस्कृत यूनिवर्सिटी की स्थापना भी की गई.

यह विडंबना ही है कि सरकार अपने हालिया फैसले से आरएसएस की नजरों में अपनी अहमियत बढ़ाने की कोशिश में लगी है, लेकिन जायज मांगों की तरफ उसका कोई ध्यान नहीं है. इससे पता चलता है कि, ये फैसला सिर्फ सियासी फायदे के लिए लिया गया है.

दूसरा, यह फैसला भेदभाव वाला है क्योंकि पूरी आबादी के आर्थिक रूप से कमजोर तबकों को लेकर पूर्वाग्रह से गस्त है. निर्देशों के मुताबिक, सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों को अनिवार्य रूप से संस्कृत पढ़नी होगी. लेकिन मंत्रियों, नौकरशाहों और अन्य प्रभावशाली लोगों के बच्चे तो शायद ही इन स्कूलों में जाते हैं. इसलिए उन लोगों को इस आदेश का पालन करने की जरूरत नहीं पड़ेगी.

संस्कृत को एक मृत भाषा कहें या फिर एक गौण भाषा, यह एक व्यापक अकादमिक बहस का विषय हो सकता है. फिर भी असम सरकार अपने फैसले पर कायम रहती है, तो आने वाले दिनों में प्रतिरोध और तेज होगा. उम्मीद है कि सरकार को सदबुद्धि आएगी और वह जनता के मूड को जल्दी समझेगी.

( मयूर बोरा एक जाने माने लेखक हैं और उनका ट्विटर हैंडल @mayurbora07 है.)

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