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भंसाली थप्पड़ प्रकरण: मानो दिल सिर्फ आहत होने की मशीन रह गया है!

ऐसी घटना पर लगाम लगाना संभव नहीं. वह भी तब जब राजनीति से इसे संजीवनी मिलती रही हो.

Updated On: Jan 30, 2017 08:34 AM IST

Tarun Kumar

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भंसाली थप्पड़ प्रकरण: मानो दिल सिर्फ आहत होने की मशीन रह गया है!

इतिहास सिर्फ करिश्माई किरदारों के कारनामों का पुलिंदा नहीं, बल्कि अपने आम में सबसे बड़ा जादुई किरदार होता है. इतिहास से प्रेरित पटकथा अनचाही, अप्रत्याशित और अविश्वयनीय नाटकीयता की पृष्ठभूमि रचती है. ऐसी फंतासी सिने पटकथा के इर्द-गिर्द आकस्मिक, आपात और अप्रत्याशित घटनाओं का एक वलय चक्कर काटता रहता है.

संजय लीला भंसाली इस वलय के घेरे में आने वाले पहले और आखिरी फिल्मकार या कलाकार नहीं हैं. उन पर थप्पड़ प्रहार की नाटकीयता में राजनीति-पोषित धार्मिक-जातीय-भाषाई-क्षेत्रीय गोलबंदी की सनातन परंपरा की भूमिका चिह्नित की जा सकती है. ऐसी गोलबंदी जो ऊपरी तौर पर अनेकता में एकता की हमारी अवधारणा के अनुकूल तो दिखती है, पर असल में यह किसी समुदाय को एक गिरोह या जिरगे में तब्दील कर स्वार्थ और भयादोहन की राजनीति की जमीन तैयार करती है.

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मध्यकालीन बर्बरता और असहिष्णुता के सूत्र पर अमल करने वाली इस गोलबंदी के सामने सत्ता प्रतिष्ठान इसलिए बेचारा भूमिका में है, क्योंकि इसे वोटबैंक की राजनीति से ताकत मिलती है.

आहत और मर्माहत भावनाओं की सियासी कीमत समझने वाले नेताओं और राजनीतिक दलों के लिए ऐसी ‘थप्पड़-मार’, ‘स्याही फेंक’, ‘कालिख-पुताई’, ‘जूत-मार’, ‘अंडा-मार’ और ‘कीचड़-उछाल’ बेलगाम वीरता मुफीद साबित होती रही है.

अनेकता में एकता की अवधारणा को भारत की सबसे बड़ी ताकत मानने वाले पंडित नेहरू अगर आज जिंदा होते तो उन्हें ‘मेल्टिंग पॉट बनाम सलाद-बाउल’ की उस थिअरी पर अपना विचार बदलने को विवश होना पड़ता जिसके वे जोरदार प्रशंसक थे.

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नेहरू अनेकता को एकता में विलीन किए जाने के मेल्टिंग पॉट कान्सेप्ट से सहमत नहीं थे. वे ‘सलाद-बाउल’ अवधारणा के प्रबल समर्थक थे जो अनेकता यानी विविधता को एकता के कटोरे में संरक्षित किए जाने की वकालत करती है. उन्होंने उम्मीद जताई थी कि भारत के समाज में कायम जातीय-उपजातीय-भाषाई- क्षेत्रीय-धार्मिक पहचान की परंपरा आधुनिकता की बयार में ढीली पड़ जाएगी.

नेहरू को क्या पता था कि ‘पहचान संकट और पहचान वैशिट्य’ की यह रूढ़िगत सोच आधुनिकता के साथ-साथ गहरी जड़ जमाती जाएगी! देश में पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक ‘सामुदायिक पहचान’ का धंधा करने वाले कितने संगठन सक्रिय हैं, उनकी गिनती करना कठिन है.

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राजपूत महासंघ, जाट महासंघ, भूमिहार महासंघ, ब्राह्मण महासंघ, कुर्मी महासंघ आदि-आदि नाम वाले अनगिनत संगठन जातीय भावनाओं के उभार की सियासत में सक्रिय हैं, वहीं विभिन्न धर्मों, भाषाओं, क्षेत्रों, इलाकों, जनजातीयों के अपने संगठन हैं, जो ‘भावनाओं को आहत‘ करने वाले बयानों, घटनाओं और कार्यक्रमों की बारीक पहचान कर हंगामों, विरोध प्रदर्शनों, रेल रोको आंदोलनों, तोड़-फोड़ आदि की रणनीति पर अमल करते हैं.

ऐसी अराजकता राजनीति से देश को कई राजनीति क्षत्रप मिल चुके हैं. शिवसेना, द्रविड़ दलों, बसपा, सपा, टीएमसी, भाजपा, कांग्रेस सभी ऐसी राजनीति की मलाई काटते रहे हैं सो हुड़दंगियों को राजनीतिक संरक्षण मिलना लाजिमी है. कोई आंबेडकर प्रतिमा का चश्मा गिर जाने से आहत है, तो किसी की संवेदना शिवाजी के घोड़े की पूंछ पर सफेदी लग जाने भर से आहत हो जाती है तो कोई ज्योतिबा फुले की प्रतिमा से माला गिर जाने से आहत है! ऐसा लगता है मानो दिल सिर्फ आहत होने की बेसब्र और लाचार मशीन बनकर रह गया है!

karni sena

‘भावना आहत हो गई’! चार शब्दों का यह वाक्य भारतीय राजनीति को भयादोहन का मुखौटा पहनाता है. राजनीति ऐसे प्रतीकों और शख्सियतों को तलाशती है जिनके बूते जातीय-भाषाई-क्षेत्रीय भावनाओं को उभार कर मनमाफिक फसल काटी जा सके. जिस करणी सेना ने भंसाली की पिटाई की है, उसके कमांडर लोकेंद्र सिंह कालवी राजनीतिक घराने से संबंध रखते हैं. उनके पिता कल्याण सिंह कालवी भैरो सिंह शेखावत के काल में राजस्थान और चंद्रषेखर के काल में केंद्र में मंत्री रहे.

इतिहास के गुमनाम शख्सियत अचानक किसी दल के लिए सबसे बड़े प्रेरणा पुरूष बन जाते हैं. शूद्रों को अपने पाले में करने को आतुर पार्टियों के लिए अचानक राजा सल्हेस सबसे बड़े प्रेरणा स्रोत बन गए. उनकी जयंती मनाने की होड़ लग गई. ऐसा इसलिए, क्योंकि राजनीतिक रूप से सक्रिय दुसाध जाति उन्हें अपना आराध्य मानती है.

बिहार में भूमिहार जाति की रानी रेशमा और दुसाध जाति के राजा चुहरमल की कहानी हाल तक नौटंकियों और लोकगीतों का हिस्सा थी, पर दुसाधों को लुभाने के लिहाज से चुहरमल का किंवदंती मिश्रित इतिहास बड़ा महत्वपूर्ण बन गया है. यह कहानी भले ही भूमिहार जाति के एक बड़े तबके का खून खौलाती हो, पर दुसाधों का वोट पाने को लालायित पार्टियों को अप्रैल में भोजपुर और मगध इलाकों में लगने वाला ‘चुहरमल मेला’ खूब खींचती है.

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ऐसी पहचान को साहित्य और बौद्धिकता का जामा पहनाने की कोशिश पुरानी रही है. 1907 में देवी प्रसाद द्वारा लिखित ‘निषाद वंशावली’, 1912 में मथुरा प्रसाद शर्मा रचित ‘महा लोधी विवेचना’, 1914 में दिलीप सिंह यादव द्वारा रचित ‘अहीर इतिहास की झलक’, आर्य समाजी नेता सत्यव्रत शर्मा द्विवेदी द्वारा लिखित ‘तेलीवर्ण प्रकाष’, 1921 में गंगाप्रसाद गुप्ता द्वारा रचित ‘कोइरी, कच्छी, मुराद और कुशवाहा का इतिहास’ आदि इसके उदाहरण हैं.

जब जातीय चेतना रूढ़िगत सोच और मध्यकालीन जड़ता के चरण में पहुंचकर कुंठित हो जाए तो भंसाली मारपीट प्रकरण जैसी घटनाओं का बैकग्राउंड तैयार होना लाजिमी है. इतिहास से छेड़छाड़ कर मनमाफिक कमर्शियल फायदा उठाने की किसी भी फिल्मकार की कोशिशों की काट सिर्फ बौद्धिक मुठभेड़ हो सकती है, मारपीट नहीं. पर जब तक सामूहिक चेतना में ‘पहचान वैशिष्ट्य’ अपनी जड़ता के साथ कायम है, ऐसी घटना पर लगाम लगाना संभव नहीं. वह भी तब जब राजनीति से इसे संजीवनी मिलती रही हो!

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