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सैफुद्दीन सोज की किताब: कांग्रेस का बुक लॉन्च से किनारा करना पार्टी में एकजुटता कमी को दर्शाता है

कांग्रेस नेताओं से उम्मीद यह की जाती थी कि वह अपने पुराने नेता और लंबे समय के साथी की बुक लॉन्चिंग में मौजूद रहकर बड़ा दिल दिखा सकते थे

Updated On: Jun 27, 2018 02:09 PM IST

Pallavi Rebbapragada Pallavi Rebbapragada

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सैफुद्दीन सोज की किताब: कांग्रेस का बुक लॉन्च से किनारा करना पार्टी में एकजुटता कमी को दर्शाता है

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सैफुद्दीन सोज की किताब 'कश्मीर: ग्लिम्पसेज ऑफ हिस्ट्री ऐंड द स्टोरी ऑफ स्ट्रगल' लॉन्च हो गई है. किताब का विमोचन समारोह सोमवार को दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में हुआ. समारोह में ज्यादातर कश्मीरी एक्सपर्ट नजर आए, जबकि कांग्रेस के तमाम नेता महफिल से नदारद रहे. समारोह के दौरान किताब पर चर्चा भी हुई जिसमें वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर, अरुण शौरी और अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष वजाहत हबीबुल्लाह ने शिरकत की.

सैफुद्दीन सोज ने अपनी किताब की लॉन्चिंग इमरजेंसी की 43 वीं वर्षगांठ पर की. सैफुद्दीन सोज कश्मीरी हैं और प्रोफेसर रहे हैं. वह साल 2006 में मनमोहन सिंह सरकार में जल संसाधन मंत्री भी रह चुके हैं. अपनी किताब की लॉन्चिंग से कुछ दिन पहले सोज के कश्मीर पर दिए बयानों पर खासा हंगामा मचा था. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सोज ने कश्मीर पर पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के एक बयान का समर्थन किया था. सोज ने कहा था, 'मुशर्रफ ने कहा था कि कश्मीरी लोग पाकिस्तान का हिस्सा नहीं बनना चाहते हैं, उनकी पहली पसंद आजादी है. और यही वह आजादी है जो कश्मीर के लोग चाहते हैं, लेकिन यह मुमकिन नहीं है.'

सोज की किताब का प्रकाशन रूपा पब्लिकेशंस ने किया है. रूपा पब्लिकेशंस की तरफ से किताब के लॉन्चिंग समारोह में जिन लोगों को आमंत्रित किया गया था उनमें पूर्व केंद्रीय वित्त और गृह मंत्री पी चिदंबरम का नाम भी शामिल था. लेकिन बुक लॉन्चिंग में चिदंबरम कहीं भी नजर नहीं आए. कुछ दिन पहले कांग्रेस के मीडिया प्रभारी और मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने सोज के बयान को खारिज कर दिया था. सुरजेवाला ने कहा था कि, जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और यह एक अविभाज्य और निर्विवाद सत्य है.

कांग्रेस के रवैये पर क्या बोले सोज

अपने बयान पर आईं प्रतिक्रियाओं और अपनी पार्टी यानी कांग्रेस के रवैए से सैफुद्दीन सोज खासे आहत हैं. सोज ने मायूसी भरे लहजे में कहा, ‘मेरा दिल और दिमाग दर्द की कैफियत से गुजर रहा है.’ बुक लॉन्चिंग समारोह में सोज ने कई बार कश्मीर पर अपनी विशेषज्ञताओं का जिक्र किया. उन्होंने कहा, ‘यह मेरी किताब है. अपनी किताब में मैंने तथ्य लिखे हैं.’

सोज की किताब विमोचन समारोह में भले ही उनकी पार्टी कांग्रेस का कोई भी बड़ा नेता नहीं पहुंचा, लेकिन पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी, वरिष्ठ पत्रकार और ब्रिटेन में भारत के उच्चायुक्त रह चुके कुलदीप नैयर और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष वजाहत हबीबुल्लाह ने समारोह में पहुंचकर महफिल की रौनक बढ़ा दी. लिहाजा सोज ने किताब को समर्थन देने और समारोह में शिरकत करने के लिए अपने इन खास मेहमानों को धन्यवाद दिया.

सोज ने कहा, ‘कांग्रेस को लेकर मेरे जहन में बहुत उत्साहजनक और सकारात्मक विचार हैं. लेकिन चूंकि यह मेरी किताब है, लिहाजा मेरे विचारों से मेरी पार्टी को कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए.’

'कश्मीर एक प्रयोगशाला'

सोज की बुक लॉन्चिंग समारोह में इंडिया इंटरनेशनल सेंटर का हॉल लोगों से खचाखच भरा हुआ था. सोज ने इन मेहमानों को अपनी किताब पर चर्चा के लिए बुलाया था. इस दौरान सोज ने कश्मीर को एक प्रयोगशाला करार दिया. सोज ने कहा कि इन दिनों भारत में जो कुछ भी हो रहा है कश्मीर उसकी प्रयोगशाला है. सोज के मुताबिक कश्मीर में प्रतीकात्मक रूप में लोगों की लिंचिंग (अकारण हत्या) हो रही है, असहिष्णुता का स्तर चरम पर है और भाईचारे में नफरत घुल गई है.

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अपनी किताब में सोज ने कश्मीर समस्या के लिए तीन मुख्य साझीदार बताए हैं: जम्मू-कश्मीर की जनता, भारत और पाकिस्तान. यानी सोज के मुताबिक कश्मीर की समस्या से कश्मीर की जनता, भारत और पाकिस्तान को सरोकार है. सोज का मानना है कि, हुर्रियत कॉन्फ्रेंस चूंकि कश्मीरियों के गुस्से और नाराजगी का प्रतिनिधित्व कर रहा है, लिहाजा भारत को हुर्रियत नेताओं के साथ बातचीत शुरू करनी चाहिए.

पिछले साल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर ने हुर्रियत नेता मीरवाइज उमर फारूक के साथ बैठक की थी. जिसके बाद कांग्रेस ने मणिशंकर अय्यर से किनारा कर लिया था. तब कांग्रेस ने दलील दी थी कि अनिर्वाचित लोगों और गैरप्रतिनिधियों से उसका कोई संबंध नहीं है.

कांग्रेस की तरफ से यह भी कहा गया था कि, 1972 के शिमला समझौते के मुताबिक, कश्मीर मुद्दे को भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय रूप से हल किया जाना है. लिहाजा इस द्विपक्षीय प्रक्रिया में किसी तीसरे पक्ष के दखल की कोई गुंजाइश नहीं है. जहां तक हुर्रियत की बात है तो वह कश्मीर घाटी के लोगों की इच्छाओं का सही प्रतिनिधित्व नहीं करती है. वहीं भारत सरकार को भी हुर्रियत पर भरोसा नहीं है. दूसरी तरफ हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के ज्यादातर नेता भी एकमत नहीं हैं. हुर्रियत में नर्म और गर्म धड़े साफ नजर आते हैं.

सोज ने अपनी किताब की प्रस्तावना में उल्लेख किया है, कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्ष ने संकेत दिया है कि, कश्मीर पर उनके विचार समस्या के समाधान का हिस्सा होंगे न कि समस्या को बढ़ाएंगे. वैसे कथनी और करनी में बड़ा अंतर होता है. क्योंकि कश्मीर समस्या के समाधान के लिए जमीनी स्तर पर स्पष्ट पॉलिसी और रोडमैप की जरूरत है.

इस प्रक्रिया में सभी हितधारकों की रजामंदी सबसे अहम है. ऐसे में सवाल उठता है कि कश्मीर समस्या के समाधान के लिए रोडमैप क्या है? आखिर वह कौन सी पॉलिसी है जो सभी पक्षों को एकमत होकर फैसला करने को राजी करेगी? अगर वाकई कोई रोडमैप है तो यह यकीनन खुशी की बात है. लेकिन अगर कोई रोडमैप नहीं है तो कश्मीर समस्या पर सियासी बयानबाजियों और राजनीति का खेल यूं ही जारी रहेगा.

'सोज ने दी थी राजीव गांधी और फारुख अब्दुल्ला को गठबंधन की सलाह'

किताब के अध्याय नंबर 31 'द आर्म्ड मिलिटेंसी एंड इट्स आफ्टरमेथ' में सोज ने मार्च 1987 में कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के बीच हुए चुनाव पूर्व गठबंधन (प्री पोल एलाइंस) की आलोचना की है. सोज के मुताबिक कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के उस गठबंधन का अनुभव कश्मीर के लोगों के लिए अच्छा नहीं रहा. ऐसा आरोप लगाया जाता है कि उस विधानसभा चुनाव में मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट (एमयूएफ) के उम्मीदवारों को हराने के लिए हर संभव कोशिश की गई थी. सोज का मानना है कि उस चुनाव में एमयूएफ 10 से 12 सीटें जीत सकती थी.

अपनी किताब में सोज़ ने जिक्र किया है कि, चुनाव से पहले राजीव गांधी और डॉ फारुख अब्दुल्ला में नजदीकियां बढ़ गई थीं. तब सोज ने उन्हें चुनाव के बाद गठबंधन करने की सलाह दी थी. इसके लिए सोज ने जून 1983 में हुए विधानसभा चुनाव और उसमें मिली जीत का हवाला दिया था. सोज के मुताबिक, 1987 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के गठबंधन का कांग्रेस के कई नेताओं ने विरोध किया था. जिनमें मुफ्ती मोहम्मद सईद और अरुण नेहरू भी शामिल थे.

इन लोगों का मानना था कि गठबंधन के चलते नेशनल कॉन्फ्रेंस जीत जाएगी और बाद में डॉ अब्दुल्ला कांग्रेस के नेताओं को दरकिनार कर देंगे. सोज के मुताबिक, मुफ्ती मोहम्मद सईद और अरुण नेहरू का यह संदेह काफी हद तक सही साबित हुआ था. क्योंकि तब मुफ्ती मोहम्मद सईद मंत्री बनकर राजीव गांधी कैबिनेट में शामिल कर लिए गए थे.

'कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस के गठबंधन के कारण बिगड़े कश्मीर के हालात'

सोज ने तब के कांग्रेस-नेशनल कॉन्फ्रेंस के गठबंधन को घाटी के लोगों की इच्छा के खिलाफ बताया है. सोज का कहना है कि, उस गठबंधन की वजह से ही कश्मीर में कानून-व्यवस्था की स्थिति खराब हुई. इसके अलावा सीमा पार के उपद्रवी तत्व भी घाटी में सक्रिय हो गए. जिससे पूरे राज्य में सार्वजनिक अशांति के हालात पैदा हुए और बगावत बढ़ने लगी. सोज के मुताबिक 1987 में पैदा हुए यह खराब हालात आज भी बरकरार हैं. जाहिर है, अब, सोज की किताब पर कांग्रेस का एतराज तथाकथित आजादी वाले बयान से हटकर कांग्रेस-नेशनल कॉन्फ्रेंस के 1987 के गठबंधन पर केंद्रित हो जाएगा.

सोज के मुताबिक, मौजूदा दौर में कश्मीर समस्या को सुलझाने के लिए हमें अतीत (इतिहास) की बजाए भविष्य की ओर देखना होगा. क्योंकि इस समस्या के लिए कारगर उपाय सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं. हालांकि सोज ने स्वीकार किया कि, कश्मीर मामले में इतिहास की कुछ समझ की भी जरूरत है. कश्मीर मुद्दे पर बात करते-करते सोज ने बहुत जल्द बंटवारे (विभाजन) का मुद्दा छेड़ दिया.

उन्होंने बंटवारे पर सरदार पटेल और नेहरू के विचारों की अपनी तरह से व्याख्या की. अस्सी बरस के बुजुर्ग सोज ने उस दिन की कहानी सुनाई, जब 27 अक्टूबर 1947 को भारतीय सेना श्रीनगर पहुंची थी. उस वक्त लॉर्ड माउंटबेटन ने लियाकत अली खान के साथ बातचीत की थी. लियाकत अली खान तब पाकिस्तान के गवर्नर जनरल थे. उन्होंने यह पद मोहम्मद अली जिन्ना के बाद संभाला था. उस बातचीत में लॉर्ड माउंटबेटन ने लियाकत अली खान से कहा था कि, मुझे लौह पुरुष (सरदार पटेल) ने कश्मीर लेने के लिए आपके पास भेजा है. मैं हैदराबाद-डेक्कन की बात करने नहीं आया हूं.

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सोज की नजर में विभाजन में सरदार पटेल की भूमिका अलग ही रंग रखती है. सोज के मुताबिक, पार्टीशन काउंसिल की बैठक में पटेल ने लियाकत अली खान से कहा था कि, 'हैदराबाद-डेक्कन की बात मत करो. क्या वह सड़क या समुद्री मार्ग से पाकिस्तान से जुड़ा हुआ है? आप उस पर अपना दावा क्यों कर रहे हैं? वह आपको नहीं मिल सकता है.'

किताब के अध्याय नंबर 29 'जम्मू-कश्मीर संविधान सभा' नामक में सोज ने भारत के आधुनिक इतिहास के बारे में लिखा है. सोज ने यहां अजीत भट्टाचार्य की किताब ‘कश्मीर: द वूंडिड वैली’ का हवाला दिया है. यहां एचवी हडसन की किताब ‘द ग्रेट डिवाइड: ब्रिटेन-इंडिया-पाकिस्तान’ का भी उल्लेख किया गया है.

सोज कहते हैं, 'कश्मीर मुद्दे पर भारत और पाकिस्तान के गवर्नर जनरल से बातचीत करने के लिए लॉर्ड माउंटबेटन 1 नवंबर 1947 को पाकिस्तान रवाना हुए. उनके बीच यह बातचीत साढ़े तीन साल तक चलती रही. बातचीत के दौरान माउंटबेटन ने जिन्ना से पेशकश की कि भारत जम्मू-कश्मीर राज्य में जनमत संग्रह करेगा, बशर्ते पाकिस्तान आज़ाद कश्मीर से अपनी सेना और सहयोगियों को हटा ले.

सोज का दूसरों के बयानों को इतना तवज्जों देना हैरान करता है

सोज आगे भट्टाचार्य को उद्धृत करते हुए लिखते हैं कि, उस समय नेहरू और माउंटबेटन के बीच मतभेद गहरा गए थे. माउंटबेटन ने जो कार्रवाई की थी उसका उनके पास कोई भी तर्क नहीं था. सोज ने आगे की कहानी अन्य लेखकों के अवलोकनों और बयानों के आधार पर कही है.हालांकि उनके जैसे कद वाले नेता ने दूसरों के बयानों को इतनी तवज्जो दी और उनपर विश्वास किया यह काफी हैरानी की बात है. ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि, कैसे उनके स्वयं के विचार दूसरों के विचारों या राजनीतिक स्थिति से प्रभावित हुए.

सोज ने किताब में लिखा है कि, नेहरू संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की शिकायत और उसके नतीजे से संतुष्ट नहीं थे. हालांकि उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में सारी कार्यवाही की व्यक्तिगत तौर निगरानी की थी. नेहरू को विश्वास था कि एंग्लो-अमेरिकी समुदाय को न तो कश्मीर समस्या की समझ है और न ही उन्हें इस बात से कोई सहानुभूति होगी कि भारत किस मुद्दे पर संघर्ष कर रहा है. कश्मीर के लिए भारत का संयुक्त राष्ट्र जाना और उस पर नेहरू की राय आम तौर पर प्रचलित कहानियों से काफी अलग है. खुद कांग्रेस भी ऐसे कई किस्सों से अनजान दिखाई पड़ती है.

किताब के इस हिस्से पर सोज को इतिहासकार और स्तंभकार रामचंद्र गुहा का समर्थन मिला है. रामचंद्र गुहा ने ट्वीट किया है कि, 'पटेल को कश्मीर को पाकिस्तान में शामिल किए जाने से कोई एतराज नहीं था बशर्ते हैदराबाद भारत में ही रहे. कई साल पहले राजमोहन गांधी ने सरदार पटेल की जीवनी में यह बात स्पष्ट शब्दों में लिख है.'

सोज की किताब इतिहास को इंसानी तजुर्बों से समझने की अच्छी कोशिश है. खासकर बंटवारे को समझने और उस वक्त की स्थितियों का आकलन करने में खासी मदद कर सकती है. लेकिन सोज की अपनी ही पार्टी कांग्रेस किताब के लिए उनकी आलोचना करती दिखाई दे रही है. हालांकि कांग्रेस नेताओं से उम्मीद यह की जाती थी कि वह अपने पुराने नेता और लंबे समय के साथी की बुक लॉन्चिंग में मौजूद रहकर बड़ा दिल दिखा सकते थे.

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