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सहारा की स्टोरी का सबसे बड़ा ट्विस्ट क्या है?

सहारा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट और सेबी के कदम का फायदा आखिरकार सरकार को ही मिलेगा

Updated On: Feb 08, 2017 09:19 PM IST

S Murlidharan

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सहारा की स्टोरी का सबसे बड़ा ट्विस्ट क्या है?

सहारा इंडिया ग्रुप और मार्केट रेग्युलेटर सेबी के बीच जहां कानूनी लड़ाई अभी भी जारी है. वहीं ये मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबे समय से चला आ रहा है. इसे लेकर बड़े कानूनी जानकारों में भी भारी कौतूहल है.

गौर करने वाली बात है कि सहारा ग्रुप के प्रमुख सुब्रत राय को सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2014 में जेल भेजा था. सुब्रत राय पर निवेशकों के पैसे नहीं लौटाने का आरोप है. दरअसल सहारा ग्रुप पर सहारा इंडिया रियल एस्टेट कॉरपोरेशन और सहारा हाउसिंग इनवेस्ट कॉरपोरेशन नाम की दो कंपनियों के जरिए अवैध रूप से डिबेंचर जारी करने का आरोप है. सहारा ग्रुप की इन दोनों कंपनियों की ओर से जारी किए गए पब्लिक इश्यू को सेबी ने अगस्त 2012 में ही अवैध करार दे दिया था.

लेकिन 6 फरवरी 2017 को सुप्रीम कोर्ट की ओर से सहारा ग्रुप को भारी झटका लगा. जब सुप्रीम कोर्ट ने सहारा ग्रुप की सबसे महत्वाकांक्षी हाउसिंग प्रोजेक्ट एंबी वैली को अटैच करने का आदेश दिया. मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे पर मौजूद एंबी वैली प्रोजेक्ट 39000 करोड़ की लग्जरी टाउनशिप है.

supreme court

सुप्रीम कोर्ट ने सहारा के निवेशकों के बकाया 14,779 करोड़ रुपए की वसूली को लेकर ये सख्त कदम उठाया है. हालांकि आज की तारीख तक सेबी के अनुमान के मुताबिक सहारा ग्रुप पर ब्याज समेत बकाया राशि करीब 47000 करोड़ रुपए है. यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने ना सिर्फ सहारा ग्रुप के एंबी वैली प्रोजेक्ट को अटैच किया है बल्कि सहारा से उन संपत्तियों की सूची भी मांगी है जिसकी नीलामी कर ग्रुप की बकाया राशि को प्राप्त किया जा सके.

सुप्रीम कोर्ट एक खास रणनीति के तहत कार्रवाई कर रहा है जो शायद ही किसी के समझ में आ रहा है. क्योंकि कोई नहीं जानता कि किस कानून के तहत सुब्रत राय को कैद किया गया है. हालांकि पिछले वर्ष अपनी मां की मृत्यु के बाद से ही वो पैरोल पर लंबे समय से जेल से बाहर हैं.

जेल भेजने के आदेश पर सवाल

कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी तो सुब्रत राय को जेल भेजने के आदेश पर ही सवाल खड़े करते हैं. उनके मुताबिक अगर उनपर कोर्ट की अवमानना का आरोप तय होता है. तो उन्हें उसके लिए जेल भेजा जाए या फिर इसके लिए जो कानूनी प्रावधान है उसके आधार पर कार्रवाई की जाए.

सुप्रीम कोर्ट इस बात पर अड़ा है कि सहारा कोई सामान्य ग्रुप नहीं है. लेकिन इसके चलते सहारा ग्रुप को लंबे समय तक मनी लांड्रिंग के आरोपों के साथ देश का सामना करने की मजबूरी है. ऐसा नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट इस बात को समझता नहीं है. लेकिन वो सहारा ग्रुप पर अंकुश लगाना चाहता है. सुप्रीम कोर्ट को पता है कि सहारा ग्रुप धड़ल्ले से अपनी मेंबर कंपनियों के बीच फंड को मूव करती है.

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निवेशकों के पैसे को लेकर सहारा समूह और सेबी के बीच लंबे समय से विवाद जारी है (फोटो: रॉयटर्स)

यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने सहारा ग्रुप की दो दोषी कंपनियों- सहारा इंडिया रियल इस्टेट कॉरपोरेशन और सहारा हाउसिंग इनवेस्ट कॉरपोरेशन – को अकेले सबक सिखाने का मन नहीं बनाया है. बल्कि सर्वोच्च अदालत ने पूरे ग्रुप के कामकाज पर अपना ध्यान केंद्रित कर रखा है.

सेबी की जांच पर ज्यादा भरोसा

दरअसल सुप्रीम कोर्ट पूरे सहारा ग्रुप और उसके चतुर प्रमोटरों को उन्हीं की चाल में मात देने की सोच रहा है. सुप्रीम कोर्ट ने 6 फरवरी 2017 को कपिल सिब्बल के उस फरियादी याचिका को भी दरकिनार कर दिया. जिसमें कहा गया कि इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल ने भी इन दोनों दोषी कंपनियों के 85 फीसदी निवेशकों को सही बताया है.

सुप्रीम कोर्ट ने सेबी की जांच पर ज्यादा भरोसा जताया है. जिसमें बताया गया है कि कंपनी के ज्यादातर निवेशक बेनामी और काल्पनिक हैं. सहारा ग्रुप भी इस बात को अब तक साबित नहीं कर पाया है कि उसने निवेशकों को बैंकिंग चैनल के जरिए ही पैसा वापस किया है.

और तो और सहारा ग्रुप इस कमजोर तर्क के साथ कानूनी लड़ाई लड़ रहा है कि ग्रुप का काम ग्रामीण भारत में है जहां नकदी पर ही सारा लेनदेन टिका होता है.

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(फोटो: रॉयटर्स)

हालांकि कपिल सिब्बल तब सही प्रतीत होते हैं जब वो ये तर्क देते हैं कि कोई भी ऐसा बैंक या निवेशक नहीं है जो पैसे वापस करने की मांग कर रहा हो. बावजूद इसके सुप्रीम कोर्ट पैसों की मांग कर रहा है. आखिर क्यों ?

मनी लांड्रिंग की भूमिका

ऐसा इसलिए है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट को लगता है कि सहारा ग्रुप मनी लांड्रिंग की भूमिका अदा कर रहा है. जबकि इस पूरे खेल के पीछे के असल खिलाड़ी सामने नहीं आना चाहते. लेकिन क्या ऐसा हो सकता है कि वो अपने पैसे को सहारा ग्रुप के साथ यूं डूबते हुए छोड़ दें ?

दरअसल सुप्रीम कोर्ट सहारा ग्रुप के उस क्लाइंट की सूची के बारे में जानना चाहता है जिसमें विशिष्ट और ऊंचे लोगों के नाम शामिल हैं. जिसमें अमीर, मशहूर, फिल्म कलाकार, क्रिकेटरों के साथ-साथ नेता भी शामिल हैं.

असल में ये बेनामी संपत्ति के खिलाफ चोट करने की एक बड़ी रणनीति है. जो पिछले वर्ष मोदी सरकार के बेनामी संपत्ति के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की घोषणा से पहले से जारी है.

इस कदम के लिए सेबी और सुप्रीम कोर्ट की सराहना करनी होगी. क्योंकि सुब्रत राय को आज न कल इस कार्रवाई के सामने हथियार डालने ही होंगे. सुब्रत राय अभी भी सिर्फ पेरोल पर जेल से बाहर हैं. जेल की तलवार उनपर अभी भी लटक रही है.

सुब्रत राय अभी तक 10 हजार करोड़ जमा नहीं करा पाए हैं जो सुप्रीम कोर्ट उनसे उनके बेल के लिए मांग रहा है. ना ही उन्होंने सेबी के उस पैसे की मांग पूरी की है जो कथित तौर पर निवेशकों को लौटाया जाना है.

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(फोटो: रॉयटर्स)

नोटबंदी का नतीजा आना बाकी

एनडीए सरकार ने देश से काला धन खत्म करने के मकसद से 8 नवंबर 2016 को नोटबंदी लागू किया था. ये कोशिश हो सकती है कि कामयाब हुई हो या न भी हुई हो. क्योंकि इसका नतीजा अभी आना बाकी है.

सुप्रीम कोर्ट का बेनामी संपत्ति पर सख्त रवैया उठाना भविष्य में उम्मीद जगाता है. क्योंकि भविष्य में इससे बेनामी संपत्ति सरकार के खाते में आ सकती है. वैसे भी प्रोहिबिशन ऑफ बेनामी प्रॉपर्टीज एक्ट के तहत सरकार बेनामी संपत्ति को जब्त कर सकती है. लगता तो यही है कि सुप्रीम कोर्ट और सेबी के उत्साही कदम का लाभ सरकार को होगा.

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