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सदा-ए-सुख़न: एक कवि गोष्ठी, जहां पॉपुलर नहीं, गहरे साहित्य पर हुई चर्चा

‘सदा-ए-सुखन’ का ये आयोजन अदब और तहज़ीब की परंपरा में एक नया मक़ाम बनकर सामने आया है

Updated On: Nov 12, 2017 09:07 PM IST

Swati Arjun Swati Arjun
स्वतंत्र पत्रकार

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सदा-ए-सुख़न: एक कवि गोष्ठी, जहां पॉपुलर नहीं, गहरे साहित्य पर हुई चर्चा

दिल्ली के मौसम में इन दिनों अजीब किस्म की बेअदबी घुली है. प्राकृतिक तौर पर ठंड के आगाज़ के महीने में जब हम गुलाबी धूप का इंतज़ार करते हैं तो...ये शहर अप्राकृतिक धुंध और धुंए की आगोश में आ चुका है. लोग बेहाल हैं. सांसें साथ नहीं दे पा रही हैं और तबियत नासाज़ है.

लेकिन इन सबके के बावजूद कलाप्रेमियों को भला किस आफ़त ने उनके पसंदीदा शग़ल से दूर रखा है. दिल्ली शहर का हर कोना इन दिनों- कई बड़े और बहुत बड़े साहित्यिक आयोजनों का केंद्र बना हुआ है. ऐसे दिनों में जब सेंट्रल दिल्ली के ‘इंदिरा गांधी फॉर सेंटर ऑफ़ आर्ट्स’ में देश-विदेश से बड़ी संख्या में साहित्य और कला से जुड़े कलाकार एक मंच पर इकट्ठा थे और अपने सरोकारों की बातें कर रहें थे. तब दिल्ली से थोड़ी दूर हरियाणा के सिकंदरपुर के एक छोटे से स्टूडियो में- दिल्ली, यूपी, पंजाब, राजस्थान और बिहार से आए छोटे-बड़े कवि और शायर, बड़ी ही सादगी और हमदिली से कविता और नज़्म पेश कर रहे थे.

इनमें अमित कल्ला, कुमार अनुपम, अलीना इतरत, पूनम तलवार, पल्लव मिश्रा, प्रखर मालवीय कान्हा, अब्बार क़मर, क़ामरान आदिल, कपिल भारद्वाज, प्रदीप तरकश, पूनम यादव और इरफ़ान ख़ान सिकंदर शामिल थे.

एक साथ चार पीढ़ियों के कवि 

कार्यक्रम में चार पीढ़ी के शायरों और कवियों ने हिस्सा लिया. इससे आयोजन के दौरान न सिर्फ़ अदब को कलात्मक छूट हासिल हुई बल्कि विविधताओं को एक मंच दिया गया. इस तरह का मंच शायद इस समय साहित्य अकादमी के अलावा कहीं और दिखाई नहीं देता. हर कवि और शायर की न सिर्फ़ ज़बान या भाषा अलग थी बल्कि उनके तजुर्बे और अहसास भी अलग थे.

ये सब हार्ड-कोर हिंदी और उर्दू के कलमगीर थे. ये मौजूदा दौर के कलाकारों का एक बहुत ही ज़रूरी जुटान था, क्योंकि इस आयोजन ने इन सभी कलाकारों को एक मंच देकर भी इसे ‘मंचीय कविता’ बनने से बचा लिया था. यहां कविता या गज़ल सिर्फ़ पढ़ी नहीं गई बल्कि उसपर चर्चा भी हुई.

कार्यक्रम में शामिल कवि, शायर और श्रोता सभी ने इस बात को महसूस किया कि मौजूदा माहौल में जब पॉपुलर कल्चर साहित्य पर हावी होता दिख रहा है, तब इस तरह के गंभीर और सुचिंतित आयोजन से हिंदी और उर्दू साहित्य न सिर्फ़ एक दूसरे के करीब आता है, बल्कि देश में सदियों से अदब की जो साझा संस्कृति रही है उसे भी नई पहचान मिलती है.

कला का एक रूप यह भी

कविता हो या गज़ल या कोई नज़्म..कला से जुड़ी हर विधा का मक़सद जीवन की कलात्मकता, उसकी सुरुचि, उसके सौंदर्य मूल्यों को सामने लाना होता है. जिसे इस आयोजन में पूरी शिद्दत के साथ निभाया गया.

सभी कवियों और शायरों के द्वारा सुनाई गई कविताओं में बहुत डायवर्सिटी होने के बावजूद उनमें एक किस्म की इंडिविजुएलिटी थी, इसके बावजूद उनमें एक बहाव था...एक धार थी. आज जब हर चीज़ या हर सुविधा एक बटन के क्लिक पर मुमकिन है तब इस आयोजन का होना अपने आप में एक सकारात्मक कदम लगता है. यहां शामिल कवियों-शायरों में शायद एक भी ऐसा न था जो हॉबी या शौक के लिए शेरो-शायरी कर रहा था.

हर कविता का अपना अनुभव

हर कोई अपनी कविताओं के साथ अपने अनुभव लेकर आया था जो उनकी कविताओं को नया मतलब दे रही थी. यहां कविता, सुविधा के लिए नहीं की जा रही थी बल्कि वो एक लंबे और गहरे आत्मिक संघर्ष या अनुभव से जन्म ले रही थी.

कवि अमित कल्ला के शब्दों में कहे तो ये आयोजन- ‘बियॉन्ड कविता’ की थी. इस जुटान से aesthetics की schooling करने की गंभीर कोशिश की गई थी. कार्यक्रम में शामिल हर कविता के मुक्त़लिफ़ होने के बावजूद उसकी विशिष्टता बनी हुई थी.

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मौजूदा दौर में चारों तरफ़ कला के ध्रुवीकरण की कोशिश चल रही है और ऐसे समय में ये आयोजन उस चक्र को तोड़ते हुए इंसान के निज या स्वयं को ढूंढने की मानिंद एक संजीदा कोशिश बनकर उभरी.

एक मंच पर लाने की कोशिश

आवाज़गाह़ के तले, ‘सदा-ए-सुख़न’ के नाम से आयोजित इस कार्यक्रम में कई पुराने और नए कवियों और शायरों को एक छत के नीचे लाने की कोशिश की गई. कार्यक्रम के आयोजन का मक़सद ‘सोशल मीडिया के दौर में जब हर किसी के पास एक मंच हासिल है, तब इस कोशिश के ज़रिए अदब को प्रमोट करना था, ताकि इस शोर-शराबे के बीच जो अच्छा साहित्य है उसको बचाया जा सके.

आयोजन की ख़ास बात इसे हर किस्म की राजनीति से दूर रखना रहा- और यहां आने वाले हर शख्स़ का किसी साहित्यिक गुट का हिस्सा न होना रहा है. बिना किसी साहित्यिक ख़ेमेबंदी, राजनैतिक आग्रह और कथित पॉपुलर लिटरेचर का तमगा न पहने हुए, ये कार्यक्रम सादा और सुलझा हुआ आयोजन था. इसका मक़सद न इंकलाब लाना था न ही कोई रिकॉर्ड स्थापित करना.

अदब और तहज़ीब जब से इस दुनिया में आई तब से उसका स्वागत और ख़ैरमक़दम किया गया है. ‘सदा-ए-सुखन’ का ये आयोजन उसी परंपरा में एक नया मक़ाम बनकर सामने आया है.

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