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सबरीमाला: स्मृति ईरानी हकीकत हैं, तुलसी तो बस कल्पना थी

स्मृति ईरानी के माहवारी वाले बयान के बाद 'क्योंकि सास भी कभी बहू थी' कि तुलसी बहुत याद आती हैं

Updated On: Oct 23, 2018 10:41 PM IST

Pratima Sharma Pratima Sharma
सीनियर न्यूज एडिटर, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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सबरीमाला: स्मृति ईरानी हकीकत हैं, तुलसी तो बस कल्पना थी
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दीप से दीप जलाते रहो...हमारी कपड़ा मंत्री स्मृति ईरानी भी इसी राह पर हैं. ईरानी ने कहा कि हिंदू होने की वजह से उन्हें अपने पारसी पति के साथ फायर टेंपल में जाने की इजाजत नहीं है. उनका कहना है कि ऐसे में पूजा करने के अधिकार के लिए वह कोर्ट तो नहीं चली गई ना! इसी तरह रजस्वला उम्र की किसी भी पारसी या गैर पारसी महिला को फायर टेंपल में जाने की इजाजत नहीं होती है. दिलचस्प है कि ईरानी ने ये बातें अपनी सफाई में कही हैं. उनका कहना है कि पूजा के अधिकार के लिए वह कोर्ट नहीं गईं तो सबरीमाला में दाखिल होने के लिए भी रजस्वला उम्र की महिलाओं का कोर्ट जाना गलत है.

ये ईरानी की सफाई है. इससे पहले उन्होंने क्या कहा था वो भी जान लेते हैं. मंगलवार सुबह ईरानी ने कहा था, 'पूजा करने का अधिकार मिलने के मतलब यह कतई नहीं है कि आपको अपवित्र करने का भी अधिकार मिल गया है.' इसके बाद उन्होंने रजस्वला उम्र की महिलाओं से एक खास सवाल भी किया है? उन्होंने कहा, साधारण सी बात है कि क्या आप माहवारी के खून से सना सैनेटरी नैपकिन लेकर चलेंगे और किसी दोस्त के घर जाएंगे? इसके बाद उन्होंने पूरे भरोसे से कहा कि आप ऐसा नहीं करेंगे.

यानी कपड़ा मंत्री को लगता है कि किसी महिला के माहवारी में रहने का मतलब है कि आप सैनेटरी नैपकिन लेकर चल रहे हैं. तो क्या रजस्वला उम्र की महिलाओं को अपने वो 5 दिन बंद कमरे में बिताना चाहिए. उन्हें उस दौरान किसी के घर आना-जाना नहीं चाहिए. अगर कोई महिला किसी कंपनी की सीईओ या फाउंडर हो तो उसे क्या करना चाहिए? उन दिनों में सारी मीटिंग कैंसिल कर देना चाहिए! बरसों पहले यह होता था कि माहवारी के दौरान महिलाओं का रसोई में जाना बंद कर दिया जाता था. ऐसे फरमान सुनाने वाली भी महिलाएं ही होती थीं. लेकिन अफसोस बस इतना है कि उन महिलाओं को देश-दुनिया से कोई लेनादेना नहीं था और इसबार देश की एक मंत्री महोदया ने यह कहा है.

एक महिला होकर स्मृति ईरानी जिस मुद्दे को नहीं समझ पाईं, उसे सिद्धार्थ ने बखूबी समझाने की कोशिश की है. सिद्धार्थ दक्षिण भारत के अभिनेता है. सिद्धार्थ ने ट्वीट करके लिखा है कि बच्चों और कभी-कभार बुजर्गों को भी डायपर्स पहनना पड़ता है.  उन्होंने लिखा है कि रजस्वला उम्र की महिलाएं भी उतनी ही हाइजीनिक होती हैं जितना कि दूसरी महिलाएं. तीसरी बात उन्होंने कहा है कि मंदिर में दाखिल होने वाले लोगों के शरीर में मल-मूत्र होते हैं और इससे मंदिर अपवित्र नहीं होता है. अगर किसी महिला को माहवारी आती है तो इसमें शर्म की क्या बात है.

स्मृति ईरानी के इस बयान के बाद 'क्योंकि सास भी कभी बहू थी' कि तुलसी बहुत याद आती हैं. उस कैरेक्टर की वजह से उन्होंने देश की कई महिलाओं का दिल जीता था. महिलाओं के हक, सम्मान और अधिकार की बात होती थी तो तुलसी कभी पीछे नहीं हटती थी. लेकिन स्मृति ईरानी ने अपने इस बयान से साबित कर दिया कि तुलसी तो सिर्फ कोरी कल्पना थी. हकीकत तो स्मृति ईरानी हैं.

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