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सबरीमाला मंदिर में प्रवेश करने वाली कनक दुर्गा अपने बच्चों को मिस कर रही हैं, लेकिन इंसाफ की जंग के लिए है हौसला बरकरार

कनक दुर्गा ने पुलिस सुरक्षा में एक अन्य महिला बिंदू अम्मिनी के साथ बीते दो जनवरी को चोरी-छिपे मंदिर में प्रवेश कर भगवान अयप्पा के दर्शन किए थे

Updated On: Feb 10, 2019 05:39 PM IST

TK Devasia

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सबरीमाला मंदिर में प्रवेश करने वाली कनक दुर्गा अपने बच्चों को मिस कर रही हैं, लेकिन इंसाफ की जंग के लिए है हौसला बरकरार

केरल के सबरीमाला मंदिर में प्रवेश कर इतिहास रचने वाली कनक दुर्गा से अब लगभग पूरा देश परिचित हो चुका है. कनक दुर्गा ने अपनी दोस्त बिंदू अम्मिनी के साथ इसी साल दो जनवरी को मंदिर में दर्शन किए थे. लेकिन मंदिर में प्रवेश के बाद कनक दुर्गा को न सिर्फ दक्षिणपंथी संगठनों के तगड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है, बल्कि खुद का परिवार भी उनका दुश्मन बन बैठा है. कनक दुर्गा जब मंदिर में प्रवेश करने के बाद वापस लौटीं, तो सास ने मारपीट कर के उन्हें घर से बेदखल कर दिया. यहां तक कि कनक दुर्गा को उनके बच्चों तक से नहीं मिलने दिया गया.

दरअसल परंपरा के मुताबिक केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 से लेकर 50 साल तक की उम्र की महिलाओं को प्रवेश की इजाजत नहीं थी. लेकिन पिछले साल 28 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए सभी उम्र की महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में प्रवेश करने की अनुमति दे दी थी.

सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद ही कनक दुर्गा ने अपनी दोस्त के साथ जाकर मंदिर में दर्शन किए थे. लेकिन कनक दुर्गा के इस कदम से भड़ककर सास ने जब उसे मारपीट कर घर से निकाल दिया, तो कनक दुर्गा ने स्थानीय अदालत का दरवाजा खटखटाया. मल्लापुरम जिले के ग्राम न्यायालय ने कनक दुर्गा की याचिका पर सुनवाई करते हुए उसे पांच फरवरी को घर लौटकर परिवार के साथ रहने की इजाजत दे दी. लेकिन अदालत का आदेश लेकर कनक दुर्गा जब घर पहुंची तो वो खाली था. कनक दुर्गा का पति कृष्णनउन्नी और सास सुमति घर छोड़कर जा चुके थे. वो लोग अपने साथ कनक दुर्गा के 12 साल के जुड़वां बेटों को भी ले गए. बच्चों और बाकी परिजनों को घर में न पाकर कनक दुर्गा की सारी खुशियां गम में बदल गईं.

कनकदुर्गा ने बिंदू अम्मिनी नाम की एक अन्य महिला के साथ पुलिस सुरक्षा में सबरीमाला मंदिर में प्रवेश कर भगवान अयप्पा के दर्शन किए थे

कनक दुर्गा और बिंदू अम्मिनी ने पुलिस सुरक्षा में दो जनवरी को सबरीमाला मंदिर में प्रवेश कर भगवान अयप्पा के दर्शन किए थे

अपने रिश्तेदारों और पड़ोसियों द्वारा बहिष्कृत 39 साल की कनक दुर्गा फिलहाल अपने घर में एक कैदी की तरह रह रही हैं. हालांकि, कनक दुर्गा के घर के आसपास राज्य सरकार द्वारा उनकी सुरक्षा के लिए तैनात पुलिसवालों की भीड़ हमेशा बनी रहती है. अपनों-परायों के तानों-धमकियों और बेइज्जती के बावजूद कनक दुर्गा के हौसले टूटे नहीं हैं. समाजिक बहिष्कार और तमाम अकेलेपन के बाद भी उन्हें सबरीमाला मंदिर में प्रवेश के अपने फैसले पर कोई पछतावा नहीं है. उग्र प्रदर्शनकारियों के बीच से निकलकर मंदिर में दर्शन की चुनौती पूरी करने वाली यह निडर महिला अब दूसरी जंग लड़ने को तैयार है. इस बार कनक दुर्गा का मुकाबला अपनों से है. वो सिर्फ अपना वाजिब हक चाहती हैं. वो अपने पति और बच्चों के साथ फिर से एक सामान्य जिंदगी जीना चाहती हैं. सरकारी स्वामित्व वाले सिविल सप्लाई कारपोरेशन में काम करने वाली कनक दुर्गा ने खास इंटरव्यू में फ़र्स्टपोस्ट के साथ अपने दुख-पीड़ा और चुनौतियों को साझा किया. कनक दुर्गा के साथ बातचीत के कुछ संपादित अंश प्रस्तुत हैं..

फ़र्स्टपोस्ट: सबरीमाला मंदिर में दर्शन के बाद घर लौटकर आपको कैसा लग रहा है?

कनक दुर्गा: सबरीमाला मंदिर में दर्शन कर के घर वापस लौटने के बाद से मैं बहुत दुखी हूं. कोर्ट के आदेश के बाद मुझे अपने घर में घुसने और परिवार के साथ रहने की इजाजत मिली थी. लेकिन कोर्ट के ऑर्डर और पुलिसवालों की सुरक्षा में जब मैं घर पहुंची तो दुख से भर गई. मेरे पति अपनी मां और मेरे दो बच्चों को साथ लेकर घर छोड़कर जा चुके थे. मुझे नहीं पता कि अब वो लोग कहां हैं. मैं अपने पति से संपर्क भी नहीं कर पा रही हूं क्योंकि उन्होंने अपने मोबाइल फोन में मेरा नंबर ब्लॉक कर रखा है. मैं अपने बच्चों को देखने के लिए तड़प रही हूं. मुझे उनकी बहुत याद आ रही है. सबरीमाला जाने के लिए मैं दिसंबर महीने के आखिरी हफ्ते में घर से निकली थी. तभी से मैं अपने बच्चों से दूर हूं. मुझे उनकी याद सता रही है. मंदिर में दर्शन करने के बाद जब मैं घर वापस लौटी थी, तब मैं अपने बच्चों से बमुश्किल 10 मिनट के लिए ही मिल पाई थी. लेकिन उस वक्त मैं अपने बच्चों से बात तक नहीं कर सकी थी. क्योंकि तब मेरी सास ने मारपीट कर मुझे घर से बाहर निकाल दिया था. सास की मारपीट से घायल होने के बाद जब मुझे अस्पताल ले जाया जा रहा था, तब मेरे बच्चे बुरी तरह से रो रहे थे. मैं जानती हूं कि बच्चे भी मेरी याद में हलकान हो रहे होंगे और मुझसे मिलने को तड़प रहे होंगे.

फ़र्स्टपोस्ट: बच्चों की कस्टडी पाने के लिए आपकी क्या योजना है?

कनक दुर्गा: घर लौटने की अनुमति और बच्चों की कस्टडी पाने के लिए मैंने कोर्ट से दखल देने की गुहार लगाई थी. इस संबंध में मैंने पुलामंथोल ग्राम न्यायालय के सामने याचिका दायर की थी. कोर्ट ने फिलहाल मुझे घर लौटने की अनुमति तो दे दी, लेकिन बच्चों की कस्टडी की मांग वाली याचिका पर सुनवाई के लिए 11 मार्च की तारीख मुकर्रर की है. लेकिन मैं तब तक इंतजार नहीं कर सकती हूं. मैं अपने बच्चों से मिलने के लिए बेताब हूं. मैं बच्चों को तुरंत अपने पास अपने साथ देखना चाहती हूं. अपने बच्चों को वापस पाने के लिए मैंने राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) से भी मदद मांगी है.

फ़र्स्टपोस्ट: क्या आपके पति आपको तलाक देने की योजना बना रहे हैं?

कनक दुर्गा: मुझे अपने पति के इरादों के बारे में कोई जानकारी नहीं है. सबरीमाला जाने के लिए जब मैं घर से निकली थी, तब से मेरी उनसे कोई बातचीत नहीं हुई है. मेरे पति ने अपने दोस्तों से भी कोई बात नहीं की है और न ही उनके सामने अपने इरादे जाहिर किए हैं. मैं पांच फरवरी को इस उम्मीद के साथ घर लौटी थी कि, मैं पति और बच्चों के साथ अपने पारिवारिक जीवन को फिर से शुरू कर सकूंगी. मुझे अपने पति और सास से कोई समस्या या शिकायत नहीं है. मैं अपने परिवार के साथ पहले की तरह सामान्य जीवन जीने के लिए तैयार हूं.

फ़र्स्टपोस्ट: आपको ऐसा क्यों लगता है कि पति और परिवारवाले आपसे बहुत नाराज हैं?

कनक दुर्गा: मेरे पति और ससुरालवाले एक रूढ़िवादी परिवार से संबंध रखते हैं. उन्हें हिंदू संस्कृति और परंपराओं में दृढ़ विश्वास है. परिवार में से ही कोई शख्स हिंदू धर्म के रीति-रिवाजों को तोड़ सकता है, इस बात की उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की होगी. अगर मैंने अपने ससुरालवालों से कहा होता कि, मैं सबरीमाला जाकर मंदिर में दर्शन करूंगी, तो वो मुझे घर में कैद कर देते. इसलिए मैं यह कहकर घर से निकली थी कि, मैं एक आधिकारिक (सरकारी) काम के सिलसिले में राज्य की राजधानी तिरुवनंतपुरम जा रही हूं. लेकिन जब उन्हें मेरे सबरीमाला मंदिर में दर्शन करने की खबर लगी तो वो मुझसे खफा हो गए. मेरी हरकत और दुस्साहस उन्हें अब भी हजम नहीं हो पाया है. इसीलिए वो अब भी मुझसे नाराज हैं. फिर भी मुझे उम्मीद थी कि, जल्द ही उनका यह गुस्सा खत्म हो जाएगा और वो मुझे स्वीकार कर लेंगे. उनकी नाराजगी और मुझसे दूरी की एक वजह दक्षिणपंथी संगठनों की धमकियां भी हो सकती है. उन्हें लग रहा होगा कि मैंने उनकी जान जोखिम में डाल दी है.

कनक दुर्गा

पुलिस की हिरासत में कनक दुर्गा

फ़र्स्टपोस्ट: क्या आपको अपने पति और परिवार से सुलह की कोई गुंजाइश नजर आती है?

कनक दुर्गा: मैं बहुत आशावादी इंसान हूं. मुझे विश्वास है कि जल्द सब ठीक हो जाएगा. वक्त के साथ सभी जख्म भर जाएंगे. मैंने कुछ भी गलत नहीं किया है. मैंने सिर्फ देश की शीर्ष अदालत द्वारा दिए गए अधिकार का इस्तेमाल किया है. मुझे उम्मीद है कि, हमारी मंदिर यात्रा का विरोध करने वाले लोग इस बात को समझेंगे और हमें और हमारे परिवार को हमारे हाल पर छोड़ देंगे.

फ़र्स्टपोस्ट: क्या आपको अपनी जान का कोई खतरा है?

कनक दुर्गा: जब से मैंने सबरीमाला मंदिर में प्रवेश किया है, मुझे लगातार धमकी भरे फोन कॉल आ रहे हैं. यहां तक कि घर लौटने के बाद भी मुझे धमकी भरे दो पत्र मिल चुके हैं. मुझे ई-मेल के जरिए भी धमकियां दी जा रही हैं. धमकी भरे एक ई-मेल में यह दावा किया गया है कि, लोकसभा चुनाव के बाद मेरी हत्या कर दी जाएगी.

फ़र्स्टपोस्ट: क्या आप धमकियों और खतरों से खौफजदा हैं?

कनक दुर्गा: मैं धमकियों से नहीं डरती हूं. मैं किसी भी खतरे से खौफजदा नहीं क्योंकि मैंने किसी का कोई नुकसान नहीं किया है. मुझे लगता है कि यह एक भावनात्मक प्रतिक्रिया है. मुझे उम्मीद है कि वक्त बीतने के साथ लोगों की मेरे प्रति नफरत और नाराजगी खुद-ब-खुद खत्म हो जाएगी. समाज में जब कोई इंसान बदलाव के लिए लड़ता है, तो उसके खिलाफ लोगों की ऐसी प्रतिक्रियाएं स्वाभाविक होती हैं. मुझे नहीं लगता कि, लोगों का मेरी प्रति ऐसा बर्ताव स्थायी रूप से जारी रहेगा. लेकिन फिर भी अगर लोग भविष्य में मेरे प्रति घृणा और शत्रुता जारी रखते हैं, तब भी मुझे उसकी परवाह नहीं. मुझे मौत से डर नहीं लगता. सबको एक दिन मरना है. एक न्याय संगत और अच्छे उद्देश्य के लिए अगर मैं मर भी गई तो मुझे खुशी होगी.

फ़र्स्टपोस्ट: क्या आपके पड़ोसी और दफ्तर के सहकर्मी आपके साथ सहयोग कर रहे हैं?

कनक दुर्गा: मैं पांच फरवरी को घर लौटी थी. तब से लेकर अब तक मैंने अपने किसी भी पड़ोसी को नहीं देखा है. किसी भी पड़ोसी ने मुझसे संपर्क करने की कोशिश नहीं की है. मुझे लगता है कि वो पुलिस की वजह से मुझसे दूरी बनाए हुए हैं. मुझे अपने ऑफिस में कोई समस्या नहीं है. ऑफिस में सहयोगियों और वरिष्ठों ने मेरी सबरीमाला यात्रा की सराहना की है. उन्होंने मुझे अपना पूरा समर्थन भी दिया है. मेरे दोस्त कॉल कर के मेरा हालचाल लेते रहते हैं. वो मेरा हौसला भी बढ़ाते हैं. वहीं राज्य और राज्य के बाहर रहने वाले प्रगतिशील वर्ग के लोगों के फोन कॉल भी मुझे आ रहे हैं. वो सब अपना समर्थन जताकर मेरे साथ एकजुटता व्यक्त कर रहे हैं.

फ़र्स्टपोस्ट: आपके माता-पिता और भाई-बहन आपसे कैसा व्यवहार कर रहे हैं?

कनक दुर्गा: मेरे मायके के सभी लोग मुझसे बेहद खफा हैं. सिर्फ मेरा एक भाई कभी-कभार मुझे फोन कर के मेरा हालचाल जान लेता है. बाकी के लोग मुझसे दुश्मनों जैसा बर्ताव कर रहे हैं. मेरा एक भाई तो मेरे खिलाफ ही उतर पड़ा है. मुझे नहीं लगता कि उनमें से कोई भी मेरा समर्थन करेगा.

फ़र्स्टपोस्ट: उग्र प्रदर्शनकारियों से घिरी पहाड़ी, मंदिर में प्रवेश की जुर्रत करने वाली महिलाओं के साथ गाली-गलौच और यहां तक कि मारपीट के बीच सबरीमाला जाने की प्रेरणा आपको कहां से मिली?

कनक दुर्गा: मैं भगवान में अटूट विश्वास रखती हूं और महिलाओं के अधिकारों की घोर समर्थक हूं. मासिक धर्म के कारण महिलाओं के साथ भेदभाव के खिलाफ मेरी भावनाएं बहुत मजबूत हैं. मासिक धर्म की वजह से कई वर्जनाओं और भेदभाव की मैं भुक्तभोगी रह चुकी हूं. इन सबका सामना मुझे अपने परिवार में ही करना पड़ा था. मासिक धर्म के दौरान मुझे एक कमरे में अलग-थलग छोड़ दिया जाता था. मुझे घर का कोई भी सामान छूने की अनुमति नहीं दी जाती थी. यहां तक कि मासिक धर्म में मुझे कुएं से पानी खींचने की भी इजाजत नहीं थी. महिलाओं के साथ भेदभाव दूर करने लिए जो बराबरी का अधिकार मैं चाहती हूं, सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में उन दोनों वजहों का जिक्र किया है. लिहाजा सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद मैंने अवसर का लाभ उठाया और सबरीमाला मंदिर में दर्शन करने पहुंच गई.

Kerala Sabarimala Temple

सुप्रीम कोर्ट ने 28 सितंबर, 2018 को अपने ऐतिहासिक निर्णय में सभी उम्र की महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में प्रवेश की इजाजत दे दी थी (फोटो: पीटीआई)

फ़र्स्टपोस्ट: ऐसे आरोप लगाए गए हैं कि आप और आपकी दोस्त बिंदु अम्मिनी सरकार के कहने पर सबरीमाला गए थे.

कनक दुर्गा: यह सभी आरोप निराधार और झूठे हैं. हमने सरकार के कहने पर मंदिर में प्रवेश नहीं किया. दरअसल सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद सबरीमाला जाने की इच्छा रखने वाली महिलाओं ने कई समूहों (ग्रुप) का गठन किया था. मैं भी उन फेसबुक और वाट्सऐप ग्रुप की सदस्य थी, जो मंदिर जाने की इच्छुक महिलाओं को प्रेरित करने और उनका समर्थन करने के लिए बनाए गए थे. बिंदू अम्मिनी से मेरी जान-पहचान 'रेनेसां केरला टुवर्ड्स सबरीमाला' नामक ग्रुप के जरिए हुई थी. हमारे जैसी कई महिलाएं इन ग्रुप में शामिल हो गई थीं और सबरीमाला जाने की तैयारी कर रही थीं. लेकिन हिंसक विरोध-प्रदर्शनों को देखने के बाद उनमें से अधिकांश महिलाएं पीछे हट गई थीं.

हालांकि, मैंने और बिंदू अम्मिनी ने आगे बढ़ने का फैसला किया. अपनी योजना के मुताबिक हम दोनों 26 दिसंबर को सबरीमाला पहुंच गए थे. लेकिन वहां मौजूद प्रदर्शनकारियों ने हमें भगा दिया. फिर भी हम पीछे हटने को तैयार नहीं थे. लिहाजा हमने पुलिस से सहायता मांगी. पुलिस के सहयोग से हमने 2 जनवरी को मंदिर में प्रवेश किया और भगवान अयप्पा के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त किया. लेकिन अब मंदिर में युवा महिलाओं के प्रवेश का विरोध करने वाले तरह-तरह की गलत बातें और झूठ प्रचारित कर रहे हैं. मैं एक बार फिर साफ कर दूं कि, सबरीमाला मंदिर में हमारे प्रवेश के पीछे कोई भी राजनीतिक दल या एजेंसी नहीं थी.

फ़र्स्टपोस्ट: आपने जो किया उसके खिलाफ इतनी हाय-तौबा और कलह होगी क्या आपने कभी इसकी कल्पना की थी? जो कुछ भी हुआ उसके बारे में फिलहाल आप कैसा महसूस करती हैं?

कनक दुर्गा: मुझे पूरी उम्मीद थी कि, मेरी हरकत से मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का विरोध करने वाले दक्षिणपंथी संगठन भड़क उठेंगे और कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर करेंगे. मैं यह सोचकर सबरीमाला गई थी कि, मुझे हिंसक विरोध का सामना करना पड़ेगा. लिहाजा मैं उनका सामना करने के लिए मानसिक तौर पर तैयार थी. क्योंकि व्यक्तिगत तौर पर मैं इस बात के लिए आश्वस्त थी कि, रीति-रिवाजों और अनुष्ठानों में सुधार अपरिहार्य हैं.

फ़र्स्टपोस्ट: क्या इतने तल्ख तजुर्बे के बाद अब आपको सबरीमाला मंदिर में जाने के अपने फैसले पर किसी तरह का कोई पछतावा है?

कनक दुर्गा: अपने फैसले पर मुझे बिल्कुल भी पछतावा नहीं है. मुझे कभी यह एहसास नहीं हुआ कि मैंने जो किया है वो गलत था और मुझे वो नहीं करना चाहिए था. मैं इस वक्त तमाम परेशानियां और कठिनाइयां झेल रही हूं. लेकिन सही और न्याय संगत उद्देश्य के लिए उठाए गए कदम पर मुझे न तो अभी कोई पछतावा है और न ही भविष्य में कभी होगा. मुझे इस बात का भी कोई एहसास नहीं है कि मेरे फैसले ने मेरी जिंदगी बर्बाद कर दी है. अगर हम इतिहास में झांकेंगे तो पाएंगे कि, समाज में हर बदलाव का ऐसे ही विरोध होता आया है. समाज की प्रगति के लिए परिवर्तन अपरिहार्य है. हमारा सबरीमाला मंदिर में प्रवेश करना भी ऐसी ही एक घटना है. इसलिए, मुझे नहीं लगता कि मैंने जो किया है वो गलत है. मुझे कोई पछतावा नहीं है.

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