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प्रद्युम्न के वकील का कॉलम: भारत के हर कोने में असुरक्षित हैं बच्चे

बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए तत्काल एक मजबूत राष्ट्रीय नीति बनाए जाने की आवश्यकता है वरना कहीं उनका बचपन कहीं गुम ना हो जाए

Sushil K Tekriwal Sushil K Tekriwal Updated On: Nov 20, 2017 02:57 PM IST

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प्रद्युम्न के वकील का कॉलम: भारत के हर कोने में असुरक्षित हैं बच्चे

प्रद्युम्न हत्याकांड ने सारे देश को झकझोर कर रख दिया है. बच्चों को अपनी चपेट में लेना किसी के लिए भी काफी आसान होता जा रहा है. बच्चों की उपेक्षा और अवहेलना से पैदा हो रहे संकट को खतरनाक स्तर पर पहुंचाने की जिम्मेदारी भी हमारी ही है. इनके इर्द-गिर्द सुरक्षा के अभेद्य घेरे की संरचना आज हर माता-पिता की जिम्मेदारी बन चुकी है जिसका वैज्ञानिक तरीके से हल निकालना है.

बच्चे हमारे मूल्यवान संसाधन हैं और बच्चों के भोलेपन और इनके बचपन की सुरक्षा करना हम सबकी सबसे पहली प्राथमिकता है. हमारा उद्देश्य बच्चों के अधिकारों का संरक्षण विशेषकर सभी प्रकार के भेदभाव, दुर्व्यवहार, उपेक्षा, शोषण, अत्याचार, तस्करी नशीले पदाथों की लत या किसी भी तरह की हिंसा से सुरक्षा प्रदान करना है.

बाल सुरक्षा के महत्व को कम कर के आंकने के प्रयासों का समुचित मूल्यांकन और सकारात्मक निर्धारण बेहद जरूरी है क्योंकि इससे पैदा हो रहा खतरा भयानक विकराल रूप लेता जा रहा है. इसी संदर्भ में कानून की संकल्पना, परिकल्पना और अवधारणा को समझना भी जरूरी है. कानूनी पद्धति के साथ-साथ सामाजिक और मनोवैज्ञानिक समाधान तलाशे जाने की तत्काल जरूरत है.

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भूमंडलीकरण के इस दौर में दुनिया का हर पांचवा बच्चा भारत में रहता है. दुनिया का हर तीसरा कुपोषित बच्चा भारत में रहता है. हर दूसरा भारतीय बच्चा कम वजन का है. भारत में हर चार बच्चों में से तीन में खून की कमी होती है. हर दूसरे नवजात शिशु में आयोडीन की कमी के कारण उसके सीखने की क्षमता कम होती है. जन्म का पंजीकरण सिर्फ 62% है. प्राथमिक स्तर पर शिक्षा जारी रखने का प्रतिशत 71.1% है. प्राथमिक स्तर पर लड़कियों के दाखिले का प्रतिशत 47.79% है. देश में 11.04 करोड़ बाल मजदूर है और 3 वर्ष से कम उम्र के 79% बच्चों में खून की कमी होती है. बच्चों में टीकाकरण की पहुंच भी बहुत कम है. ऐसे में सरकार के संकल्प और उसकी क्षमता पर भी सवालिया निशान लगता है.

कानून बहुत पर पालन कितना?

बच्चों के समग्र विकास के लिए शिक्षा के अधिकार को संवैधानिक अधिकार का दर्जा दिया गया. इसके लिए नि:शुल्क व अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 पारित किया गया. बच्चों के अधिकारों के संरक्षण के लिए नि:शुल्क व अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के तहत बाल अधिकार आयोग के राष्ट्रीय व प्रादेशिक स्तर पर गठन किए जाने का प्रावधान भी किया गया है.

यह प्रावधान इस कानून के अधिनियम 31 के तहत किया गया है. इस कानून के अधिनियम 15, 17, 24 और 32 के तहत भी महत्वपूर्ण व्यवस्था की गई है जिसमें बच्चों को अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा देने से लेकर बच्चों के अधिकारों के निष्पादन के लिए शिकायत निवारण प्रकोष्ठ भी बनाए जाने की बात कही गई है.

hungry children

यह व्यवस्था बच्चों के अधिकारों के संरक्षण के लिए की गई है. इसके लिए और भी ज्यादा जन-जागरण अभियान चलाए जाने और इसको समग्र रूप में लागू करने की आवश्यकता है ताकि बच्चों के मौलिक अधिकारों को संरक्षित किया जा सके. साथ ही इसके लिए एक प्रबल राष्ट्रीय नीति बनाए जाने की भी जरूरत है. आज भी भारत एक ऐसा देश है जहां बाल विषयों पर सबसे कम संवेदनशीलता देखी जाती है.

साथ ही आज राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग, बच्चों के लिए नई राष्ट्रीय नीति, एकीकृत बाल संरक्षण योजना, सर्वशिक्षा अभियान, बाल मजदूरी के नियंत्रण के प्रयास और बाल विवाह रोकने के प्रयासों पर विशेष रूप से ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है.

देश में बच्चों का भविष्य अनिश्चित

सुप्रीम कोर्ट ने अविनाश मेहरोत्रा बनाम सरकार मामले में 14 अगस्त, 2017 को दिए गए अपने एक अहम फैसले में साफ तौर पर कहा है कि सरकार और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण बाल सुरक्षा से संबंधित कानूनों को तत्काल प्रभाव से लागू करे. यह फैसला काफी क्रांतिकारी साबित हुआ है हालांकि इसके प्रभावशाली क्रियान्वयन को लेकर सरकार की गंभीरता जरूरी है.

साथ ही जमीनी स्तर पर मौजूदा कानून को लागू करना, लागू करने के दौरान आने वाली समस्याओं और खामियों का पता लगाना, रचनात्मक नीति निर्माण और कार्यक्रम कार्यान्वयन के लिए विभिन्न उपायों को विकसित करना, और बाल कल्याण के समग्र विकास के लिए व्यक्ति से लेकर विभिन्न संगठनों की भागीदारी बढ़ाने की जरूरत है ताकि कानून के सकारात्मक क्रियान्वयन का असर सामने आए.

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अगर ऐसा नहीं हुआ तो देश के नव निर्माण में आने वाले भविष्य की भावी-पीढ़ी (जो आज बच्चे हैं) की भागीदारी से राष्ट्र सदा के लिए वंचित रह जाएगा. स्थापित कानूनों के केवल कागजों पर बने रहने से एक ऐसी शून्यता पैदा होगी जो कतई कानूनसंगत नहीं होगी. निश्चित ही, बच्चों से संबंधित अपराध और बच्चों द्वारा किए जाने वाले अपराधों में भारी बढ़ोतरी होगी जिसका निवारण आज में है, कल में नहीं.

(लेखक प्रद्युम्न हत्याकांड मामले में सुप्रीम कोर्ट में प्रद्युम्न परिवार के वकील हैं)

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