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यश भारती पुरस्कार: समाजवाद की बहती गंगा में सिर्फ 'नजदीकी' हाथ धोते थे

यश भारती पुरस्कार लेने वालों में 6 लोग ऐसे हैं जो किसी ना किसी समाजवादी नेता की सिफारिश पर पुरस्कार हासिल कर पाए हैं

Amitesh Amitesh Updated On: Aug 30, 2017 04:08 PM IST

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यश भारती पुरस्कार: समाजवाद की बहती गंगा में सिर्फ 'नजदीकी' हाथ धोते थे

अगर किसी को भी एक मुश्त ग्यारह लाख रुपए और फिर आजीवन पचास हजार रुपए पेंशन मिल जाएं तो फिर उसकी तो बल्ले-बल्ले ही हो जाएगी. उसे तो लगेगा कि मानो उसे मुंह मागा वो सबकुछ मिल गया जिसे बड़े-बड़ों को कड़ी मशक्कत के बाद भी नसीब नहीं हो पाता है. लेकिन, यह कहानी नहीं हकीकत है. ऐसा सबकुछ हो रहा है उत्तर प्रदेश में.

हम बात कर रहे हैं यूपी सरकार की तरफ से दिए जाने वाले यश भारती पुरस्कार की. यश भारती पुरस्कार पाने वालों को इतनी बड़ी रकम दी जाती है और ऊपर से पेंशन भी. लेकिन, एक आरटीआई के खुलासे ने साबित कर दिया है कि यश भारती पुरस्कार देने में घालमेल जमकर हुआ है.

इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के मुताबिक, 2012 से लेकर 2017 के बीच अखिलेश सरकार की तरफ से दिए गए यश भारती पुरस्कार में जमकर पक्षपात देखने को मिला. इसमें यूपी के समाजवादी नेताओं की भी खूब चली. उनकी सिफारिशों पर कई ऐसे लोगों को यश भारती पुरस्कार मिला जिनकी काबिलियत खुद सवालों के घेरे में है.

Akhilesh Yadav

इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के मुताबिक, यश भारती पुरस्कार पाने के लिए आवेदन और चुनाव की कोई प्रक्रिया नहीं देखी गई. यहां तक कि सीधे अखिलेश सरकार के दौरान मुख्यमंत्री कार्यालय को सीधे आवेदन देकर 21 लोगों ने यह पुरस्कार लिया था.

खुलासे के मुताबिक यश भारती पुरस्कार लेने वालों में 6 लोग ऐसे हैं जो किसी ना किसी समाजवादी नेता की सिफारिश पर पुरस्कार हासिल कर पाए हैं. अखिलेश सरकार में कद्दावर मंत्री रहे उनके चाचा शिवपाल यादव की सिफारिश पर दो लोगों को जबकि मंत्री आजम खान की सिफारिश पर एक व्यक्ति को यश भारती पुरस्कार से नवाजा गया है. एसपी सरकार के बाहुबली विधायक और उस वक्त मंत्री रह चुक राजा भैया ने भी दो लोगों को पुरस्कार दिलाने में मदद की थी.

यश भारती पुरस्कार की शुरुआत सबसे पहले 1994 में हुई थी जब मुलायम सिंह यादव यूपी के मुख्यमंत्री थे. लेकिन, बाद में बीएसपी और बीजेपी की सरकारों ने इसे बंद कर दिया था. लेकिन, 2012 में यूपी में मुलायम सिंह के बेटे अखिलेश यादव के नेतृत्व में एसपी सरकार बनने के बाद इसे फिर से शुरू किया गया था.

यश भारती पुरस्कार के तहत समाज के किसी भी क्षेत्र में बेहतर काम करने वाले लोगों को पुरस्कृत किया जाता है. साहित्य से लेकर शिक्षा और पत्रकारिता के क्षेत्र में या फिर संस्कृति, संगीत, नाटक, फिल्म और चिकित्सा के क्षेत्र में सराहनीय काम के लिए यह पुरस्कार दिया जाता है. इसके अलावा समाजसेवा, खेल, उद्योग या ज्योतिष के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान के लिए यश भारती पुरस्कार दिया जाता है.

इस पुरस्कार का दायरा इतना बड़ा है कि इसमें अपने-अपने चहेतों को किसी ना किसी तरह से किसी भी क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान का हवाला देकर आवेदन करा दिया जाता है. सिफारिशों के बाद स्वीकृति तो पहले से ही तय होती है. बस इसके बाद बचता क्या है. अपने-अपने चहेते को एक मुश्त ग्यारह लाख और फिर हर महीने पचास हजार बिना कुछ किए धरे मिलते रहते हैं.

खुलासे के मुताबिक, मुलायम सिंह के गांव सैफई में हर साल होने वाले सैफई महोत्सव को संचालित करने वाले एक टी वी एंकर को भी यश भारती पुरस्कार मिला.

इसके अलावा मुख्यमंत्री कार्यालय में काम करने वाले एक ऐसे व्यक्ति को पुरस्कार दिया गया जिसने महज दो महीने ही मेघालय में अपने फील्ड वर्क और रिसर्च को आधार बनाया था.

खबर के मुताबिक, एक 19 साल की आईएएस की बेटी को भी  इस पुरस्कार से सम्मानित किया गया है. इस पुरस्कार को लेकर सबसे बड़ी विडंबना यही है कि इसको देने को लेकर कोई मापदंड ऐसा नहीं बनाया गया है जिसमें पारदर्शिता दिखे.

yash bharti

अब यूपी में योगी सरकार आने के बाद इस पुरस्कार की समीक्षा की जा रही है. हर महीने दिए जाने वाले पचास हजार रुपए के पेंशन की योजना की खासतौर पर समीक्षा की जा रही है.

पुरस्कार के नाम पर पानी की तरह पैसे बहाने की यह कला भला समाजवादियों से बेहतर कौन समझ सकता है. आम आदमी और गरीब-गुरबा की लड़ाई के नाम पर सत्ता में आने के बाद समाजवादी सत्ता की चकाचौंध में इस कदर मग्न हो जाते हैं कि ना ही उन्हें आम आदमी की फिक्र रहती है और ना ही उन गरीब-गुरबा की चिंता जिनके दम पर उनको सत्ता की चाबी मिलती है. बस वो तो अपना कल्याण करने और अपने लोगों को सम्मान देने में लग जाते हैं.

सत्ता तंत्र के दुरुपयोग का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है जहां ना कायदे ना कानून, ना ही कोई उचित व्यवस्था और कोई मापदंड. बस अपने लोगों को फायदा पहुंचाने के नाम पर सबकुछ ताक पर रख दिया जाता है.

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