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केपीएस गिल : जिनके जैसे पुलिस वालों को सारा देश चाहता है

अपने दशक भर लंबे करियर में असम में वो एक भी एनकाउंटर का हिस्सा नहीं थे

Avinash Dwivedi Updated On: May 27, 2017 07:44 AM IST

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केपीएस गिल : जिनके जैसे पुलिस वालों को सारा देश चाहता है

देश के सबसे प्रसिद्ध पुलिस अधिकारियों में से एक केपीएस गिल का निधन हो गया. दिल्ली के सर गंगाराम हॉस्पिटल में उनका इलाज चल रहा था. वे 82 साल के थे. केपीएस गिल को ही पंजाब से आतंकवाद के खात्मे का श्रेय जाता है.

केपीएस गिल ने 24 साल की उम्र में पुलिस सेवा ज्वाइन की थी. गिल ने भारतीय पुलिस सेवा में अपने करियर की शुरुआत पूर्वात्तर के राज्य असम से की थी. वे इससे 28 साल जुडे़ रहे. सख्त अधिकारी के रूप में उनकी पहचान शुरू से ही बन गई थी.

पंजाब पुलिस प्रमुख के रूप में वो 1980 के दशक में वो पूरे देश में प्रसिद्ध हो गए. ये वो वक्त था जब पूरा पंजाब आतंकवाद की आग से झुलस रहा था. ऐसे में आतंकियों से सख्ती से निपटने के लिए गिल को आज भी याद किया जाता है. गिल को उनकी सेवा के लिए 1989 में पद्म भूषण से भी सम्मानित किया गया था.

पॉलिटिकल दबाव नहीं चाहते थे इसलिए चुना था असम कैडर

पुलिस सेवा में जाने के बाद असम-मेघालय कैडर चुनने के पीछे गिल कारण बताते थे कि वो अपने काम पर पॉलिटिकल दबाव नहीं चाहते थे. और होम कैडर पंजाब में ये संभव न होता इसलिए उन्होंने असम-मेघालय चुनने का फैसला किया.

केपीएस गिल को नजदीक से जानते वाले उनके ब्राडेंड व्हिस्की से प्रेम को भी जानते हैं. कभी-कभी ऑल आसाम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) के लीडर्स के साथ वो मीटिंग्स में व्हिस्की शेयर भी किया करते थे. हालांकि 1960 और 1970 के दशक में इस स्टूडेंट विंग की विचारधारा से उनके गहरे मतभेद थे.

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अपने काम करने के तरीके के चलते वहां के लोगों के बीच 'कामरूप पुलिस सुपरिटेंडेंट गिल' के नाम से केपीएस गिल को पहचान मिल गई थी. लोगों को वहां दशको तक ये अधिकारी याद रहा.

हालांकि गिल को राष्ट्रीय स्तर पर असम के चलते पहचान नहीं मिली और होम कैडर से बचने वाले गिल को पंजाब लौटना पड़ा. जहां पर वो खूनी संघर्ष में घिर गए पर उस किस्से पर आने से पहले आपको बताते चलें कि अपने दशक भर लंबे करियर में असम में वो एक भी एनकाउंटर का हिस्सा नहीं थे.

कड़क केपीएस गिल को प्राकृतिक खूबसूरती से गहरा लगाव था

KPS Gill

शिलांग की प्राकृतिक सुंदरता केपीएस गिल को बहुत भाती थी और वो इस हिल टाउन में एक छोटा सा घर बनाना चाहते थे. हालांकि 1984 के बाद उनकी नियुक्ति फिर पूर्वोत्तर में ना होने के चलते वो इस विचार पर काम नहीं कर सके. क्योंकि बाद में नॉर्थ ईस्ट से उनका जुड़ाव ही नहीं रह गया.

पर उन्होंने अपने सपनों का वो छोटा सा घर शिमला में बनाया. जहां पर वो हर गर्मियों में अपने कुछ दिन बिताया करते थे.

खुलकर ऑपरेशन 'ब्लू स्टार' और 'ब्लू थंडर' पर रखी है अपनी बात

गिल तेज तर्राक अफसर के रूप में विख्यात थे. उन्होंने ही ऑपरेशन ब्लू स्टार की अगुवाई की थी. ऑपरेशन ब्लू स्टार के चार साल बाद गोल्डन टेंपल से आतंकियों को बाहर निकालने के लिए ‘ऑपरेशन ब्लैक थंडर’ किया गया था, जिसका नेतृत्व भी केपीएस गिल ने ही किया था.

सिक्ख आतंकियों के प्रति कुछ सिक्ख भी सहृदय थे. इसलिए आतंकियों के प्रति गिल की निर्ममता देखकर सिक्ख समुदाय के लोगों के विचार ऐसे भी बने कि ये आदमी सिक्खों से नफरत करता है. हालांकि बाद में वो धीरे-धीरे सही-गलत समझने लगे.

इन सबका जिक्र गिल अपनी किताब में करते हैं. 'द नाइट्स ऑफ फाल्सहुड' नाम की गिल की ये किताब 1997 में आई थी. गिल ने इस किताब में 'ऑपरेशन ब्लू स्टार' और 1984 में हुए सिक्ख विरोधी दंगों की आलोचना की है.

गिल अपनी किताब में 'ऑपरेशन ब्लू स्टार' को 'एक अनाड़ी का काम' कहते हैं. जिसकी पूरी जिम्मेदारी इसके राजनीतिक योजना निर्माताओं पर है. गिल कहते हैं कि मिलिट्री कमांड को ऐसे ऑपरेशन में शामिल करना 'प्रतिक्रियावादी होने की हद' है. और ऐसी घटनाएं लंबे वक्त तक बेवकूफी भरे शासन के बाद ही सामने आती हैं.

New Delhi: File photo of former Punjab DGP KPS Gill who passed away at a hospital in New Delhi on Friday. He was 82. PTI Photo by Vijay Kumar Joshi(PTI5_26_2017_000086B)

गिल इस ऑपरेशन के लिए कार्य-कारण संबंधों का एक सीधा सा खाका खींचने की कोशिश करते हैं. कहते हैं कि ऑपरेशन होने से पहले तमाम आतंकी हिंसाओं में कुल 410 लोग मरे थे. और इस ऑपरेशन के बाद मात्र एक साल में 910 लोग मारे गए.

गिल का कहना है, कोई भी इंदिरा गांधी की हत्या के बाद तीन दिनों तक चले राजनीति से प्रेरित सिक्खों के नरसंहार को सही नहीं ठहरा सकता. गिल बाद की सरकारों का भी दोष इसमें मानते हैं क्योंकि ना ही इससे जुड़े लोगों की न गिरफ्तारियां हुईं, ना मामले की सही से जांच हुई और ना ही दोषियों को सजा मिली.

गुस्से में गिल कहते हैं, यहां पर कोई मानवाधिकारों की अवज्ञा करने वाली, खून की प्यासी, फासीवादी सरकार काम नहीं करती, फिर भी ऐसा हुआ. गिल ने इस किताब में ऑपरेशन ब्लू स्टार की 1987 में किए गए ऑपरेशन ब्लैक थंडर से तुलना भी की है.

बताते चलें कि ऑपरेशन ब्लैक थंडर में ऑपरेशन ब्लू स्टार की तुलना में काफी कम नुकसान हुआ था. हालांकि 41 आतंकी मारे गए थे और 200 गिरफ्तार हुए थे. पर मंदिर को इससे खास नुकसान नहीं हुआ था. गिल ऑपरेशन 'ब्लैक थंडर' को पंजाब के आतंकी युद्ध में एक महत्वपूर्ण मोड बताते हैं.

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गिल ने लिखा है कि इसके बाद से मंदिर की पवित्रता के सामने अपना ये कायरतापूर्ण काम न्यायोचित ठहराना आतंकियों और उनके नेताओं के लिए मुश्किल हो गया और उन्होंने जनता के दिल में जो जगह बनाई थी वो खो दी.

हालांकि किताब में बहुत से पन्ने नहीं थे जिससे ये तो साफ नहीं हुआ कि घटनाएं ज्यादातर कैसे-कैसे हुईं पर ये साफ हो गया कि उनके बारे में गिल क्या सोचते हैं और वो इन्हें कैसे देखते हैं?

पुलिस विभाग से हॉकी फेडरेशन तक का सफर

kps gill

केपीएस गिल 1995 में पुलिस फोर्स से रिटायर हुए थे. रिटायर होने के बाद भी गिल भारत सरकार के आतंकवाद निरोधी मामलों के सलाहकार भी रहे. उनको पंजाब सरकार में सुरक्षा सलाहकार बनाया गया था.

गिल को छत्तीसगढ़ की रमन सरकार ने भी नक्सली समस्या के समाधान के लिए सुरक्षा सलाहकार बनाया था. गिल इंडियन हॉकी फेडरेशन आईएचएफ के प्रेसिडेंट भी थे. इस दौरान हॉकी ने कई ऊंचाईयों को छुआ और मेडल जीते.

मोदी को क्लीन चिट देने के चलते भी किया जाता है याद

गिल को 2002 को दंगों के दौरान मोदी का सुरक्षा सलाहकार नियुक्त किया गया था. केपीएस गिल पर आई किताब में उनके एक बयान का जिक्र है, जिसमें वो मोदी के बारे में कहते हैं कि वो मोदी की निष्कपटा से बेहद प्रभावित हुए.

उन्होंने कहा था, 'इस किताब के पन्नों के जरिए मैं हर एक से इस बात को साफ कर देना चाहता हूं कि मोदी इस पूरी खलबली के दौरान कभी भी सांप्रदायिक नहीं थे.' इस तरीके से उन्होंने मोदी को सारे आरोपों से अपनी तरफ से क्लीन चिट से दे दी थी.

राहुल चंद्रन की केपीएस पर आई किताबों में इस बात का जिक्र है. हालांकि गिल पर आई इस किताब में लेखक पूरी तरह से उनकी नायक वाली छवि को और पुख्ता करने में लगा रहा है.

गिल मुखर थे और दिल्ली के नेताओं को भी ठहराते थे पंजाब का गुनहगार

गिल ने इस किताब में एक जगह ये भी कहा है कि एक और कारण जिसने पंजाब में आंतकवाद को इस खतरनाक स्तर पर पहुंचाया वो दिल्ली की इसमें दिल्ली के कुछ बड़े लोगों की सांठ-गांठ भी थी.

ये वो लोग थे जो पंजाब की पॉलिटिक्स पर अपनी पकड़ मजबूत करना चाहते थे. जो सरकार सत्ता में थी वो बढ़ती हिंसा पर नियंत्रण ही नहीं स्थापित करना चाहती थी क्योंकि उसे अपने राजनीतिक विरोधियों को दबाकर रखने की ख्वाहिश थी. इस व्यवहार ने आतंकवाद के मामलों को तेजी से बढ़ावा दिया.

गिल नेताओं और आतंकियों के बीच में एक साफ संबंध भी स्थापित करते हैं. अकाली दल को तो वो दोषी मानते ही हैं. उन्होंने 1980 के चुनावों में कांग्रेस के तीन प्रत्याशियों को भिडरावाले का समर्थन देने पर भी सवाल उठाए थे. साथ ही उन्होंने तत्कालीन गृह मंत्री ज्ञानी जैल सिंह को भी भिंडरावाले को बचाने वाला बताया था.

हालांकि इस बात के लिए ही केपीएस गिल की तारीफ की जानी चाहिए कि वो अस्मिता की राजनीति से पूरी तरह बचे और उन्होंने साफ-साफ ब्यौरा जो उन्होंने पंजाब के डीजी के रूप में देखा उसे लिखा साथ ही उसमें उनके पूर्वाग्रह युक्त न होने के चलते कई बातों को सत्य के बेहद करीब माना जाना चाहिए.

जब खाकी वर्दी वाला बना देश के नौजवानों का प्रेरणास्रोत

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केपीएस गिल जो कि सिस्टम को ज्यादा से ज्यादा लोगों के लिए बदलना चाहते थे. एक ऐसे अधिकारी के रूप में अपने महकमें में याद किए जाते थे जो कि अपने जूनियर्स के साथ खड़ा होता था. अपने से अच्छे लोगों को भी पीछे छोड़ देता था और जिसमें बुरे को बुरा कहने का साहस था. साथ ही उन्हें अपने काम में हस्तक्षेप भी पसंद नहीं था.

केपीएस गिल एक ईमानदार, बहादुर, सक्षम और सही अफसर थे. वो सारे लक्षण उनमें थे जो कि किसी भी पुलिस अफसर में होने चाहिए. गिल निस्संदेह रूप से आजाद भारत में एक सुपरकॉप रहे हैं. वो खाकी पहने हुए कुछ ही लोगों में से हैं जो भारत के नौजवानों के लिए प्रेरणा के स्त्रोत बनें.

एक रोचक बात ये भी है कि केपीएस गिल अपना आदर्श गांधी को मानते थे. स्कूल और कॉलेज के दिनों में उन्होंने पूरे मन से गांधी के अहिंसा के सिद्धांत का पालन किया. पर एक ऐसा दौर आया जब उन्हें बंदूक उठानी पड़ी. पर उसके पीछे प्रेरणा थी उनकी अदम्य देशभक्ति.

गिल ने जो पंजाब में कर दिखाया था वो दुनिया के किसी भी देश में राजद्रोह के दौरान पुलिस की सबसे बड़ी जीत में से एक है. पर कुछ लोगों ने लोकतंत्र की गिरती हालत कहकर और मानवाधिकार के उल्लंघन का हवाला देकर इसकी आलोचना की थी. गिल ने अपनी किताब 'द नाइट्स ऑफ फाल्सहुड' के जरिए आलोचकों को जवाब भी दिया था.

गिल का कहना था कि 1988 से 1992 के दौरान जब 1,566 पुलिस वाले मार दिए गए और उनके घर के भी कई बेकसूर लोगों को आतंकियों ने मौत के घाट उतार दिया गया था. उस वक्त ये मानवाधिकार और लोकतंत्र के पक्षधर क्यों शांत बैठे थे? वो पंजाब पुलिस ही थी जिसने आकाश में तिरंगे को ऊंचा रखा. इसे  हमेशा ऊंचा रखने के लिए अपनी जान दी.

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