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Right to Privacy: जानिए सुप्रीम कोर्ट कैसे पहुंची इस ऐतिहासिक फैसले तक

2014 में आई एनडीए की सरकार ने आधार को अनिवार्य बनाकर हर सरकारी योजनाओं से जोड़ना शुरू किया था. जिसका लोगों ने विरोध भी किया.

FP Staff Updated On: Aug 24, 2017 04:35 PM IST

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Right to Privacy: जानिए सुप्रीम कोर्ट कैसे पहुंची इस ऐतिहासिक फैसले तक

गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने आधार पर आखिर एक लंबी बहस के बाद सुरक्षित किए गए फैसले को सार्वजनिक कर दिया. कोर्ट ने कह दिया है कि राइट टू प्राइवेसी या निजता का अधिकार देश के नागरिकों का मौलिक अधिकार है.

कोर्ट के आदेश से साफ है कि किसी भी नागरिक की निजी जानकारी पर सरकार का कोई हक नहीं होगा. अगर किसी नागरिक की निजी जानकारी लीक होती है, तो इसकी जिम्मेदारी सरकार की होगी.

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने आधार पर कुछ नहीं कहा है. मतलब ये बहस बनी हुई है कि आधार को अनिवार्य बनाया जाए या नहीं.

जानिए, निजता के अधिकार पर बहस कैसे शुरू हुई और सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कब-कब सुनवाई की और क्या कहा-

आधार अनिवार्य पर प्राइवेसी की बहस

सरकार सभी नागरिकों को 12 अंकों का ‘आधार’ नंबर दे रही है, जिसके तहत लोगों की निजी सूचनाओं के साथ बायोमैट्रिक्स यानी चेहरे का विवरण, अंगुलियों के निशान और आंखों की पुतली के निशान का डेटा-बेस बनाया जा रहा है. लेकिन बहस तब शुरू हुई, जब 2014 में आई एनडीए की सरकार ने आधार को अनिवार्य बनाकर हर सरकारी योजनाओं से जोड़ना शुरू किया. बाद में ये भी आदेश आया कि आधार को पैन कार्ड और बैंक अकाउंट से भी लिंक कराना होगा.

इसके बाद लोगों ने इसका विरोध शुरू किया. उनका डर था कि निजी जानकारियों को हर जगह लिंक कराने से असुरक्षा बढ़ेगी, डेटा लिंक होने का खतरा बढ़ेगा. सरकार बाद में ये डर सच भी साबित हुआ. झारखंड में इसी साल 16 लाख लोगों के आधार की जानकारी लीक हो गई थी.

आधार की वजह से शुरू हुई निजता के अधिकार की बहस. सरकार के इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई, जहां सन् 2015 में मामले की सुनवाई के लिए संविधान पीठ गठित करने का निर्देश दिया गया.

ये रही सुनवाई की टाइमलाइन-

जुलाई 21, 2015- जस्टिस जे चेलामेश्वर, एस. ए. बोबडे और सी नगप्पन की बेंच ने स्पष्ट किया कि आधार कार्ड के अधिकारियों द्वारा की गई मांग सुप्रीम कोर्ट के 23 सितंबर, 2013 के अंतरिम आदेश का स्पष्ट उल्लंघन है, जिसमें कहा गया है कि आधार स्वैच्छिक है.

जुलाई 22, 2015: केंद्र ने इसका जवाब दिया कि संविधान निर्माताओं ने निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार नहीं बनाया है. निजता का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं है. इसलिए ये याचिका रद की जानी चाहिए. निजता का अधिकार पर सार्वजनिक हित में कुछ प्रतिबंध जरूरी हैं.

अगस्त 6, 2015: तीन जजों की बेंच ने याचिका पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया. इन याचिकाओं ने आधार कार्ड प्रोजेक्ट को बायोमैट्रिक रजिस्ट्रेशन और बेसिक और अहम सब्सिडी योजनाओं के साथ जोड़े जाने को निजता के अधिकार का उल्लंघन बनाया था. केंद्र ने बड़े बेंच की मांग की ताकि इससे जुड़े कानूनों और निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है या नहीं पर जवाब दिया जा सके.

11 अगस्त, 2015: बेंच का मानना था कि अगर आधार को अनिवार्य नहीं बनाया गया और न ही सरकारी लाभों तक पहुंचने के लिए कोई शर्त बनाई गई तो 'बैलेंस ऑफ इंट्रस्ट' बेहतर तरीके से काम करेगी. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यही अंतरिम आदेश ही चलता रहेगा, जब तक 5 जजों की बेंच ये निर्धारित नहीं कर लेती कि आधार योजना और बायोमैट्रिक रजिस्टेशन नागरिकों के निजता का हनन करते हैं या नहीं.

7 अक्टूबर, 2015:  सुप्रीम कोर्ट ने इस सवाल को कि किसी सरकारी लाभ को लेने के लिए कोई व्यक्ति स्वेच्छा से अपना निजता का अधिकार छोड़ दे तो इसके लिए क्या फैसला होगा, एक संविधान खंडपीठ को दे दिया.

8 अक्टूबर, 2015: सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस एचएल दत्तू ने दूसरी इस मुद्दे पर फिर से बहस करने के लिए दूसरी संविधान बेंच बनाई.

15 अक्टूबर, 2015: सुप्रीम कोर्ट ने आधार कार्ड के इस्तेमाल को मनरेगा, पेंशन स्कीमों, ईपीएफ, प्रधानमंत्री जनधन योजना तक बढ़ा दिया.

25 अप्रैल, 2016: सांसद जयराम रमेश ने आधार को मनी बिल के रुप में पेश करने पर इसे बेशर्मी और बुरा बताया, जिसके बाद ये फिर एससी के स्कैनर के तहत आ गया.

27 मार्च, 2017: चीफ जस्टिस जेएस खेहर ने कहा कि सरकार की आधार को अनिवार्य बनाने की योजना में कोई गड़बड़ नहीं है, जबतक ये बैंक अकाउंट और इनकम टैक्स रिटर्न फाइल में अनिवार्य है. इसके बाद लोकसभा में टैक्स फाइल करने के लिए आधार और पैन कार्ड को अनिवार्य कर दिया.

27 अप्रैल, 2017: सीनियर एडवोकेट श्याम दीवान ने जज एके सिकरी और अशोक भूषण की बेंच के सामने ये बात रखी कि इनकम टैक्स एक्ट में बनाई गई नई धारा 139AA, जो आधार को अनिवार्य बनाती है, वो एक फासीवादी सौदा है. केंद्र ने कहा कि किसी के बायोमैट्रिक निशान लेना उसके शरीर पर अधिकार का उल्लंघन नहीं है.

19 मई, 2017: सुप्रीम कोर्ट ने मैग्सेसे विजेता शांता सिन्हा की याचिका के अलावा और भी कई याचिकाओं पर सुनवाई करने के लिए तैयार हो गया. ये याचिकाएं 30 जून, 2017 तक आधार को अनिवार्य बनाने के आदेश के खिलाफ डाली गई थीं.

9 जून, 2017: सुप्रीम कोर्ट ने इनकम टैक्स एक्ट के सेक्शन 139AA का समर्थन किया.

12 जुलाई, 2017: श्याम दीवान और अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने चीफ जस्टिस खेहर से पांच जजों की बेंच बनाने का आग्रह किया. खेहर ने अगली सुनवाई की तारीख 18 जुलाई रखी.

18 जुलाई, 2017: जस्टिस खेहर, जज चेलामेश्वर, बोबडे, डीवाई चंद्रचूड़ और एस अब्दुल नजीर की बेंच ने ये निर्णय लिया कि 5 जजों की बेंच को पहले ये फैसला लेना होगा कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है या नहीं. साथ ही ये संविधान का हिस्सा है या नहीं.

19 जुलाई, 2017: नौ जजों की बेंच ने (खेहर, चेलामेश्वर, बोबडे, चंद्रचूड़, आरके अग्रवाल, रोहिंगटन फली नरीमन, अभय मनोहर सापरे, संजय किशन कौल और नजीर) निर्णय लिया कि निजता निरपेक्ष नहीं है. यूनीक आईडेंटिफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने बताया कि सरकार ने एक कमेटी बनाई है जो देश में की डेटा प्रोटेक्शन इश्यूज पर विचार करेगी और ड्राफ्ट डेटा प्रोटेक्शन बिल के लिए सुझाव देगी.

2 अगस्त, 2017: नौ जजों की बेंच ने कहा कि निजता के अधिकार के मूल को बचाए रखने की जरूरत है.

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