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मॉब लिंचिंग: एक भीड़ गलत है तो दूसरी भीड़ सही कैसे?

नए कानून बनाए के बजाए देश को इस बात पर चिंतित होना चाहिए क्या हम समाज में इस बात की अनुमति देने को तैयार हैं कि लोगों को कानून अपने हाथ में लेना चाहिए?

Updated On: Jul 19, 2018 07:39 PM IST

T S Sudhir

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मॉब लिंचिंग: एक भीड़ गलत है तो दूसरी भीड़ सही कैसे?

54, 60, 66, 40, 50, 60, 58, 40, 55, 42, 36, 32, 32, 23, 23, 23, 26

ये कुछ अंक हैं जो कि पिछले 24 घंटों से चारों तरफ घूम रहे हैं. ये अंक महत्वपूर्ण हैं इसलिए जरूरी है कि इन पर एक निगाह डाली जाए. दरअसल ये अंक उन 17 दरिंदों की उम्र है, जिन्होंने चेन्नई में मानवता को शर्मसार करने का काम किया है. इन लोगों ने एक 12 साल की दिव्यांग नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार किया. वो भी एक या दो बार नहीं बल्कि ये सिलसिला पिछले 7 महीने से सेंट्रल चेन्नई के एक सोसायटी में चल रहा था. पकड़े गए आरोपी उसी कांप्लेक्स में सिक्योरिटी गार्ड, लिफ्ट ऑपरेटर, प्लंबर और उस कांप्लेक्स में पानी की सप्लाई करने वाले थे. इसके अलावा बाहर के कुछ लोग भी इस घृणित कार्य में शामिल थे.

मंगलवार को जब दुष्कर्म के सभी आरोपी चेन्नई के महिला कोर्ट में सुनवाई के लिए लाए गए तो कुछ वकीलों ने आरोपियों को तुरंत न्याय देने का फैसला कर लिया. ऐसे में वहां पर चेन्नई पुलिस की मौजूदगी के बाद भी उन्होंने कुछ आरोपियों को पुलिस के हाथों से दबोच लिया और उनकी जबरदस्त धुलाई कर डाली. काला कोट धारण कर लोगों को न्याय की आस दिलाने वालों ने खुद ही कानून को हाथ में ले लिया. ये घटना ये समझाने के लिए काफी है कि न्यायिक प्रकिया से जुड़े लोग ही न्यायिक प्रक्रिया की उस योग्यता को लेकर किस तरह के विचार रखते हैं जिसमें लोगों को समयबद्ध तरीके से न्याय मिलने की अपेक्षा होती है.

वकीलों के हमले के वक्त भीड़तंत्र पर सुप्रीम कोर्ट जता रहा था चिंता

मजेदार बात ये है कि चेन्नई के वकीलों ने जिस दिन आरोपियों के साथ मारपीट की उसी दिन सुप्रीम कोर्ट देश में बढ़ रहे भीड़तंत्र पर चिंता जताते हुए केंद्र सरकार से भीड़ के द्वारा लोगों को मार दिए जाने के खिलाफ कानून बनाने को कह रहा था. सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के दिन ही झारखंड में भी एक घटना हुई. वहां के पाकुड़ जिले में 80 वर्षीय स्वामी अग्निवेश की कथित रूप से भारतीय जनता युवा मोर्चा के कार्यकर्ताओं ने पिटाई कर डाली. इस घटना से चार दिन पहले कर्नाटक के बीदर में हैदराबाद के सॉफ्टवेयर इंजीनियर को भीड़ ने सिर्फ इसलिए पीट-पीट कर मार डाला क्योंकि उन्हें इंजीनियर पर बच्चा चोर होने का संदेह था.

इस बात में कोई संदेह नहीं है कि चेन्नई की घटना ने पूरे देश के मानस को झकझोर दिया है. ये कैसे हुआ कि 17 लोगों में से किसी एक के पास भी इतनी नैतिकता नहीं बची थी कि घटना का पता चलने पर बच्ची को बचाए. उलटे सबने शिकारी की तरह उस मासूम पर हमला कर दिया.

इस घटना का पता 13 जुलाई को उस समय चला जब उस 12 साल की बच्ची ने अपनी बड़ी बहन को पेट में दर्द होने की बात बताई. उसने बताया कि उसी कांप्लेक्स में रहने वाले लोगों ने उसके साथ बलात्कार और गैंगरेप कई बार किया.

उस बच्ची की मां ने पुलिस को जो बयान दिया उसके मुताबिक, उस लड़की के साथ बलात्कार कि पहली घटना 15 जनवरी को हुई थी जब उस अपार्टमेंट कांप्लेक्स का लिफ्ट ऑपरेटर उस बच्ची को बहला-फुसलाकर उसी कांप्लेक्स में एक सुनसान जगह पर ले गया और उसके साथ दुष्कर्म किया. लिफ्ट ऑपरेटर ने बच्ची को धमकी दी कि वो इस बात का जिक्र किसी से न करे. कुछ दिन बाद लिफ्ट ऑपरेटर कुछ बाहरी लोगों के लेकर आया और सबने मिलकर बच्ची के अपार्टमेंट के बेसमेंट में गैंगरेप किया. बच्ची को इस दौरान न केवल नशीला पदार्थ खिलाया गया बल्कि इस रेप का वीडियो भी बनाया गया. बाद में इसी के सहारे लड़की को ब्लैकमेल करके उसके साथ दुष्कर्म करने का सिलसिला शुरू हो गया. इस घृणित कार्य में जिसको मौका मिला वो बच्ची को बचाने के बजाए खुद इसमें शामिल हो गया. सबसे आश्चर्य की बात ये है कि इतने लंबे समय तक यह सब कुछ चलने के बाद भी बच्ची के अभिभावकों को कुछ भी पता नहीं चल सका. यहां तक कि उस सोसायटी में 300 परिवार रहते हैं उनमें से भी किसी को इसकी भनक तक नहीं लग सकी.

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने कमेंट्स के जरिए आरोपियों की चेन्नई कोर्ट परिसर में की गई पिटाई को सराहा है. उनका कहना था कि नाबालिग बच्ची के बलात्कार के आरोपी शैतान सरीखे हैं और वकीलों ने जो किया वो उसी के काबिल थे. लेकिन ये घटना भारतीय न्यायिक व्यवस्था को सोचने पर मजबूर करती है कि किस तरह से उनके सिस्टम के हिस्से को ही उनपर भरोसा नहीं है.

वारंगल एसिड अटैक में पुलिस का एनकाउंटर

ये घटना मुझे वारंगल के एसिड अटैक के एक मामले की याद दिलाती है. 2008 में जब आंध्र प्रदेश का बंटवारा नहीं हुआ था तब इंजीनियरिंग की दो छात्राओं पर तीन लड़कों के एसिड फेंकने का आरोप लगा था. लड़कियों ने उन लड़कों की गलत मांगों से इंकार कर दिया था जिसके बाद उन्होंने दोनों लड़कियों पर तेजाब फेंक दिया था. घटना के बाद आरोपी गिरफ्तार कर लिए गए लेकिन गिरफ्तारी के कुछ घंटों के बाद ही उन्हें पुलिस ने गोली मार दी.

आधिकारिक रूप से पुलिस का दावा था कि तीनों ने पुलिस पर हमला कर दिया था जिसके बाद आत्मरक्षा के लिए पुलिस को गोली चलानी पड़ी जिसमें तीनों की मौत हो गई. हालांकि पुलिस का दावा विश्वसनीय प्रतीत नहीं हो रहा था लेकिन इसकी परवाह किसी को नहीं थी. इस एनकाउंटर को न केवल लड़की के अभिभावकों ने सराहा बल्कि वारंगल से आने वाले मंत्री पोन्नावा लक्ष्मैया और समाज के अधिकतर लोगों ने भी इसे जायज ठहराया.

इसका फैसला कौन करेगा कि लिचिंग के किस मामले को समाज में सराहा जाएगा और किस मामले पर हंगामा होगा. ये संभव है कि जिस तरह से वकीलों ने महिला कोर्ट में बच्ची से रेप के आरोपियों की धुलाई कि उससे कई लोगों को खुशी हुई होगी. अगर ये सही है तो फिर पशु व्यापारियों पर भीड़ के हमले नाजायज कैसे हैं. ऐसे में एक ही चीज के लिए दो अलग अलग पैमाना कैसे हो सकता है. केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा कैटल ट्रेडर्स को मारने वालों को सम्मानित करते हैं तो उसकी आलोचना होती है लेकिन वकील जब कानून हाथ में लेकर आरोपियों की पिटाई करते हैं तो सिविल सोसायटी इसकी सराहना करती है.

भीड़तंत्र ने ले ली सॉफ्टवेयर इंजीनियर की जान

बीदर के उन गांववालों से बात करें तो आपको पता चलेगा कि वो लोग इस बात से पूरी तरह से सहमत थे कि बच्चा चोरों का एक गिरोह एक लाल कार से भागने कि कोशिश कर रहा है और उनके पास हथियार भी है. वॉट्सऐप और फोन कॉल्स ने इस अफवाह को लोगों तक पहुंचाने का काम किया था और इस अफवाह की कीमत हैदराबाद के निर्दोष युवा सॉफ्टवेयर इंजीनियर को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी. भीड़ ने उन्हें पीट-पीटकर मार डाला.

भारत में तकनीक के गलत इस्तेमाल ने इसे उस काल में पहुंचा दिया है जहां पर दुश्मनों को मिलकर मौत के घाट उतार दिया जाता था. भारत में डेमोक्रेसी, जिसमें हरेक नागरिक को समर्थ बनाने का लक्ष्य होना चाहिए था अब मोबोक्रेसी यानि भीड़तंत्र में तब्दील हो रहा है जिसमें शामिल हर व्यक्ति को खुद के साहसी होने का यकीन होता है.

चेन्नई में बच्ची के साथ रेप करना भी भीड़तंत्र का ही काम था. उन 17 शैतानों को शायद इस बात के एहसास ने लागातार दुष्कर्म करने की हिम्मत दे थी कि वो इस नारकीय काम को करने वाले अकेले नहीं थे. पिछले 4 महीने में देश में लिचिंग की 31 घटनाएं घटी. इन घटनाओं को अंजाम देने वाली भीड़ को लगता था कि जो वो कर रहे हैं वो सही है. भीड़ में शामिल शख्स को लगता था कि भीड़ की वजह से वो पकड़ा नहीं जाएगा.

भारत के मुख्य न्यायाधीश को इस पर चिंतित होना चाहिए कि अब लोगों को अदालतों की जगह सड़कों पर ही न्याय मिलने लगा है. मैं इस बात को लेकर निश्चित नहीं हूं कि लिचिंग को रोकने के लिए बनने वाले नए कानून से इस तरह की घटनाओं पर विराम लग सकेगा क्योंकि कानून तो नाबालिग बच्चियों से दुराचार करने पर भी बना हुआ है, देश में इसके लिए पॉक्सो एक्ट है, लेकिन क्या इस कानून का डर उन 17 शैतानों को था जिन्होंने जनवरी से लेकर जुलाई तक मासूम के साथ बार-बार ज्यादती की.

नए कानून बनाए के बजाए देश को इस बात पर चिंतित होना चाहिए क्या हम समाज में इस बात की अनुमति देने को तैयार हैं कि लोगों को कानून अपने हाथ में लेना चाहिए? उन्हें मारने पीटने यहां तक कत्ल कर देने का भी नैतिक अधिकार होना चाहिए? देश में न्यायिक प्रकिया धीमी जरूर है लेकिन त्वरित न्याय इसका विकल्प कभी नहीं हो सकता. पुलिस व्यवस्था और न्यायिक व्यवस्था के लिए ये इम्तिहान की घड़ी है क्योंकि भीड़ अब हमारे दरवाजे तक आ पहुंची है.

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