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बिना पकाए ही खाया जा सकता है असम का ये चावल

बोका साल को मुख्यत: निचले असम के हिस्सों में उगाया जाता है. जैसे- नलबारी, बारपेटा, गोलपारा, कामरूप, धरांग, धुबरी, चिरांग, बोंगाईगांव, कोकराझार, बक्का इत्यादि.

FP Staff Updated On: Aug 09, 2018 08:51 PM IST

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बिना पकाए ही खाया जा सकता है असम का ये चावल

निचले असम के कुछ हिस्सों में, खासतौर पर 'ज़ाली' मौसम (धान की खेती का सबसे व्यस्त मौसम जो जून में शुरू होता है और दिसंबर में खत्म होता है) के दौरान, यहां का लगभग हर किसान एक विशिष्ट प्रकार का स्वदेशी चावल पर जोर देता है. इसे बोका साल, या 'मिट्टी चावल' कहते हैं. जो लोग इस विशेष किस्म के "नरम" चावल के बारे में जानते हैं, उन्हें इसकी खासियत का पता है. और जो लोग नहीं जानते उन्हें ये बता दें कि इस चावल को हाल ही में बौद्धिक संपदा भारत (आईपीआई) द्वारा भौगोलिक संकेत (जीआई) टैग मिला है.

बोका साल को मुख्यत: निचले असम के हिस्सों में उगाया जाता है. जैसे- नलबारी, बारपेटा, गोलपारा, कामरूप, धरांग, धुबरी, चिरांग, बोंगाईगांव, कोकराझार, बक्का इत्यादि. 17 वीं शताब्दी में, यह चावल मुगलों से लड़ने वाली असम की सेना के लिए ईंधन का काम करता था. आज यह खेतों में अपना खुन पसीना बहाने वाले सैकड़ों किसानों के लिए ईंधन है और उनका मुख्य खाद्य पदार्थ है.

2016 में इस चावल के पेटेंट के लिए आवेदन करने वाले दो संगठनों में से एक लोटस प्रोगरेसिव सेंटर के संस्थापक हेमंत बैश्य कहते हैं- हालांकि अभी भी शहरी जनसंख्या इससे अछूती है. 'लेकिन उन्हें इसे जरुर आजमाना चाहिए. बोका साल को ईंधन की कोई आवश्यकता नहीं होती है. इस चावल को पकाए जाने की जरूरत नहीं है!' बैश्य आगे बताते हैं,' चावल को एक घंटे तक पानी में भिगो दें, और यह पके हुए चावल की तरह ही नर्म हो जाएगा. इसे दही, गुड़ और केला के साथ मिलाएं, और यह खाने के लिए तैयार है. और पूरे दिन के लिए आपका पेट भर जाएगा.' बैश्य बताते हैं कि अच्छी क्वालिटी का बोका साल ठीक पंद्रह मिनट में ही पानी में भिंगों कर रखने पर खाने के लिए तैयार हो जाता है.

चावल संरक्षण और अनुसंधान के लिए 2014 से प्रयासरत हैं-

नलबरी स्थित बैश्य के लोटस प्रोग्रेसिव सेंटर की स्थापना 1999 में हुई थी. यह एक स्वयंसेवी संस्था है जो विशेष रूप से स्वदेशी चावल की किस्मों के संरक्षण के लिए काम करती है. बैश्य की ये संस्था 2014 से ही सिमांत कलिता सेंटर फॉर एनवायरनमेंटल एजुकेशन (सीईई), गुवाहाटी के साथ मिलकर अनुसंधान कर रही है और चावल के लिए जीआई टैग प्राप्त करने के लिए वैज्ञानिक परीक्षण कर रही है.

एक तरफ जहां "शून्य-ईंधन आवश्यकता" दर अपने आप में अद्वितीय मात्रा है. बोका साल को आमतौर पर जून में बोया जाता है और दिसंबर में काटा जाता है. यह अत्यधिक पौष्टिक है. गुवाहाटी विश्वविद्यालय के जैव प्रौद्योगिकी विभाग के एक अध्ययन के मुताबिक इसमें 10.73 प्रतिशत फाइबर सामग्री और 6.8 प्रतिशत प्रोटीन है.

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