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आर्टिकल 35-ए के विरोध ने राज्य को एकसूत्र में बांधा

कश्मीर घाटी की भावना केंद्र सरकार के खिलाफ दशकों से रही है और निकट भविष्य में भी इसके बदलाव की संभावना नहीं दिख रही, भले ही धारा 35-ए रहे या उसे निरस्त कर दिया जाए

Updated On: Aug 06, 2018 09:56 PM IST

Fahad Shah

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आर्टिकल 35-ए के विरोध ने राज्य को एकसूत्र में बांधा

जम्मू-कश्मीर राज्य को आज के समय में बहुत सी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है ऐसा ही एक मामला है धारा 35-ए का, जिसको लेकर जम्मू कश्मीर समेत पूरे देश में बहुत बड़ी बहस चल रही है. इसी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को सुनवाई होनी थी जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 27 अगस्त से शुरु होने वाले सप्ताह तक के लिए टाल दिया है. पीठ के तीन जजों में से एक डी वाय चंद्रचूड़ के उपस्थित नहीं होने की वजह से संविधान के इस महत्वपूर्ण प्रावधान पर सुनवाई टाली गई है.

जम्मू कश्मीर को विशेष शक्तियां दिए जाने वाले संविधान के आर्टिकल 35-ए की सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई को लेकर घाटी के लोगों में भी काफी दिलचस्पी है. चाहे वो वहां के सामान्य नागरिक हों, मुख्यधारा के राजनीतिज्ञ हों या आजादी की मांग कर रहे अलगाववादी, सभी को संविधान के इस विशेष प्रावधान की चिंता है. आर्टिकल 35-ए से किसी तरह के छेड़छाड़ की संभावना के विरुद्ध ये सभी लोग एक मंच पर एकजुट हो चुके हैं. ये आर्टिकल वहां के ‘स्थाई निवासियों’ को परिभाषित करती है.

आर्टिकल 35-ए को आर्टिकल 370 के तहत भारतीय संविधान में 1954 में शामिल किया गया. इससे पहले इस संबंध में 1950 में राष्ट्रपति ने आदेश जारी किया था. इस आर्टिकल के मुताबिक राज्य के स्थाई निवासियों को विशेष अधिकार दिए गए हैं और इस अधिकार के बिना राज्य अपने विशेष दर्जे वाली हैसियत को खो देगा. हालांकि मुख्य धारा के राजनीतिज्ञ इस बात से इनकार करते हुए कह रहे हैं कि वो इस बात का विशेष ख्याल रखेंगे कि ऐसा होने ना पाए. लेकिन आजादी की मांग करने वाले अलगाववादी नेताओं के लिए संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना एक बड़ा मुद्दा बन गया है. इसके साथ ही पूरे राज्य में इसको खत्म करने या छेड़छाड़ करने की संभावना को देखते हुए विरोध प्रदर्शन शुरु हो गया है. राज्य के व्यवसायी,राज्य सरकार के कर्मचारी,सिविल सोसायटी ग्रुप्स और वकीलों ने इसके विरोध में हड़ताल पर चले जाने की चेतावनी दी है.

अगर इस एक्ट को निरस्त कर दिया गया तो इसका जबरदस्त प्रभाव राज्य की मुख्य धारा की राजनीति पर पड़ेगा. हालांकि इससे आजादी की मांग करने वालों की राजनीति में कोई ज्यादा बदलाव तो नहीं आएगा लेकिन संभव है कि उनकी राजनीति इसके बाद और तेज हो जाए और वो अपनी इस बात को लोगों की नजर में ये कहते हुए साबित करने की कोशिश करें कि इस मामले में भी केंद्र सरकार ने पहले की ही तरह अलोकतांत्रिक रवैया अपनाया है. इस तरह के घटनाक्रम से न केवल घाटी में भारत विरोधी भावनाएं भड़केंगी बल्कि ये काफी हिंसक और खतरनाक भी हो सकती हैं. ये मुद्दा इस क्षेत्र को फिर से अस्थिर करने लगेगा जिससे न केवल इस राज्य को भारी आर्थिक नुकसान होगा बल्कि इसमें कई लोगों की जान भी जा सकती है.

राज्य के मुख्य क्षेत्रीय दलों के लिए झटका

राज्य के मुख्य राजनीतिक दल पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी और नेशनल कांफ्रेंस हमेशा से राज्य में इसी बात की राजनीति करते आए हैं कि उन्होंने ही संविधान द्वारा प्रदत्त राज्य के विशेष दर्जे के अधिकार को संभाल कर रखा हुआ है और वो ही समय-समय पर उसकी रक्षा भी करते रहे हैं. पीडीपी का तो यहां तक दावा था कि उन्होंने बीजेपी के साथ गठबंधन ही केवल इसलिए किया था कि उनका ये अधिकार सुरक्षित रह सके क्योंकि राज्य के लोगों, खास करके घाटी के लोगों की भावनाएं तो यहां के क्षेत्रीय दल ही समझ सकते हैं.

शुक्रवार को पीडीपी अध्यक्ष और राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने कहा कि राज्य के विशेष दर्जे के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ की गई तो इसका भयंकर परिणाम पूरे देश को भुगतना पड़ेगा. महबूबा ने कहा कि 'मेरे पिताजी को धारा 370 के अंतर्गत जम्मू कश्मीर को मिले विशेष अधिकारों पर गर्व था. वो हमेशा कहते थे कि हालांकि हमारे राज्य के लोगों ने बड़े-बड़े लक्ष्यों को पूरा करने के लिए काफी कुर्बानियां दी हैं लेकिन जरुरत है कि,जो हम लोगों के पास पहले से है उसकी रक्षा की जाए.'

फोटो रॉयटर से

फोटो रॉयटर से

राज्य के मुख्य राजनीतिक दलों की सोच लगभग ऐसी ही है. नेशनल कांफ्रेंस के लिए तो राज्य का विशेष अधिकार उसके द्वारा प्रस्तावित ‘स्वायत्त जम्मू कश्मीर’ का आधार है. हालांकि एनसी के ‘स्वायत्त जम्मू कश्मीर’ वाले आइडिया को कभी स्वीकार नहीं किया गया. बिना विशेष दर्जे के राज्य के पास संविधान के द्वारा मामूली सी भी स्वायत्ता नहीं बचेगी ऐसे में राज्य के मुख्य क्षेत्रीय दलों के पास बचाने के लिए कुछ रहेगा ही नहीं. उनके लिए तो राज्य में पहचान का संकट खड़ा हो जाएगा. अगर ये आर्टिकल खत्म हो गया तो पीडीपी और एनसी दोनों के लिए राज्य में करने के लिए कुछ बचेगा ही नहीं. लेकिन आजादी की मांग करने वाले अलगाववादी नेताओं के लिए ये कदम फायदे वाला हो जाएगा जिसमें वो अपने भारत विरोधी रवैए को जायज साबित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ेंगे.

जम्मू और लद्दाख पर प्रभाव

जम्मू कश्मीर राज्य को तीन क्षेत्रों में बांटा गया है- कश्मीर,जम्मू और लद्दाख. धारा 35-ए में किसी भी तरह के बदलाव का प्रभाव जम्मू और लद्दाख क्षेत्र पर भी काफी पड़ेगा. कश्मीर में प्रदर्शन और अनिश्चय की स्थिति तो काफी समय से रही है और निकट भविष्य में तो ये थमती भी नजर नहीं आ रही है. ऐसे में जो भी कोई इस धारा को समाप्त करने की वकालत कर रहा है उसकी नजर कश्मीर घाटी पर न होकर जम्मू और लद्दाख पर है, जहां पर उनके लिए संभावनाएं ज्यादा हैं. लेकिन इसी संदर्भ को देखते हुए शुक्रवार को जम्मू क्षेत्र के 300 से ज्यादा वकीलों ने एक स्वर में एक प्रस्ताव पास किया जिसमें आर्टिकल 35-ए को मजबूती से बनाए रखने पर सहमति प्रदान की गई. इस बैठक में एडवोकेट केके पंगोत्रा ने अपनी बात रखते हुए कहा कि आर्टिकल को हटाए जाने से केवल जम्मू के लोग प्रभावित होंगे क्योंकि देश के अन्य भागों से लोग कश्मीर में तो बसने जाएंगे नहीं ऐसे में सबसे ज्यादा दबाव जम्मू पर ही पड़ेगा.

इस आर्टिकल पर बहस से जम्मू के लोग भी काफी चिंतित है क्योंकि उन्हें लगता है कि सबसे ज्यादा लोग उनके क्षेत्र में ही रहने चले आएंगे. ऐसे में आर्टिकल 35-ए की समाप्ति के डर ने पूरे राज्य को एक डोर में बांध दिया है. ये केवल घाटी वालों और आजादी के समर्थक अलगाववादियों के लिए विरोध का मुद्दा नहीं रह गया है बल्कि अब इसके विरोध में राज्य के अलग-अलग विचारधारा,जाति,धर्म और क्षेत्र के लोग भी एकजुट हो गए हैं.

LADAKHI

लद्दाख क्षेत्र के लोगों की अपनी समस्या है. लद्दाख एक प्रमुख टूरिस्ट प्लेस है जहां पर देश के अलावा विदेशी टूरिस्ट भी हर साल हजारों की संख्या में आते हैं. ऐसे में आर्टिकल 35-ए में छेड़छाड़ के बाद कोई भी व्यक्ति वहां पर पहुंच कर अपना कामकाज स्थापित कर लेगा ऐसे में उनके पास रोजगार का संकट उत्पन्न हो जाएगा और उनकी रोजी-रोटी पर आफत आ सकती है. ऐसे में उस पहाड़ी क्षेत्र में अशांति की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है.

कश्मीर घाटी की भावना केंद्र सरकार के खिलाफ दशकों से रही है और निकट भविष्य में भी इसके बदलाव की संभावना नहीं दिख रही, भले ही धारा 35-ए रहे या उसे निरस्त कर दिया जाए. बदलाव केवल इतना होगा कि आर्टिकल के समाप्त होने के बाद राज्य में इतना खून खराबा होगा जितना शायद 2016 के विरोधों में भी नहीं हुआ था. जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है कि, राज्य की पुलिस जिनके ऊपर राज्य में विधि व्यवस्था संभालने की जिम्मेदारी है वो भी इस आर्टिकल को हटाए जाने के विरोध में विद्रोह कर सकती है. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट में इस मामले का फैसला,जम्मू कश्मीर के लोगों के भविष्य के लिए, वहां की मुख्यधारा की राजनीति के लिए. अलगाववादी नेतृत्व के लिए, और राज्य के विधानमंडल के भारत से संबंधों को लेकर महत्वपूर्ण साबित हो सकता है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और द कश्मीर वाला के संपादक हैं)

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