S M L

गणतंत्र दिवस: इस शख्स को सुनने के लिए इंदिरा गांधी ने संसद रुकवा दी

जसदेव सिंह की कमेंट्री इतनी दिलचस्प होती थी कि कई बार लोग टीवी की आवाज़ बंद करके रेडियो पर उनकी आवाज़ के साथ मैच देखना पसंद करते थे

Updated On: Jan 26, 2018 12:06 PM IST

FP Staff

0
गणतंत्र दिवस: इस शख्स को सुनने के लिए इंदिरा गांधी ने संसद रुकवा दी

कई भारतीय घरों में गणतंत्र दिवस का मतलब है सुबह जल्दी उठना, नहा धोकर, टीवी सेट के सामने बैठ जाना. नाश्ते में जलेबी या कुछ मीठा हो तो और भी अच्छा. यह सब इसलिए ताकि सुकून से राजधानी दिल्ली में होने वाली गणतंत्र दिवस परेड को देखा जा सके. राजपथ पर देश भर से आने वाली रंग बिरंगी झांकियां, उसमें नाचते-गाते दस्ते, सेना का शक्ति प्रदर्शन. राष्ट्रपति भवन से लेकर इंडिया गेट तक का माहौल देखते ही बनता है. ऐसे में एक शख्स को याद करना लाज़िमी हो जाता है जिनकी आवाज़ 45 से भी ज्यादा गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस की गवाह बनी हैं. पद्मश्री और पद्मभूषण जसदेव सिंह, जिनकी कमेंट्री से गणतंत्र दिवस समारोह का आगाज़ होता था.

‘राजपथ से मैं जसदेव सिंह बोल रहा हूं’ – इस लाइन के साथ शुरू होता थी जसदेव सिंह की कमेंट्री जो सिर्फ झांकियों और वीआईपी मेहमानों के बखान तक ही नहीं सीमित रहती थी. जसदेव में हुनर था कि वह राजपथ पर खड़े एक मूंगफली बेचने वाले शख्स से लेकर फूल पत्ती तक हर चीज़ का वर्णन कर देते थे. कुछ इस तरह की टीवी देख रहे शख्स को लगने लगता कि वह वहीं राजपथ पर बैठा है और सब कुछ अपनी आंखों से देख रहा है.

jas

न्यूज़ 18 हिन्दी से एक ख़ास बातचीत में जसदेव सिंह ने अपने उन पुराने दिनों को याद करने की कोशिश की. कोशिश इसलिए क्योंकि जसदेव सिंह अब 86 साल के हो गए हैं और अलज़ाइमर (भूलने की बीमारी) से पीड़ित हैं.

जसदेव सिंह ने कहा ‘मैं कुछ लिखता नहीं था, बस दस्तों की जानकारी डिफेंस वाले दे देते थे, बाकी सब ज़बानी बोलता था. मैं तो राजपथ के आसपास लटक रहे कोरियप्सिस (पीले फूल) की भी बात कर देता था. फिर इंडिया गेट की तरफ उड़ रहे पत्ते को देखकर कह देता था कि शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए यह पत्ता उड़कर जा रहा है.’

अपनी कमेंट्री को इस तरह दिलचस्प बनाने के हुनर ने ही जसदेव सिंह को सबका चेहता बना दिया था. जसदेव सिंह के बेटे गुरदेव सिंह, खुद कमेंट्री की दुनिया का जाना माना नाम हैं. गुरदेव बताते हैं कि हर 26 जनवरी और 15 अगस्त से एक दिन पहले उनके पिता अपने शायर दोस्तों को फोन करते थे. गुरदेव कहते हैं ‘पापा अपने काम को लेकर बहुत मेहनत करते थे. हर साल वह अपने शायर दोस्तों से कहते थे कि इस खास दिन के लिए वह कोई कविता या शेर लिखकर उन्हें दें. उन लाइनों का पापा अपनी कमेंट्री में इस्तेमाल करते थे.’

घर के ड्रॉइंग रूम में लगे सम्मान और पुरस्कारों के बीच ऐसी तस्वीरें भी हैं जो जसदेव के सफर की कहानी बयां करती हैं. फिर वह राजीव गांधी के साथ प्लेट को लेकर ‘पहले आप पहले आप’ की तस्वीर हो या फिर इंदिरा गांधी से जसदेव सिंह की पहली मुलाकात का फोटो.

rajiv.jpg01

जसदेव सिंह खेलों की कमेंट्री के लिए भी लोकप्रिय थे. गुरदेव बताते हैं कि किस तरह 1975 हॉकी विश्व कप के बाद जब इंदिरा गांधी को जसदेव सिंह से मिलवाया गया तो उनकी प्रतिक्रिया थी – ‘अरे आपने तो दिल की धड़कने ही बढ़ा दी थी. हमने तो संसद को रुकवा दिया, आप इतना फास्ट कैसे बोल लेते हैं.’

जसदेव सिंह ने 9 ओलंपिक खेलों में अपनी आवाज़ दी है और उन्हें ओलंपिक मूवमेंट के सबसे बड़े सम्मान ओलंपिक ऑर्डर से भी नवाज़ा जा चुका है. कहते हैं कि जसदेव सिंह की क्रिकेट और हॉकी की कमेंट्री इतनी दिलचस्प होती थी कि कई बार लोग टीवी की आवाज़ बंद करके रेडियो पर उनकी आवाज़ के साथ मैच देखना पसंद करते थे. रोचक बात यह भी है कि जसदेव सिंह ने कभी कोई खेल नहीं खेला, क्रिकेट तो बिल्कुल भी नहीं.

जसदेव सिंह के बेटे गुरदेव सिंह कहते हैं ‘पापा ने कभी यह बात छुपाई नहीं कि उन्हें क्रिकेट खेलना नहीं आता. वह बिना किसी संकोच के खिलाड़ी के पास चले जाते थे, कभी बिशन के पास, तो कभी मदन लाल के पास यह पूछने के लिए कि मुझे बता यह चायना मैन और गुगली में फर्क क्या होता है.’

001

अपनी कांपती आवाज़ में पुराने दिनों को याद करते हुए जसदेव ने बताया कि कॉलेज के दिनों में जब उन्होंने महात्मा गांधी के निधन और फिर उनके अंतिम संस्कार का पूरा ब्यौरा ऑल इंडिया रेडियो पर उद्घोषक डि मेलो की आवाज़ में सुना, तभी उन्होंने कमेंटेटर बनने का फैसला किया. उसके बाद अपने गुरू डि मेलो के साथ जसदेव सिंह की आवाज़ भी कई ऐतिहासिक पलों की गवाह बनी. फिर 1975 का हॉकी वर्ल्ड कप हो या फिर राकेश शर्मा का स्पेस पर जाना.

इस बातचीत के दौरान जसदेव को उनकी पुरानी यादों से रूबरू करवाती उनकी पत्नी कृष्णा जसदेव कहती हैं ‘1982 एशियाई खेलों में जब इनकी आवाज़ गूंजी तो पहली बार मुझे गर्व हुआ कि स्टेडियम में जो आवाज़ गूंज रही हैं वह जसदेव सिंह की है और मेरे रोंगटे खड़े हो गए.’

कृष्णा मानती हैं कि पहले और अब के गणतंत्र दिवस समारोह में बहुत फर्क आ गया है. पहले जहां लोग खाना बनाकर पिकनिक मनाने के लिए 26 जनवरी के दिन राजपथ पर पहुंच जाते थे, वहीं आज के वक्त में दो चार दिन पहले ही नाकेबंदी हो जाती है. हालांकि कृष्णा बताती हैं कि आज भी परेड के दिन लोगों के फोन आते हैं जो कहते हैं कि वह जसदेव सिंह की कमेंट्री को मिस करते हैं.

( साभार: न्यूज18 के लिए कल्पना शर्मा की रिपोर्ट)

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
Jab We Sat: ग्राउंड '0' से Rahul Kanwar की रिपोर्ट

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi