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'देश एक राग है' कविता ने देश और राष्ट्र में बताया अंतर, देखें वीडियो

देश एक राग है कविता में में राष्ट्र और देश के बीच के अंतर को स्पष्ट किया गया है, बताया गया है कि किस तरह से एक देश तो राष्ट्र बन जाता है पर क्या राष्ट्र कभी देश बन पाता है

Updated On: Jan 26, 2019 02:19 PM IST

FP Staff

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'देश एक राग है' कविता ने देश और राष्ट्र में बताया अंतर, देखें वीडियो

गणतंत्र दिवस 2019 पर इस बार, लगभग 12-13 वर्ष पहले लिखी जन कवि भगवत रावत (1939-2012) की कविता 'देश एक राग है' प्रस्तुत है. इस कविता में 'नेशन स्टेट' की अवधारणा को लेकर उनकी अपनी बहस शामिल है. यह कविता गणतंत्र दिवस के मौके पर देश के नागरिकों को संबोधित की गई है. यह कविता हमारी देशभक्ति, नव उपनिवेशवादी धारणा और नव-साम्राज्यवादी प्रवृत्ति की अवधारणाओं की जांच करती है.

ऐसे समय में जब मुख्यधारा का भारतीय मीडिया देशभक्ति के जिंगोस्टिक (jingoistic) और सरलीकृत अभ्यावेदन के हमले से संतृप्त है, उस समय देश एक राग है, लोकप्रिय कथा को तोड़ने का प्रयास करता है और चर्चा करता है जो देश की वर्तमान राजनीतिक और सांस्कृतिक स्थिति के लिए अत्यंत प्रासंगिक है. इसे तीन कलाकारों द्वारा प्रस्तुत किया गया है - रत्ना पाठक शाह, तिग्मांशु धूलिया और रसिका दुग्गल. देश एक राग है कविता में में राष्ट्र और देश के बीच के अंतर को स्पष्ट किया गया है. बताया गया है कि किस तरह से एक देश तो राष्ट्र बन जाता है पर क्या राष्ट्र कभी देश बन पाता है.

तीनों कलाकार कविता पाठ करते हुए लोगों को समझाते हैं कि गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रा दिवस के पूर्व संध्या को राष्ट्रपति जब राष्ट्र को संबंधोति करते हैं तो वह देश क्यों नहीं बोलते. अचानक ही भारत देश से राष्ट्र में कैसे तब्दील हो जाता है. संबोधन के शुरुआत में देशवासियों बोलने वाले कैसे राष्ट्र की बातें करने लगता हैं.

क्या देश को कभी राष्ट्र में तब्दील किया जा सकता है. क्या देश की परंपरा, संस्कृति, भाषा, वेशभूषा को बदला जा सकता है. तीनों कलाकरों रत्ना पाठक शाह, तिग्मांशु धूलिया और रसिका दुग्गल ने कविता को बड़े ही शानदार तरीके से पेश किया है. वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक करें-

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