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क्या अरबों-खरबों की संपत्ति वाले मंदिरों में सरकार का दखल होना चाहिए?

भारत के जनप्रतिनिधियों के सामूहिक फैसले ने ही पिछले दरवाजे से हिंदू मंदिरों के ट्रस्ट का राष्ट्रीयकरण किया है. यहां आध्यात्मिकता नहीं दिखती.

RN Bhaskar RN Bhaskar Updated On: Sep 19, 2017 09:15 AM IST

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क्या अरबों-खरबों की संपत्ति वाले मंदिरों में सरकार का दखल होना चाहिए?

क्या सरकार को धर्म का प्रबंधन करना चाहिए? भारत या विदेश मे भी किसी आम आदमी से यह सवाल पूछें तो स्पष्ट रूप से यह आम सहमति मिलेगी- ‘नहीं’.

लेकिन भारत के ज्यादातर जनप्रतिनिधि इस विषय पर एकजुट नजर आते हैं. उनके सामूहिक फैसले ने ही पिछले दरवाजे से हिंदू मंदिरों के ट्रस्ट का राष्ट्रीयकरण किया है. यहां आध्यात्मिकता नहीं दिखती. यह सत्ता और धन पर नियंत्रण की इच्छा को दर्शाता है. जिस रीजनल चैरिटेबल एंड एन्डॉमेंट (एचआर एंड सीई) की बहुत आलोचना की गई थी, उसी के प्रावधानों का इस्तेमाल करते हुए सरकार ने सीधे या राज्य सरकारों के माध्यम से मंदिर ट्रस्टों का प्रशासन सरकार की ओर से नियुक्त प्रशासक को सौंप दिया.

सुप्रीम कोर्ट ने दिया समाधान 

आखिरकार सुप्रीम कोर्ट को यह कहना पड़ा कि मंदिर मामलों का प्रबंधन करना सरकार का काम नहीं है.

यह संभव इसलिए हो पाया क्योंकि चिदंबरम (नटराज) ग्रुप के ट्रस्टियों ने चिदंबरम मंदिर ट्रस्ट की याचिका का मजबूती से समर्थन किया. इस याचिका में तमिलनाडु सरकार द्वारा अधिग्रहण की कोशिश का विरोध किया गया.

6 जनवरी 2014 को सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ ने तमिलनाडु सरकार को आदेश दिया कि वे चिदम्बरम ट्रस्ट के अधिग्रहण की किसी भी कोशिश को रोक दें.

सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि संविधान के अनुच्छेद 26 के तहत कुछ मौलिक अधिकार नागरिकों को दिए गए हैं जिन्हें न हटाए जा सकते हैं, न उसमें कटौती की जा सकती है. अदालत ने यह व्यवस्था तमिलनाडु सरकार के खिलाफ मामले की सुनवाई करते हुए दी, जो चिदंबरम (नटराज) मंदिर के प्रबंधन अपने हाथ में लेना चाहती थी.

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सरकारों ने उठाया फायदा मंदिरों के पैसों का 

यह आदेश बहुत ही महत्वपूर्ण है. यह दूसरे मंदिरों के मामलों को भी दोबारा खोल सकता है. अगर समान महत्ववाले उस फैसले से इसकी तुलना करें कि निजता का अधिकार मौलिक है तो 2014 में दिए गए उक्त फैसले की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है. आखिरकार आजादी के बाद से राज्य सरकारों ने केंद्र से मिलकर उस ताकत और धन का फायदा उठाया, जिस पर अधिकार मंदिर ट्रस्ट का होना चाहिए था.

सर्वोच्च अदालत ने बहुत साफ कहा- 'अगर मंदिर का प्रबंधन किसी बुराई को दूर करने के लिए हाथ में लिया गया हो, तब भी बुराई दूर होने के तुरंत बाद प्रबंधन संबंधित लोगों को सौंप दिया जाना चाहिए था. उसके बाद भी इसके जारी रहने का मतलब पीड़ित के लिए संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों को हड़पने या उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने जैसा था. इसलिए इन परिस्थितियों में प्रबंधन को अपने हाथों में निश्चित रूप से सीमित समय के लिए लेना चाहिए था. प्रशासनिक अधिकारों का उत्तराधिकार स्थाई प्रकृति का नहीं हो सकता.'

अदालत ने व्यवस्था दी कि मंदिर (और मंदिर की ओर से जमा किया गया कोष या संपत्ति) मंदिर से जुड़े अनुयायियों का होता है. ऐसा तब भी होता है जब अनुयायियों की संख्या बहुत थोड़ी हो. अदालत ने कहा कि मंदिर ट्रस्ट का प्रशासन हमेशा के लिए हाथ में नहीं लिया जा सकता. अगर कुछ गलत होता है, तो अदालत निश्चित रूप से चीजें ठीक करती है लेकिन उसे हमेशा के लिए मंदिर का प्रबंधन अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं है.

राज्य ने माना आदेश

सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के तुरंत बाद तमिलनाडु सरकार के पास इसे मानने के सिवा कोई विकल्प नहीं था. उसने एक आदेश जारी किया.

इसमें कहा गया, सरकार ने सावधानी से विचार और परीक्षण करने के बाद इसका पालन करने का निर्णय लिया है और उस हिसाब से आदेश दिए हैं:

-कार्यकारी अधिकारी को उनके द्वारा नियुक्त ‘हुन्डियाल’ हटाने होंगे और जो भी रकम जमा की गई है उसे पोधु दीक्षाथरों (समर्थी ब्राह्मणों) को लौटाना होगा.

-प्रसादम स्टॉलों को खाली करना होगा. चूंकि 30 जून 2014 की मियाद खत्म हो चुकी है इसलिए उस अवधि की धनराशि नहीं लौटाई जाएगी, जिसकी समय सीमा बाकी है.

-बैंक में रखी सारी रकम तब से लेकर अब तक ब्याज समेत पोधु दीक्षाथरों के सुपुर्द की जाएगी.

-कार्यकारी अधिकारी के हाथों आमदनी और खर्च का मिलान किया जाएगा और जरूरी खाते तैयार किए जाएंगे.

वास्तव में एचआर एंड सीई एक्ट का बदतर उदाहरण तमिलनाडु में देखा जा सकता है. टीआर रमेश जैसे लोगों के प्रयासों का आभार जताया जाना चाहिए जिनकी वजह से इनमें से ज्यादातर प्रकाश में आ चुके हैं. वे बैंक से जुड़े पेशेवर हैं और हिंदू धार्मिक संस्थानों से जुड़े कानून के रिसर्च स्कॉलर हैं. वे चेन्नई में टेम्पल वॉरशिपर सोसायटी के अध्यक्ष भी हैं.

सरकार ने हर साल 6 हजार करोड़ का नुकसान मंदिरों को पहुंचाया 

रमेश बताते हैं कि किस तरह से सरकार ने हर साल कम से कम 6 हजार करोड़ रुपए का नुकसान राज्य में मंदिरों को पहुंचाया.

अगर उन सारे मंदिरों का लेखा जोखा लिया जाए, जिनका ‘राष्ट्रीयकरण’ किया गया तो सालाना जमा हुई राशि का दस गुणा‘गायब कर’ दिया गया.

चिदंबरम फैसले ने ऐसी ही याचिकाओं को नया जीवन दिया है जो दूसरे मंदिर ट्रस्ट ने दायर कर रखे हैं. उदाहरण के लिए 2012 में पूज्य स्वामी दयानन्द सरस्वती और हिंदू धर्म आचार्य सभा के दो अन्य आचार्यों की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई लिखित याचिका है. इस याचिका में आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडु और पांडिचेरी के हिन्दू धर्म और धार्मिक संस्थान कानून के ज्यादातर प्रावधानों को असंवैधानिक बताते हुए चुनौती दी गई है.

इस पर अंतिम सुनवाई जुलाई 2016 में सुनिश्चित थी, लेकिन मामले को आगे सुनवाई के लिए टाल दिया गया. जैसा कि रमेश कहते हैं कि इस याचिका में कई ऐसे लोग हैं जो प्रभावित हैं या जिनकी दिलचस्पी है. हिंदुओं के लिए यह बहुत सही समय है जब वे इस मामले पर अपने मौलिक धार्मिक अधिकारों की रक्षा के लिए सर्वोच्च न्यायालय में जाएं और कानून सम्मत चिदम्बरम मंदिर फैसले के तहत स्पष्ट आदेश हासिल करें.'

यह अब बस समय की ही बात है जब व्यक्तिगत स्तर पर लोग इस मामले को मुम्बई हाईकोर्ट तक ले जाएंगे और सिद्धि विनायक और शिरडी मंदिर ट्रस्टों को राजनीतिज्ञ और उनके प्रशासकों से ‘आजाद’ कराएंगे. सुप्रीम कोर्ट का आदेश बहुत स्पष्ट है कि मंदिरों और उनके ट्रस्ट का स्थाई रूप से अधिग्रहण नहीं किया जा सकता. अगर कोई समस्या है, तो इसका अस्थायी रूप से दायित्व लिया जा सकता है, जिसके खत्म होने की तारीख तय होगी और उस मुद्दे को हल करने का मकसद भी निश्चित होगा. अस्पष्ट, अनिश्चित समय तक और शाश्वत तरीके से इन मंदिरों, धार्मिक ट्रस्ट और यहां तक कि धर्म का अधिग्रहण नहीं हो सकता.

और क्या है प्रार्थना, हिन्दूवाद?

वास्तव में हिंदूवाद की सबसे अर्थपूर्ण परिभाषा भी सुप्रीम कोर्ट से ही आई है जिसमें उसने कहा है: 'हिंदूवाद एक धर्म के रूप में बिना किसी भेदभाव के सभी आस्थाओं को आत्मसात करता है. यह वह धर्म है जिसका कोई एक संस्थापक नहीं है, कोई एक लेख नहीं है और न ही शिक्षा का कोई सेट है. इसका वर्णन सनातन धर्म के रूप में किया गया है अर्थात अनन्त विश्वास, क्योंकि इसे सामूहिक विवेक और सदियों की प्रेरणा से हिंदूवाद ने खड़ा किया है और इससे जुड़े ज्ञान को दुनिया में फैलाया है.'

यह सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति रंजन गोगोई और एनवी रामना के फैसले में दर्ज है. (रिट पेटिशन (सिविल) नंबर 354/2006/16.12.2015) सरकार की इसमें कोई भूमिका नहीं है. 

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पैसों के लिए सरकार किस तरह मंदिरों को धोखा देती है? तरीके जानें

तमिलनाडु की सरकार ने 36,425 मंदिरों, 56 मठ या मठ से जुड़े 47 मंदिरों, 1721 खास खजाने और 189 ट्रस्ट पर नियंत्रण किया. इसने मंदिर की संपत्तियों का दुरुपयोग किया, मंदिर के कोष से राजनीतिक कार्यक्रम किए और राज्य व देश तक में मुख्य धारा के धर्म को शक्तिहीन बना दिया. एक साथ सिर्फ इस एक राज्य में सालाना 6 हजार करोड़ के करीब रकम को कहीं और खर्च कर दिया गया.

नीचे के शब्द टीआर रमेश के नोट से लिए गए हैं जिसे इस यूआरएल में भी देखा जा सकता है.

एक बार अधिग्रहण हो जाने के बाद ऐसे हिंदू संस्थानों को तत्परता से सरकार के विभाग ‘हिंदू धार्मिक कोष’ से जोड़ दिया गया और उस पर स्थाई रूप से सरकार का नियंत्रण हो गया. साधु समेत मंदिर के कर्मचारी की भूमिका दूसरे दर्जे की हो गई और यह मुख्य रूप से राजनीतिक गुंडों और भ्रष्ट व कठोर बाबुओं के हाथों में चला गया.

बात यहीं से शुरू करें कि प्रशासन के एवज में फीस के तौर पर पूरी आमदनी का छठा हिस्सा लेना सरकार ने तय किया. कुल आमदनी का अगला 2/5 हिस्सा कर्मचारियों की तनख्वाह पर खर्च किए जाते. (लेकिन पूजा करने वाले को कोई सैलरी या इस रूप में भत्ता नहीं दिया जाता) इस तरह मंदिर की आमदनी का 56 फीसदी प्रशासकीय खर्चे के तौर पर सीधे चला जाता. पजानी मंदिर जैसे बड़े मंदिरों में मंदिर की आय का दो प्रतिशत से भी कम हिस्सा पूजा और अनुष्ठानों में इस्तेमाल होता.

वोट बैंक की राजनीति के लिए होता मंदिरों का इस्तेमाल 

स्वयंसेवक और मंदिरों के भक्त का पीछा किया जाता ताकि अधिक से अधिक लोग सरकार की ओर से स्टाफ नियुक्त किए जा सकें. ऐसी नियुक्तियां सत्ता में रहने वाली पार्टी और बाबुओं के ‘पूंजीगत फायदे’ के लिए किए जाते.

फिर मंदिरों से फंड का बड़ा हिस्सा कमिश्नर के कॉमन गुड फंड, मुख्यमंत्री के आनंदधाम योजना, विवाह योजना आदि में भेज दिया जाता जिनका संबंधित मंदिरों से कोई लेना देना नहीं होता. यह सब वोट बैंक की राजनीति के लिए किया जाता.

मंदिरों से जुड़े गौशाला और वेद पाठशाला और अगम पाठशाला को व्यवस्थित तरीके से बंद कर दिया जाता. खास निधि से किसी और मकसद के लिए फंड भेज दिया जाता.

सरकार ट्रस्टी और ट्रस्ट बोर्ड के बजाए अपने ‘मनोनुकूल’ बाबुओं को नियुक्त करती और इस तरह मंदिर पूरी तरह से उनके नियंत्रण में आ गए.

सरकारी अधिकारियों का लालच ठेके देने में दिखता जब वे भेदभावपूर्ण तरीके से मंदिरों का ‘पुनरोद्धार’ कराते. प्राचीन ग्रेनाइट फ्लोरिंग की जगह पालिशदार टाइल्स और स्लैब्स लगाए जाते. प्राचीन मंडपों को नष्ट कर दिया जाता. नए मंडप के तौर पर मिलावट वाले सीमेंट इस्तेमाल किए जाते. पत्थरों पर प्राचीन लिखावट उखाड़ दिए गए. ऐसी पेन्टिंग्स जिसका कोई जोड़ नहीं, उन्हें नौसिखिओं से पेन्ट कराया जाता. प्रतीक और मूर्तियों को नुकसान पहुंचाया जाता ताकि उसे बदला जा सके और उन्हें स्मगल किया जा सके.

मंदिर के खर्च का कोई बाहरी ऑडिट नहीं होता. पुनरोद्धार और धार्मिक आयोजनों का कोई ऑडिट नहीं कराया जाता.

मंदिरों के ऑडिट पर जताई गई हैं आपत्तियां 

तमिलनाडु के मंदिरों में ऑडिट पर आपत्तियां 1982 से 2010 तक जमा होती चली गई, जहां कुल 7 लाख 39 हजार आपत्तियां इकट्ठी हो गई. ऐसे अधिकारियों जिनके खिलाफ आपत्तियां हैं उनमें से ज्यादातर को रिटायर हुए लंबा समय बीत चुका है और उनमें से कई की मृत्यु भी हो चुकी है.

हिन्दू मंदिरों और उनकी निधियों समेत उनकी अचल संपत्तियों पर अतिक्रमण और उन्हें मंदिरों से अलग करने का काम व्यवस्थित ढंग से हुआ. 1986 से 2005 के बीच तमिलनाडु के मंदिरों की 47 हजार एकड़ जमीन ‘खो’ गई. तमिलनाडु में हिंदू मंदिरों से जुड़े 1 करोड़ वर्ग फीट की बेशकीमती जगहों पर वर्तमान में अतिक्रमण हो रखा है.

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री का पसंदीदा पूजा स्थल श्रीरंगम रंगनाथस्वामी मंदिर में जितनी रकम इकट्ठी होनी चाहिए उसका महज 0.5 फीसदी ही इकट्ठी हो पाई है. इसका मतलब ये है कि 99.5 फीसदी किराया अब भी वसूला जाना बाकी है.

हिंदू मंदिर और निधि संपत्ति के तमिलनाडु एचआर एंड सीई विभाग का मानना है कि वसूली जानेवाली आमदनी का 2 फीसदी से भी कम वसूल किया गया है. इस वजह से तमिलनाडु के हिन्दुओं को 5 से 6 हज़ार करोड़ वार्षिक का नुकसान हुआ है.

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