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रिलायंस फाउंडेशन के मार्गदर्शन में स्वावलंबी हो रहे किसान

इस फाउंडेशन की सबसे बड़ी खासियत ये है कि यह किसानों की मदद करता है, लेकिन उनके रोजमर्रा के कामकाज में कोई दखल नहीं देता

Updated On: Nov 28, 2017 11:02 PM IST

Pratima Sharma Pratima Sharma
सीनियर न्यूज एडिटर, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी

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रिलायंस फाउंडेशन के मार्गदर्शन में स्वावलंबी हो रहे किसान

राजकोट का एक छोटा सा गांव है वानकिया. करीब तीन साल पहले तक इस गांव की पहचान परेशान किसान हुआ करते थे. छोटे-छोटे ऐसे किसान जो सालभर मेहनत तो करते थे लेकिन जब कमाई का मौका आता था तो उन्हें सही दाम तक नहीं मिल पाता था. लेकिन रिलायंस फाउंडेशन की सीएसआर की पहल ने गांववालों की जिंदगी बदल दी.

इस फाउंडेशन की सबसे बड़ी खासियत ये है कि यह किसानों की मदद करता है, लेकिन उनके रोजमर्रा के कामकाज में कोई दखल नहीं देता है. इन किसानों के बीच फाउंडेशन की भूमिका एक मार्गदर्शक के तौर पर रहती है. आज यहां के किसान खुशहाल हैं. अपनी पैदावार की सही कीमत हासिल करने के लिए वो किसी के मोहताज नहीं हैं. अपनी फसल वे किस कीमत पर बेचेंगे, इस बात का फैसला आज वो खुद कर सकते हैं.

Reliance Foundation Work For Farmers 2

लगभग तीन साल पहले जब फाउंडेशन ने इस गांव को चुना, तब ज्यादातर किसानों को पानी की समस्या थी. सौराष्ट्र के इस इलाके में हर तीन चार-साल में सूखा आता है. लिहाजा उस वक्त किसानों ने पानी से जुड़ी समस्या पर काम करने को कहा. छोटे-छोटे चेक डैम बनाकर पानी को रोका गया, ताकि वहां की मिट्टी में नमी बरकरार रहे. अब इस गांव के किसानों की पानी की समस्या काफी हद तक कम हो गई है. साथ ही मूंगफली की पैदावार में भी शानदार इजाफा हुआ है.

फाउंडेशन ने यहां किसानों को मिलकर काम करने की सीख दी. इसके तहत किसानों ने मिलकर एक कंपनी बनाई. इसका नाम सौराष्ट्र स्वनिर्भर खेड़ूत प्रोड्यूसर कंपनी है. रिलायंस फाउंडेशन के मार्गदर्शन में ये कंपनी ही वानकिया गांव के किसानों से जुड़े मामलों में फैसला लेती है. इसके चार बोर्ड मेंबर हैं. इसके चेयरमैन मगन भाई झापड़िया हैं. वाइस चेयरमैन रतादिया जालाभाई कालाभाई हैं. मगनभाई ने कहा, हमने किसानों को एक साथ किया है. उन्हें यह ट्रेनिंग दी है कि किस फसल में कितना खाद का इस्तेमाल करें. कौन सी बीज से बेहतर फसल होगी.’ बोर्ड मेंबर की ही सलाह पर वानकिया के किसानों ने मूंगफली की खेती की.

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बेहतर कीमत का तोहफा

सरकार ने मूंगफली की एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य ) 4500 रुपए प्रति टन की है. यह कंपनी बनने से पहले किसान बाजार के हिसाब से ही अपनी फसल बेच पाते थे. बाजार में यह कीमत 3500 रुपए प्रति टन है. यानी एमएससी से 1000 रुपए कम. यह कीमत मांग और आपूर्ति के आधार पर ही तय होती थी.

अपनी फसल ट्रक पर लाद कर मंडी पहुंचने वाले किसानों के पास कोई रास्ता नहीं होता था. ना चाहते हुए भी उन्हें उसी भाव परअपना सामान बेचना पड़ता था, जो खरीदार तय करते थे. कई बार माल की क्वालिटी अच्छी ना होने का हवाला देते हुए खरीदार किसानों को औने-पौने दाम पकड़ा देते थे. माल का पैसा किसानों को एक-दो दिन में मिलता था. अगर किसानों को तुरंत पैसा चाहिए तो खरीदार चार या पांच फीसदी काटकर देते थे, लेकिन किसानों की अपनी कंपनी बन जाने के बाद ये दिक्कत खत्म हो गई है.

बोर्ड के सदस्य किसानों को पहले से ही बताते हैं कि बेहतर क्वालिटी के लिए उन्हें किस बीज का इस्तेमाल करना चाहिए. कब दवा का छिड़काव करना चाहिए. कब और कितना खाद डालें. इससे फसल की क्वालिटी की समस्या खत्म हो जाती है. चेकडैम की वजह से पानी की दिक्कत भी कम हो गई है.

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कैसे माल बेचते है किसान

किसानों के माल की जांच करने के बाद यह तय किया जाता है कि क्वालिटी कैसी है. फिलहाल सौराष्ट्र स्वनिर्भर खेड़ूत प्रोड्यूसर कंपनी से जुड़े किसान मूंगफली की खेती कर रहे हैं. सरकार के तय मानकों के आधार पर मूंगफली की क्वालिटी जांची जाती है. इसके तहत यह देखा जाता है कि एक किलो मूंगफली में कितने ग्राम दाना और कितने ग्राम छिलका निकलता है. मूंगफली में मिट्टी कितनी है. किसानों को इन बातों की जानकारी पहले से दे दी जाती है लिहाजा उन्हें बेहतर कीमत मिलने का चांस बढ़ जाता है.

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कैसे चलती है कंपनी

सौराष्ट्र स्वनिर्भर खेड़ूत प्रोड्यूसर कंपनी किसानों का समूह होता है. इसमें शामिल होने वालों किसान 100 रुपए में कंपनी के शेयर खरीदते हैं. यही किसान आपस में मिलकर कंपनी के लीडर तय करते हैं. जो इसके चेयरमैन, वाइस चेयरमैन, सेक्रेटरी और बोर्ड ऑफ डायरेक्टर चुनते हैं.

रिलायंस फाउंडेशन ने नाफेड के साथ समझौता किया है. इसके तहत नाफेड एमएससी पर किसानों से मूंगफली खरीद रही है.

मगन भाई ने कहा, इस साल अब तक 17 गांवों को मिलाकर कंपनी का कुल टर्नओवर 20 करोड़ रुपए तक पहुंच चुका है और आगे इस दायरों में दूसरी फसलों को भी लाने की तैयारी है. रिलायंस फाउंडेशन देश के 12 राज्यों में ऐसी पहल चला रहा है. इनमें तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, झारखंड, ओडिशा, गुजरात, एमपी, राजस्थान, तेलंगाना, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक जैसे राज्य हैं.

(फोटो: प्रतिमा शर्मा कुमार)

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