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प्रदूषण पर सरकार की खानापूर्ति से कब तक चलेगा काम?

दिल्ली-एनसीआर ही नहीं पूरे देश में प्रदूषण की समस्या ने विकराल रूप ले लिया है. केंद्र सरकार से लेकर राज्य सरकारें सिर्फ खानापूर्ति कर मौसम ठीक होने का इंतजार में लग जाती हैं.

Ravishankar Singh Ravishankar Singh Updated On: Nov 15, 2017 08:44 PM IST

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प्रदूषण पर सरकार की खानापूर्ति से कब तक चलेगा काम?

प्रदूषण को लेकर केंद्र सरकार से लेकर राज्य सरकारों की नीयत पर भी अब सवाल उठने लगे हैं. खासतौर पर दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण की समस्या को लेकर सुप्रीम कोर्ट और एनजीटी काफी चिंतित दिखाई दे रहे हैं.

दूसरी तरफ दिल्ली सरकार के द्वारा प्रदूषण पर किए गए काम को लेकर भी अब विवाद बढ़ने लगा है. अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी की सरकार ऑड-ईवन को लेकर बातें चाहे जितनी भी कर रही हो लेकिन पर्यावरण के नाम पर उसने पिछले दो सालों में सिर्फ दो करोड़ रुपए ही खर्च किए हैं. जबकि, इस नाम पर लोगों से 787 करोड़ रुपए वसूले हैं.

गौरतलब है कि अक्टूबर 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में दाखिल होने वाले ट्रकों पर एनवायरमेंट कम्पंनसेशन चार्ज लगाने के आदेश दिया था. इस आदेश के अंतर्गत छोटे ट्रकों से 700 रुपए और बड़े ट्रकों से 1300 रुपए वसूल कर दिल्ली परिवहन विभाग को देने थे.

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सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक इन पैसों का उपयोग दिल्ली में पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बेहतर और सड़कों को सुधारने के लिए किया जाना था. लेकिन, दिल्ली सरकार ने इन पैसों का कुछ खास नहीं कर पाई.

दूसरी तरफ दिल्ली-एनसीआर के लिए साल 2016 में एक आपातकालीन वायु गुणवत्ता वाली चेतावनी प्रणाली का उद्देश्य भी लगभग विफल ही साबित हुआ.

बढ़ते प्रदूषण पर लोगों को सूचना देने के लिए यह प्रणाली तैयार की जानी थी. इसके तहत हर रोज दिल्ली-एनसीआर के लोगों को प्रदूषण की गुणवत्ता के बारे में बताया जाना था.

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

एक रिसर्च वेबसाइट इंडिया स्पेंड के मुताबिक पिछले 8 अक्टूबर के बाद से ही वायु की गुणवत्ता का स्तर 8 बार खराब स्तर, 21 बार बहुत खराब स्तर और एक बार आपातकाल स्तर पर अब तक पहुंच गया है.

देखा जाए तो साल 2016 में भी प्रदूषण को लेकर आपातकाल की स्थिति पैदा हुई थी. उस वक्त सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड(सीपीसीबी) को खासकर सर्दियों में एक ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (ग्रैप) तैयार करने को कहा था.

सुप्रीम कोर्ट ने साल 2016 में कहा था कि प्रदूषण संकट के समाधान के लिए सरकार स्थाई उपाय की दिशा में आगे आए.

ताज्जुब यह है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद भी इस प्लान पर विशेष ध्यान नहीं दिया गया. हालांकि, पर्यावरण मंत्रालय ने 12 जनवरी 2017 को ही ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (ग्रैप) को मंजूरी दे दी थी, लेकिन पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से इसकी मंजूरी 10 महीने बाद 17 अक्टूबर 2017 को मिली.

इस मसले पर सीपीसीवी के सदस्य सचिव ए. सुधाकर ने फर्स्टपोस्ट हिंदी से बात करते हुए कहा, ‘देखिए हमलोगों ने भी जनवरी 2017 से इसको नोटिफाई कर लिया था. हमलोगों ने खराब, बहुत खराब और सीवियर स्थिति के प्वाइंट को नोटिफाई कर के इस दिशा में काम करना शुरू कर दिया. मौजूदा हालत की समीक्षा की जा रही है. इसके बाद ही इस मसले पर और कुछ निर्णय लिए जा सकेंगे.’

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक औसत एयर क्वालिटी इंडेक्स में पिछले मंगलवार से कुछ सुधार हुए हैं, लेकिन अभी भी स्थिति खतरनाक स्तर पर ही है.

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दिवाली के कुछ दिन पहले से ही दिल्ली-एनसीआर में वायु की गुणवत्ता खराब होनी शुरू हो गई थी. पिछले कुछ दिनों से विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित सीमा से प्रदूषण का स्तर 10 से 12 गुना तक ज्यादा हो गया है.

पर्यावरण पर काम करने वाली संस्थाओं का भी मानना है कि केंद्र सरकार से लेकर राज्य सरकारों तक प्रदूषण की योजना पर ठीक से काम नहीं किया. हवा को स्वच्छ बनाने की दिशा में किसी भी सरकार ने कोई ठोस पहल अभी तक नहीं की है.

थर्मल पावर प्लांट्स से निकलने वाले प्रदूषण को रोकने की दिशा में कदम हो, चाहे सड़कों पर धूल रोकने के लिए पानी का छिड़काव करना हो या फिर ट्रैफिक कंट्रोल जैसी समस्या को कैसे निपटा जाए इस पर भी सरकारें ध्यान नहीं दे रही हैं.

गौरतलब है कि इस साल अक्टूबर महीने के पहले सप्ताह से ही वायु की गुणवत्ता में कमी आनी शुरू हो गई थी. यह स्थिति लगातार बनी रही जिससे स्थिति बिगड़ती चली गई. पिछले कुछ दिनों से पीएम-2.5 और पीएम-10 का स्तर सामान्य से कई गुना ज्यादा रह रहा है.

सोमवार को ही दिल्ली के साथ-साथ नोएडा और गुरुग्राम में भी पीएम 2.5 का स्तर खतरनाक श्रेणी में दर्ज किया गया.

प्रतीकात्मक तस्वीर

पर्यावरण के जानकारों का मानना है कि पिछले महीने से ही सरकारी अधिकारियों को स्वास्थ्य संबंधी जानकारी जारी करनी थी. साथ ही डीजल से चलने वाली गाड़ियों और जेनरेटर पर भी प्रतिबंध लगाना चाहिए था.

इसके अलावा दिल्ली-एनसीआर में पार्किंग की फीस को भी बढ़ाया जाना चाहिए था. साथ ही पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बढ़ावा देने के साथ लकड़ी और कोयले के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाना चाहिए था, जिसे नहीं किया गया.

कुल मिलाकर दिल्ली-एनसीआर ही नहीं पूरे देश में प्रदूषण की समस्या ने विकराल रूप ले लिया है. केंद्र सरकार से लेकर राज्य सरकारें सिर्फ खानापूर्ति कर मौसम ठीक होने का इंतजार में लग जाती हैं.

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