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एनसीआर में बिल्डिंग निर्माण की सच्चाई : अथॉरिटी और बिल्डर्स लोगों की जिंदगी से खेल रहे हैं

एनसीआर में अवैध बिल्डिंग निर्माण की सच्चाई ने भयानक रूप धारण कर लिया है. बिल्डर्स और अथॉरिटी की सांठ-गांठ ने मासूम लोगों की जिंदगी खतरे में डाल रखी है

Updated On: Aug 02, 2018 09:46 PM IST

Ravishankar Singh Ravishankar Singh

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एनसीआर में बिल्डिंग निर्माण की सच्चाई : अथॉरिटी और बिल्डर्स लोगों की जिंदगी से खेल रहे हैं

पिछले कुछ दिनों से उत्तर भारत का अधिकांश हिस्सा बारिश से बेहाल है. बारिश के कारण कई इमारतें जमींदोज हो गई हैं. खासकर यूपी के गाजियाबाद, नोएडा और ग्रेटर नोएडा में तो निर्माणाधीन इमारतों के गिरने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है. इन इलाकों से निर्माणाधीन इमारतों के गिरने की खबर लगातार सुनाई दे रही है.

यूपी के दूसरे हिस्सों से भी इमारतों के गिरने की लगातार खबरें मिल रही हैं. बीते मंगलवार को ही यूपी के कानपुर में एक दो मंजिला इमारत गिर गई, हालांकि इस घटना में कोई हताहत नहीं हुआ, लेकिन इन घटनाओं ने सरकार के सामने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. लागों का सवाल है कि आखिर किस गलती की सजा उनको और उनके परिवार को सरकार दे रही है?

यूपी की ये दो-तीन घटनाएं तो सिर्फ एक बानगी हैं राज्य में अब भी सैंकड़ों ऐसे घर हैं, जिनमें रहने वाले लोग हर रोज दुआओं के सहारे ही जिंदा हैं. पिछले दिनों इन घटनाओं के बाद हालात की गंभीरता को समझते हुए यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने खुद मोर्चा संभाला था. योगी आदित्यनाथ ने आरोपी अफसरों पर सख्त कदम उठाने के निर्देश जारी किए.

इसका नतीजा यह हुआ है कि गाजियाबाद, नोएडा और ग्रेटर नोएडा में प्राधिकरण की तरफ से थोड़ी-बहुत सख्ती दिखाने की शुरुआत हो गई. बावजूद इसके सवाल यह है कि प्रशासन की तरफ से पहले गलत काम कराए जाते हैं फिर उस पर लीपापोती शुरू कर दी जाती है.

यह कहना गलत नहीं होगा कि इन घटनाओं के लिए पुलिस, प्राधिकरण और नेता कम जिम्मेदार नहीं हैं. गाजियाबाद, नोएडा और ग्रेटर नोएडा में चल रहे अवैध निर्माण में इन लोगों का पूरा सहयोग रहता है. फ़र्स्टपोस्ट हिंदी ने गाजियाबाद और ग्रेटर नोएडा के कई इलाकों का दौरा किया.

स्थानीय लोगों का साफ कहना है कि ग्रेटर नोएडा के शाहबेरी और गाजियाबाद के आकाश नगर में बड़ी-बड़ी इमारतों को खड़ा करने में इन नेताओं का पूरा सहयोग रहा है. स्थानीय सफेदपोश नेता और खाकी की मिलीभगत का परिणाम ही है कि गांव के खेती वाली जमीन पर भी बड़ी-बड़ी इमारतें खड़ी हो रही हैं.

अगर हम बात नोएडा विकास प्राधिकरण की करें तो यहां पर 22 हजार हेक्टेयर जमीन है, जिसमें 15 हजार हेक्टेयर जमीन शहरीकरण योग्य है. नोएडा विकास प्राधिकरण के द्वारा यहां पर अब तक 12 हजार 500 हेक्टेयर जमीन एक्वायर की जा चुकी है. हिंडन नदी से लेकर यमुना तक नोटिफाइड एरिया माना जाता है. यहां पर बिल्डिंग या मकान बनाने के लिए नक्शा पास कराना जरूरी होता है. बगैर नक्शा पास किए इन इलाकों में मकान बनाना गैरकानूनी है. इसके बावजूद इन इलाकों में धड़ल्ले से मकान बनाए जा रहे हैं.

खासकर डूब क्षेत्रों में भी अवैध निर्माण धड़ल्ले से चल रहा है. ऐसा नहीं है कि यह निर्माण कार्य अभी शुरू हुए हैं. सालों से इन इलाकों में अवैध निर्माण का काम चल रहा है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि जब शासन और प्रशासन की तरफ से यहां पर मकान बनाना अपराध है तो फिर क्यों और किसके इशारे पर सालों से मकान बनाए जा रहे हैं? इन इलाकों में बिना नक्शा पास कराए कैसे सालों से मकान बन रहे हैं?

Greater Noida Building Collapse

ग्रेटर नोएडा के शाहबेरी में हुए हादसे की तस्वीर

प्राधिकरण का कहना है इन इलाकों में जो गैरकानूनी कंस्ट्रक्शन चल रहे हैं वह बिना नक्शा पास कराए ही किए जा रहे हैं. जबकि, जानकारों का मानना है कि प्राधिकरण में भ्रष्टाचार के कारण लोगों को नक्शा पास कराने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. इसलिए लोग बगैर नक्शा पास कराए ही मकान बना रहे हैं.

बता दें कि नक्शा पास कराने के लिए एक आर्किटेक्ट इंजीनियर जमीन पर जा कर मुआयना करता है. जमीन के बारे में आर्किटेक्ट को सारी जानकारी पहले से हासिल करनी होती है. आर्किटेक्ट इंजीनियर जमीन की मिट्टी को देखकर बताता है कि मकान की गहराई कितनी होनी चाहिए. कितने पिलर होने चाहिए. कितने स्ट्रेंथ का पिलर कितने नीचे से बन कर आएगा. सरिया का लेवल कैसा होगा. सीमेंट किस क्वालिटी की होनी चाहिए. यह सब पहले से निर्धारित रहती है. आर्किटेक्ट इंजीनियर के रिपोर्ट तैयार करने के बाद ही प्राधिकरण का सीविल इंजीनियर उस रिपोर्ट को फाइनल करता है. प्राधिकरण की मंजूरी के बाद ही बिल्डर काम शुरू करता है.

ऐसे में सवाल यह उठता है कि अगर नक्शा पास ही नहीं होता है तो बिल्डिंग की क्वालिटी कैसे मेंटेन होगी? इसका नतीजा यह होता है कि बिल्डिंग लगातार गिर रही हैं.

नेशनल बिल्डिंग कोड कहता है कि बिल्डर भवन निर्माण को लेकर एक निश्चित माप-दंडों का पालन करें. बिल्डर जमीन की लंबाई-चौड़ाई के हिसाब से मकान बना सकता है. सुपर एरिया, कवर एरिया. बालकनी, वेंटिलेशन सभी का एक क्राइटेरिया इस कोड में फिक्स है. प्राधिकरण के इंजीनियर को अधिकार रहता है कि नक्शा पास होने के बाद भी अगर बिल्डर नियम का पालन नहीं करता है तो उसको चेतावनी देकर नक्शे के अनुसार मकान बनवाए. चेतावनी के बाद भी बिल्डर नहीं मानता है तो नक्शा रद्द करने का भी अधिकार प्राधिकरण के पास रहता है.

नक्शा पास कराने के बाद भी यूपी अपार्टमेंट एक्ट 2010 के मुताबिक बिल्डर्स को बिल्डिंग का डीड ऑफ डिक्लेरेशन देनी पड़ेगी. नगर पंचायत या ग्राम प्रधान के पास नक्शा पास कराने का कोई अधिकार नहीं होता है.

अब सवाल यह है कि इतने मानदंडों के बाद भी गाजियाबाद जैसे इलाके में 300 अवैध कोलॉनियां कैसे बन गईं? गाजियाबाद विकास प्राधिकरण के नाक के नीचे ही मुराद नगर गाजियाबाद से कैसे मिल गया है? क्या प्राधिकरण को नहीं देखना चाहिए कि इतने लोग अगर यहां बस रहे हैं तो प्राधिकरण के मानदंडों के अनुसार बसाया जाए? प्राधिकरण पर आरोप लगते हैं कि नक्शा पास कराने में लोगों को खून चूस लिया जाता है.

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प्रतीकात्मक तस्वीर

नोएडा विकास प्राधिकरण और गाजियाबाद विकास प्राधिकरण को करीब से जानने वाले सत्यदेव त्यागी जो पेशे से वकील हैं, फ़र्स्टपोस्ट हिंदी से बात करते हुए कहते हैं, 'देखिए हाल की कुछ घटनाओं के बाद मकानों की रजिस्ट्री पर भी सवाल खड़े किए जा रहे हैं? पिछले कुछ सालों से सरकार का काम सिर्फ रजिस्ट्री से रेवन्यू कलेक्ट करना रह गया है. आप यह समझ लीजिए की डूब क्षेत्र (प्राधिकरण द्वारा वर्जित क्षेत्र) की जमीन के मालिक वहां के किसान होते हैं. मैं आपको बता दूं कि उनके पास भी जमीन बेचने के लिए ट्रांसफरेबल राइट्स होते हैं. वे लोग जमीन को कभी भी बेच सकते हैं इसको कोई भी रोक नहीं सकता है. लेकिन, वे किसान जमीन पर मकान नहीं बना सकते हैं. इसके लिए प्राधिकरण की अनुमति, नक्शा पास होना और लैंड यूज भी चेंज होना जरूरी है. डूब क्षेत्र की सारी जमीन किसानों की है और यह एग्रीकल्चर लैंड में आती है. अगर आप लैंड यूज चेंज कराना चाहते हैं तो इसके प्राधिकरण के पास जाना होगा. लेकिन अमूमन ऐसा नहीं होता है, जिसका नतीजा है कि गाजियाबाद के कई इलाकों में अवैध कोलॉनियों की बाढ़ सी आ गई है.'

त्यागी आगे कहते हैं, ‘पटवारी को हर छह महीने में खेसरे की रिपोर्ट तैयारी करनी होती है. किसानों की हर फसल के बारे में भी पटवारी को शासन को बताना पड़ता है कि उस जमीन पर अभी कौन सी फसल उगाई जा रही है. लेकिन, पटवारी रिपोर्ट तो छोड़ दीजिए मौके पर जाना भी नहीं चाहता है. पटवारी का काम है कि शासन को इन जमीनों के बारे में लगातार रिपोर्ट करना लेकिन वह काम करता नहीं है. इसके साथ ही प्राधिकरण के इंजीनियर्स और जेई के भी क्षेत्र बंटे हुए हैं. अगर गैरकानूनी काम इन जगहों पर हो रहे हैं तो इन इंजीनियरों को भी प्राधिकरण को बताना चाहिए कि यहां पर गैरकानूनी काम हो रहे हैं लेकिन वे लोग भी ऐसा नहीं करते.’

बता दें अर्बन डेवलपमेंट प्लानिंग एक्ट 1973 के तहत गैरकानूनी कंस्ट्रक्शन को लेकर कार्रवाई के भी कई प्रावधान हैं. अवैध काम करने वालों को नोटिस आती है कि जमीन पर अवैध काम बंद करो. पिछले दिनों ही ग्रेटर नोएडा के शाहबेरी में जो घटना हुई है वह भी गैरकानूनी कंस्ट्रक्शन का ही नतीजा है. यहां पर भी प्राधिकरण के द्वारा बिल्डर्स पर सख्ती हुई होती तो 9 लोगों की जान आज न गई होती.

अक्सर देखा जाता है कि इन इलाकों में बिल्डर्स काफी टेक्निकल टर्म का उपयोग कर खरीददार को भटका देते हैं. कई मंजिला इमारत खड़ी कर मनमाफिक दामों में बेच भी देते हैं. बिल्डर्स छह-छह मंजिला इमारतों को कानूनी उलझनों में उलझा कर रखते हैं. बिल्डर्स ग्राउंड प्लोर को ग्राउंड फ्लोर नहीं बोलते बल्कि उसको टिल्ट कहते हैं. उसके बाद के फ्लोर को अपर ग्राउंड फ्लोर. फिर उसके बाद वाले फ्लोर को मेजनाइल फ्लोर कह कर लोगों को बेचा जाता है. बिल्डर्स अपने हिसाब से तीसरे फ्लोर को फर्स्ट फ्लोर कहता है. नतीजा यह होता है कि बिल्डर्स के मुताबिक छठे फ्लोर को थर्ड फ्लोर कहा जाता है. थर्ड फ्लोर से ही फर्स्ट फ्लोर की शरुआत मानी जाती है.

अब सवाल यह है कि इस काम में बिल्डर्स को कौन मदद करता है? क्या छह मंजिल की बिल्डिंग एक दिन में बन जाती है? क्या प्राधिकरण को बिल्डिंग तैयार होने की जानकारी नहीं होती है? क्या प्रशासन की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिससे प्राधिकरण भाग नहीं सकता.

VASUNDHARA

नोएडा विकास प्राधिकरण के ओएसडी राजेश कुमार सिंह फ़र्स्टपोस्ट हिंदी से बात करते हुए कहते हैं, ‘देखिए नोएडा में ग्रामीण भवन नियामावली 2016 लागू है. अगर किसी को अपना मकान बनाना है तो वह नक्शे के लिए अप्लाई करे और नक्शा पास करा कर ही अपना मकान बनाए. जो लोग ऐसा नहीं करते हैं प्राधिकरण वैसे लोगों पर सख्त कार्रवाई करता रही है. अभी जो कार्रवाई चल रही है यह कोई शाहबेरी की घटना के बाद नहीं किया जा रहा है. प्राधिकऱण इस तरह की कार्रवाई लगातार करता रहा है. इस घटना के बाद प्राधिकरण ने सर्वे का काम जरूर शुरू करवाया है.’

राजेश कुमार सिंह आगे कहते हैं, 'हमलोग इस वक्त तीन प्रकार के सर्वे कर रहे हैं. पहला, नोएडा और ग्रेटर नोएडा के गांवों के अंदर जो बहुमंजिला इमारत बनाई गई हैं, अगर वह रहने के मकसद से बनाए गए हैं तो उससे प्राधिकरण का कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन उस इमारत का इस्तेमाल व्यावसायिक उद्देश्य के लिए किया जा रहा है तो हमलोग उस पर कार्रवाई कर रहे हैं. दूसरा, गांव के बाहर और सेक्टरों के बीच की जमीन, जिसको प्राधिकरण भविष्य में ले सकता है वैसी जमीनों पर अगर किसान निर्माण कार्य कर रहे हैं तो उस पर भी हमलोग कार्रवाई कर रहे हैं.

तीसरा, प्राधिकरण यह कोशिश करता है कि भविष्य में प्लांट डेवलपमेंट का काम प्रभावित नहीं होना चाहिए. इसलिए हमलोग उन मकानों या इमारतों को तोड़ रहे हैं. बुधवार को भी हमलोगों ने नोएडा के हजरतपुर-बाजितपुर इलाके में कुछ मकानों को तोड़ा है. यह कृषि योग्य जमीन है जिस पर मालिक मकान बना रहा था. हमने जब उस जमीन के बारे में पता किया तो मालूम चला है कि उस जमीन पर प्राधिकरण ने भविष्य में रास्ता निकाल रखा है.’

जानकारों का मानना है कि नोएडा विकास प्राधिकरण हो या गाजियाबाद विकास प्राधिकरण भ्रष्टाचार काफी चरम पर है. जब प्राधिकरण का गठन ही नो प्रॉफिट नो लॉस के लिए क्या गया तो इसको सरकार रेवेन्यू अर्न करने का जरिया क्यों मानती है? इन घटनाओं के लिए कुछ प्राइवेट कंपनियां और फाइनेंसियल इस्टीट्यूशन भी कम जिम्मेदार नहीं हैं. इन कंपनियों के द्वारा अगर फंडिग नहीं होगी तो भी यह काम भी काफी हद तक रुक सकता है. शासन और प्रशासन को इन फंडिंग पर भी चोट करनी चाहिए तभी गैरकानूनी कंस्ट्रक्शन पर ब्रेक लगेगा.

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