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रामचंद्र गुहा को किसी एक भाषा के घेरे में बंद करके देखना ठीक नहीं

अवॉर्ड देने की कसौटी यह नहीं है कि आप कन्नड़ जानते हैं या नहीं और अगर कर्नाटक के प्रति योगदान करने की कसौटी पर परखें तो रामचंद्र गुहा सौ टंच खरा सोना उतरेंगे.

Prathibha Nandakumar Updated On: Nov 02, 2017 02:40 PM IST

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रामचंद्र गुहा को किसी एक भाषा के घेरे में बंद करके देखना ठीक नहीं

रामचंद्र गुहा को 2 अक्टूबर 2017 को हेग्गोदू स्थित निनासम के कल्चर कैंप में महात्मा गांधी के बारे में बोलने के लिए आमंत्रित किया गया था. गुहा ने कहा कि यह गांधी से नई पीढ़ी को परिचित कराने की एक कोशिश है.

कन्नड़ आलोचक और इतिहासकार की बातचीत

व्याख्यान के बाद रामचंद्र गुहा से कल्चर कैंप के भागीदारों की बातचीत के लिए एक गोष्ठी हुई. सवाल-जवाब के सत्र की शुरुआत करने की जिम्मेवारी कन्नड़ भाषा और साहित्य के प्रसिद्ध आलोचक डीएस नागभूषण को दी गई. उन्होंने कन्नड़ में सवाल पूछे. गुहा के जवाब अंग्रेजी में थे और वे नागभूषण को संतोषजनक नहीं लगे. कैंप से लौटने के बाद नागभूषण ने गुहा को एक लंबा मेल लिखा, कैंप में जो मसले उठाए थे उन्हें मेल में विस्तार से लिखा. गुहा ने इसका जवाब दिया.

इसके बाद अगले चार दिनों तक 14 पन्नों पर दोनों की बहस चली. बहस के अंत में दोनों की दोस्ती हो गई. नागभूषण ने मेल को प्रकाशित कर दिया और उसमें गुहा के बारे में लिखा: 'एक चीज जिसने मुझे बड़ी गहराई से छुआ वो ये थी कि गुहा जैसे प्रसिद्ध इतिहासकार ने मुझे जैसे नाचीज के साथ संवाद करने में इतनी दिलचस्पी दिखाई, वह भी मेरी टूटी-फूटी अंग्रेजी का ख्याल ना करते हुए और आखिर में अपनी सारी प्रसिद्धि को एक किनारे रखते हुए मान लिया कि विशेषज्ञ होने के बावजूद कुछ बातें ऐसी हैं जो उनकी जानकारी से बाहर हैं. उनकी इस विनम्रता ने मेरा दिल जीत लिया.'

गुहा के कन्नड़ होने पर सवाल

संयोग देखिए कि इस साल जिन 60 लोगों को राज्योत्सव अवॉर्ड मिला उनमें रामचंद्र गुहा और डीएस नागभूषण दोनों ही शामिल हैं. जहां एक तरफ नागभूषण के लिए बधाइयों का तांता लग गया तो दूसरी तरफ कन्नड़ जनता के बीच रामचंद्र गुहा को लेकर राय मिली-जुली रही.

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कुछ लोग यह कहकर आलोचना कर रहे थे कि रामचंद्र गुहा कन्नड़ नहीं जानते तो भी उन्हें अवॉर्ड दिया गया. जबकि कुछ और लोग जी-जान लगाकर गुहा की तरफदारी कर रहे थे. उनका तर्क था कि इस इतिहासकार ने कर्नाटक के लिए इतना कुछ किया है कि राज्योत्सव अवॉर्ड ही नहीं इससे भी ज्यादा बड़े अवॉर्ड का अधिकारी है.

गुहा ने हमेशा कहा है कि मुझे अपने कन्नड़ होने पर गर्व है. वे बौद्धिक हलके में कर्नाटक के प्रतिनिधि हैं और कर्नाटक को भी उनपर गर्व है. कर्नाटक से जुड़ा सियासी, समाजी या तहजीबी कोई भी मामला हो वे ऐसी हर बात पर अपनी प्रतिक्रिया देते हैं. उनके बारे में यह तक कहा जाता है कि वे कन्नड़ अवाम के विवेक की आवाज हैं.

गुहा का है कर्नाटक से गहरा रिश्ता

गुहा ने कई मौकों पर कहा है कि कर्नाटक की विभूतियों में उन्हें सबसे ज्यादा पसंद डा. शिवराम कारंत हैं और कारंत का उनपर गहरा प्रभाव पड़ा है. बात भाषा की राजनीति की नहीं है. गुहा और कर्नाटक का आपसी रिश्ता इस दायरे के पार की बात है. राज्योत्सव अवॉर्ड तो उन्हें बहुत पहले मिल जाना चाहिए था.

ramchandra guha

लेकिन मसले का एक दूसरा पहलू भी है. कोई आदमी अगर किसी जगह से 20 साल से भी ज्यादा वक्त से दूर रह रहा हो तो उसके लिए स्थानीय भाषा को सीख पाना कितना मुश्किल होता है? जब गुहा से हेग्गोदू के सेमिनार में यह सवाल पूछा गया तो उनका जवाब था कि बंगलुरु आने के वक्त उनकी उम्र 40 साल की थी. किसी भाषा को सीखने के लिहाज से यह उम्र ज्यादा होती है. लेकिन ऐसा भी नहीं कि गुहा की देसी भाषाओं के भीतर कोई जड़ ही ना हो. वे बहुत अच्छी हिन्दी जानते हैं और गली-मुहल्लों की कन्नड़ पर भी उनकी पकड़ है.

लेकिन सोशल मीडिया पर जिन लोगों ने गुहा की आलोचना की उनके लिए ये बातें मायने नहीं रखतीं. ऐसे आलोचकों ने पूछा कि जो व्यक्ति इतने धारा-प्रवाह ढंग से क्षेत्रवाद बनाम राष्ट्रवाद के मसले पर अपनी बात रख रहा है और उसके नतीजों के बारे में बता रहा है वह ऐसा दावा कैसे कर सकता है कि किसी क्षेत्र विशेष की भाषा को जानना कत्तई जरुरी नहीं. सोशल मीडिया पर गुहा के आलोचकों का तर्क था कि स्थानीय भाषा सीख पाने में असमर्थ होने का तर्क मानने लायक नहीं.

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इन आलोचकों ने कहा कि गुहा तो सिर्फ यू.आर.अनंतमूर्ति, गिरीश कर्नाड और डा.आर नागराज को उद्धृत (कोट) करते हैं, वे पी. लंकेश, पूर्णचंद्र तेजस्वी, केवी सुब्णणा, चंद्रशेखर कांबरा और देवनूरा महादेव के हवाले नहीं देते. नागभूषण कहते हैं कि अंग्रेजी के कुएं के प्रिय मेंढक का यह सांस्कृतिक अपराध है. दरअसल एक सेमिनार में गुहा ने अपना बचाव करते हुए कहा कि देवी सरस्वती ने अंग्रेजी को भी जन्म दिया है! लेकिन इस संतान का जन्म तो इंग्लैंड में हुआ, कर्नाटक में नहीं जबकि राज्योत्सव अवॉर्ड कर्नाटक में दिया जाता है तो क्या अवॉर्ड देने की कसौटी में इस तथ्य का भी ध्यान रखा जाना चाहिए?

गुहा पर कन्नड़ क्यों लादना?

कुछ कन्नड़ भाषियों को लगता है कि कन्नड़ ना सीख पाने का गुहा का तर्क बचकाना है जबकि कन्नड़ अवाम के एक बड़े तबके का मानना है कि किसी भाषा को जानने-ना जानने को नैतिकता का सवाल नहीं बनाना चाहिए. किसी व्यक्ति की भाषाई काबिलियत की जांच करना और उसी आधार पर उसका मूल्यांकन करना दरअसल व्यक्ति की निजता में सेंधमारी करने जैसा है. यह दरअसल उतना ही बुरा है जितना कि लोगों के ऊपर हिन्दी को जबर्दस्ती लादना. अगर हम हिन्दी को जबर्दस्ती लादने का विरोध कर रहे हैं तो फिर इस मामले में कन्नड़ को एक अपवाद क्यों मानें?

लेकिन गुहा कर्नाटक में रहते हैं और कुंटडी नीतेश (नीतेश केलिकथाया, अडिगा अंगला और रुथुमाना जैसे ऑनलाइन पोर्टल चलाते हैं. इन्होंने गुहा और नागभूषण के आपसी ईमेल का भी प्रकाशन किया) जैसी शख्सियत ने अपने फेसबुक वॉल पर इस मसले पर लिखा और दावा किया कि 'मुझे गुहा के इस तर्क पर सवाल उठाने का पूरा अधिकार है कि वे जहां रहते हैं वहां की भाषा उन्होंने नहीं सीखी.'

इस तर्क पर सवाल उठाया जाना चाहिए. किसी भी व्यक्ति को किसी दूसरे की पसंद-नापसंद पर सवाल उठाने का अधिकार नहीं है, खासतौर से ऐसे मामले को उठाकर किसी राज्य सरकार के प्रतिष्ठित पुरस्कार पर प्रश्न तो नहीं ही उठाए जाने चाहिए.

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गुहा कन्नड़ भाषा के एक लोकप्रिय अखबार प्रजावाणी में कॉलम लिखते हैं. इस कॉलम का नाम गुहाकाना है और निस्संदेह यह बहुत अच्छा है. कॉलम में प्रदेश और देश से जुड़े कई मामलों की चर्चा रहती है. कर्नाटक के ज्यादातर पाठक सोचते हैं कि गुहा इसे मूल रुप से कन्नड़ में ही लिखते हैं. दरअसल गुहा इस कॉलम के लिए अंग्रेजी में लिखते हैं और अखबार उसका अनुवाद करके छापता है. गुहाकाना के बहुत ज्यादा पाठक हैं और इनमें से किसी ने गुहा के ‘कन्नड़-पन’ पर सवाल नहीं उठाए. जहां तक गुहा के कॉलम के पाठकों का सवाल है, वे गुहा को अपनों में से एक मानते हैं. अगर ऐसा ना हो तो भी वे दरअसल हम कन्नड़भाषी लोगों के अपनों में शामिल हैं.

बीजेपी और कांग्रेस दोनों की आलोचना करते हैं गुहा

किसी व्यक्ति ने एक और कोण से तहकीकात करते हुए लिखा है कि बीजेपी ने पुलिस थाने में गुहा के एक बयान को लेकर उनके खिलाफ शिकायत दर्ज करवाई थी. गुहा ने बयान दिया था कि गौरी लंकेश की हत्या में दक्षिणपंथी अतिवादियों का हाथ है. बीजेपी और आरएसएस ने गुहा के इस बयान की पुरजोर निंदा की. शायद, सूबे की सरकार ने बीजेपी की इस निंदा के जवाब में एक तरीका ढूंढा. उसने गुहा को राज्योत्सव अवॉर्ड से नवाजा.

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माहौल के बेहतर इस्तेमाल की यह सियासी चाल भी हो सकती है. लेकिन गुहा ने कांग्रेस की भी आलोचना की है. गुहा ने कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी को अक्सर अपने निशाने पर लिया है और उनकी आलोचना की है. उन्होंने बार-बार कहा है कि ‘इस परिवार की पकड़’ छूटनी चाहिए. वे जिस बेलागपन से बीजेपी की आलोचना करते हैं उसी बेलागपन के साथ कांग्रेस की भी.

दरअसल अपनी बेलाग टिपण्णियों के मामले में वे हद दर्जे के ईमानदार हैं और ठीक इसी कारण उनके बहुत सारे दुश्मन बने हैं. विवादों के घेरे में आने के मामले में उनकी तुलना यू.आर अनंतमूर्ति से की जा सकती है. अगर बीजेपी ने सोचा कि एक मामला चला देने से वे डर जाएंगे तो उसने गुहा को समझने में एक तरह से गलती की. पिछले हफ्ते बंगलुरु लिटरेचर फेस्टिवल में मुझे दो व्यक्ति उस मंच की ओर जाते दिखे जहां से गुहा अपना व्याख्यान देने वाले थे. मैंने सुना दोनों आपस में बात कर रहे थे कि ‘क्या गुहा के भाषण में चमक होगी’. हां, बिल्कुल होगी!

गुहा को इस बहस से कोई फर्क नहीं पड़ता

गुहा कन्नड़ नहीं जानते तो भी उन्हें राज्योत्सव अवॉर्ड मिला— यह बहस बड़ी मामूली किस्म की है. क्या इससे गुहा को कोई फर्क पड़ता है? ना, उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. शायद उन्हें इस बात की खुशी हो रही हो कि कुछ लोग सोशल मीडिया पर इस मसले पर उनका विरोध कर रहे हैं तो कुछ लोग उनकी तरफदारी में तर्क दे रहे हैं. लेकिन कन्नड़ भाषी उन लाखों लोगों के लिए जो उनके कॉलम को पढ़ते हैं और उनके विचारों से सहमत होते हैं— यह वक्त एक उत्सव मनाने का है.

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गुहा ने कर्नाटक के झंडे के मसले पर ट्वीट किया था. वह ट्वीट संक्षेप में मसले पर सारी बात कह देता है. गुहा का ट्वीट था- 'कर्नाटक का झंडा सरकारी नहीं है तो भी उसका इस्तेमाल खूब होता है और सराहा जाता है. नागरिकता का रिश्ता सबसे पहले नागरिक से है, उसके बाद ही सरकारों से.'

राज्योत्सव अवॉर्ड कर्नाटक राज्य के प्रति महत्वपूर्ण योगदान करने के लिए दिया जाता है. अवॉर्ड को देने की कसौटी यह नहीं है कि आप कन्नड़ जानते हैं या नहीं और अगर कर्नाटक के प्रति योगदान करने की कसौटी पर परखें तो रामचंद्र गुहा सौ टंच खरा सोना उतरेंगे. मैं उन्हें मुबारकबाद देती हूं!

(लेखिका कन्नड़ भाषा की कवि, पटकथा लेखक और पत्रकार हैं)

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