In association with
S M L

गुरमीत राम रहीम केस: देश को धर्म और धर्मगुरुओं में फर्क समझना होगा

धार्मिक और आध्यात्मिक गुरु केवल एक खास मजहब या धर्म के नुमाइंदे होते हैं. वो खुद धर्म नहीं हो सकते.

Milind Deora Milind Deora Updated On: Sep 09, 2017 03:16 PM IST

0
गुरमीत राम रहीम केस: देश को धर्म और धर्मगुरुओं में फर्क समझना होगा

पिछले कुछ दिन भारत की न्याय व्यवस्था के लिए ऐतिहासिक रहे हैं. पहले तो सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिपल तलाक पर पाबंदी लगाई. फिर सर्वोच्च अदालत ने निजता को मूल अधिकार मानने का फैसला सुनाया. ये इतने शानदार फैसले रहे कि देश ने दिल खोलकर इनका स्वागत किया है.

तीसरा बड़ा अदालती फैसला तथाकथित बाबा गुरमीत राम रहीम को मुजरिम ठहराने और सजा सुनाने का था. लेकिन अदालत के इस फैसले का गुरमीत राम रहीम के अनुयायियों ने बड़ा हिंसक विरोध किया. हालात इतने बिगड़े कि दिल्ली-एनसीआर के 11 जिलों में धारा 144 लगानी पड़ी.

पिछले हफ्ते समान नागरिक संहिता पर मैंने एक लेख लिखा था. फ़र्स्टपोस्ट पर छपे इस लेख में मैंने कहा था कि देश में सरकार और धर्म के मेल-जोल को रोकना होगा. दोनों को अलग-अलग रखना होगा.

धर्मगुरुओं को राजनेताओं का बढ़ावा खतरनाक

गुरमीत राम रहीम को सजा सुनाने पर हुई हिंसा ने मेरी बात को सही साबित किया है. राजनीति और धर्म का घालमेल कितना खतरनाक हो सकता है, ये बात हरियाणा में हुई हिंसा ने दिखा दी है. जब भी राजनेता ऐसे धर्मगुरुओं को बढ़ावा देते हैं, तो नतीजे खतरनाक ही होते हैं. फिर सरकार की शह पाने वाले ऐसे बाबाओं के अनुयायी इसी तरह उत्पात मचाते हैं. कानून को अपने हाथ में लेते हैं. राम रहीम के मामले में उसके भक्तों ने ऐसा ही तो किया.

ये भी पढ़ें: अब रिहाई मिली तो...: किस्सा 'बाबा', 'बराला' और 'तोते' का

मेरे हिसाब से धर्मगुरुओं का मामला कुछ ऐसा है जिसमें कोई भी खुद को खुदा के सबसे करीब होने का दावा करता है. हजारों-लाखों लोग उसकी बात पर यकीन करके उसके भक्त बन जाते हैं. इस लिहाज से कोई बड़ा खिलाड़ी या अभिनेता भी धर्मगुरु ही हो जाता है. उसके भी बहुत से फैन हो जाते हैं.

राम रहीम के समर्थकों ने सजा के फैसले के बाद बहुत हिंसा फैलाई. ये सब अंधभक्ति का नतीजा है.

राम रहीम के समर्थकों ने सजा के फैसले के बाद बहुत हिंसा फैलाई. ये सब अंधभक्ति का नतीजा है.

मगर मौजूदा हालात को देखते हुए हमें ऐसे ढोंगी धर्मगुरुओं और सच्चे संन्यासियों के बीच फर्क करना आना चाहिए.

धर्म, बाजार और कारोबार

जैसे कि दलाई लामा या बाबा रामदेव एक खास तरह की विचारधारा का प्रचार करते हैं. वो सादा जिंदगी बिताने पर जोर देते हैं. बाबा रामदेव तो योग और ध्यान करने की सलाह देते हैं. वो कहते हैं कि इससे आपको अंदरूनी ताकत और शांति महसूस होगी. रामदेव के बारे में अक्सर कहा जाता है कि वो अपनी लोकप्रियता को सामान बेचकर भुना रहे हैं. पर मुझे नहीं लगता कि इसमें कुछ भी गलत है.

ये भी पढ़ें: गुरमीत राम रहीम: खट्टर की नाकामी कोई पहली बार नहीं

अब बाबा रामदेव की जो भी कमियां हों, मगर उन्होंने अपने लिए एक मौका देखा और वो सदियों पुरानी परंपराओं को कारोबारी तरीके से भुना रहे हैं. आज की तारीख में रामदेव ने पश्चिमी कंपनियों के मुकाबले देसी प्रोडक्ट का बड़ा बाजार कायम कर लिया है. उन्होंने भारतीय चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद के लिए भी बाजार बनाया है. आज रामदेव की कंपनी दुनिया की बड़ी और ताकतवर कंपनियों से मुकाबला कर रही है.

अच्छा हो कि दलाई लामा भी खाने-पीने के सामान का कारोबार शुरू कर दें. क्योंकि स्वस्थ शरीर के लिए दलाई लामा अक्सर खास तरह के खान-पान की सलाह देते हैं. वो लोगों को दिमागी और दिली सुकून का संदेश भी देते हैं. ऐसे में अगर वो अपने विचारों के आधार पर कारोबार करते हैं, तो इसमें गलत क्या है? हमें इस आधार पर इन धर्मगुरुओं के बारे में राय नहीं कायम करनी चाहिए. अगर वो ईमानदार और पारदर्शी तरीके से कारोबार कर रहे हैं, तो इसमें कुछ भी गलत नहीं.

भगवान के बीच की कड़ी और भगवान में फर्क

हमें ऐसे धर्मगुरुओं को नफरत से नहीं देखना चाहिए. हमें तो ऐसे बाबाओं के खिलाफ जागरूकता फैलानी चाहिए जो खुद को खुदा बताने लगते हैं. वो बीमारियों के इलाज का दावा करने लगते हैं. वो अपनी ताकत से लोगों की किस्मत बदलने के दावे करने लगते हैं. ऐसे दावों के बूते पर वो ढेर सारी दौलत जमा कर लेते हैं. वो शहाना जिंदगी जीने लगते हैं. इसके लिए वो हजारों मासूम लोगों को ठगते हैं.

ये भी पढ़ें: गुरमीत राम रहीम की रहस्यमयी दुनिया में कौन है 'पप्पी' और 'हनू'

ऐसे बाबा सबसे पहले दैवीय ताकत होने के दावे करते हैं. पुजारियों या पंडितों के बरक्स ये बाबा खुद को भगवान बताने लगते हैं. वहीं पुजारी या पंडित तो सिर्फ पूजा कराते हैं वो भगवान और इंसान के बीच की कड़ी भर होते हैं. मगर गुरमीत राम रहीम जैसे लोग तो खुद को ही भगवान बताने लगते हैं. ऐसे बाबा चाहते हैं कि भक्त उनकी पूजा करें. वो अपने नाम पर एक धर्म चलाने के दावे करने लगते हैं. सच तो ये है कि ऐसे बाबा केवल ठग होते हैं. वो आम लोगों की बेबसी का फायदा उठाकर अपना उल्लू सीधा करते हैं. पैसे कमाते हैं.

धार्मिक और आध्यात्मिक गुरू केवल एक खास मजहब या धर्म के नुमाइंदे होते हैं. वो खुद धर्म नहीं हो सकते.

धार्मिक और आध्यात्मिक गुरू केवल एक खास मजहब या धर्म के नुमाइंदे होते हैं. वो खुद धर्म नहीं हो सकते.

कोई धर्मगुरु खुद धर्म नहीं हो सकता

धार्मिक और आध्यात्मिक गुरू केवल एक खास मजहब या धर्म के नुमाइंदे होते हैं. वो खुद धर्म नहीं हो सकते. जैसे दलाई लामा सिर्फ एक धर्मगुरु नहीं हैं. आपको उनका मुरीद बनने के लिए बौद्ध धर्म अपनाना जरूरी नहीं. उनके विचारों से बहुत से लोगों का भला होता है. हर धर्म के लोग उनका सम्मान करते हैं. वैसे बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो दलाई लामा के विचारों से असहमत हैं. ये लोग अपना तर्क सामने रख सकते हैं. उन्हें इसकी पूरी आजादी है.

अब दूसरी तरफ गुरमीत राम रहीम जैसे ढोंगी हैं. जिनकी फिल्म मैसेंजर ऑफ गॉड लोगों को ये यकीन दिला रही थी कि जो उनके भक्त हैं वो उन्हें भगवान मानते हैं, इसलिए वो भगवान हैं. गुरमीत राम रहीम खुद को देवता बताकर लोगों की मुश्किलें दूर करने के दावे करता है.

ये भी पढ़ें: राम रहीम: समाज में गैरबराबरी और भेदभाव से पैदा होते हैं ये बाबा

किसी नास्तिक से पूछेंगे तो वो हर धर्म को बेवकूफाना बताएगा. वो बाबाओं को धार्मिक आस्थाओं का प्रतीक बताएगा. लेकिन ढोंगी बाबाओं के अनुयायियों के भी ये पता होना चाहिए कि खुद को देवता बताने वाले जो लोग हैं असल में वो झूठे हैं. वो या तो इंसान हैं या फिर शैतान.

कानून या संविधान के जरिए हम ऐसे ढोंगी बाबाओं पर शायद ही लगाम लगा पाएं. हां, वो अपराध करेंगे तो जरूर उनके खिलाफ एक्शन होगा. जैसे कि राम रहीम के साथ हुआ. लेकिन एक समाज के तौर पर हमें सोचना होगा कि कैसे ये ढोंगी, इतने ताकतवर बन जाते हैं.

(लेखक पूर्व सांसद हैं और केंद्रीय संचार व आईटी और जहाजरानी व बंदरगाह मंत्री भी रह चुके हैं)

0

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
जापानी लक्ज़री ब्रांड Lexus की LS500H भारत में लॉन्च

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi