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अयोध्या विवाद: सुप्रीम कोर्ट की सलाह पर कौन करेगा पहल?

पिछले तीन दशक से अयोध्या विवाद चल रहा है और फिलहाल सुलह की कोई सूरत नजर नहीं आ रही है

Updated On: Mar 22, 2017 09:38 AM IST

Sanjay Singh

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अयोध्या विवाद: सुप्रीम कोर्ट की सलाह पर कौन करेगा पहल?

हर साल अयोध्या आने वाले हजारों तीर्थयात्री यह सोचते हुए अपने घर लौटते हैं कि क्या उनके जीते-जी कभी रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद सुलझ पायेगा, क्या कभी एक भव्य राममंदिर बन पायेगा.

अभी की या कहें कि 6 दिसंबर 1992 के बाद से क्या स्थिति चली आ रही है? इसी तारीख को बाबरी मस्जिद विध्वंस का अफसोसनाक वाकया पेश आया.

संघ-परिवार और हिन्दुत्व ब्रिगेड बाबरी मस्जिद को विवादित ढांचा कहते आये हैं. जिस जगह के बारे में मान्यता है कि वहां भगवान राम का जन्म हुआ था अब उस जगह एक कामचलाऊ किस्म का मंदिर है और उसमें रामलला (भगवान राम का बालरुप) की मूर्ति प्रतिष्ठित है.

अदालत का जवाब आना बाकी

यह जगह अब सुरक्षा बलों की कड़ी देखरेख में है और यहां होने वाली हर हरकत पर अदालत निगरानी रखती है. लेकिन यह बात भी सच है कि अब यहां से रामलला की मूर्ति हटायी नहीं जा सकती.

अदालत से अब बस एक ही सवाल का उत्तर आना बाकी है कि क्या तमाम कर्मकांडों को पूरा करते हुए बड़ी-बड़ी शिलाओं और सीमेंट-सुर्खी से बना कोई मंदिर उस जगह पर बन सकता है या नहीं.

एक प्रश्न यह भी है कि अगर ऐसा मंदिर बनता है तो फिर बाबरी मस्जिद का किस जगह पर पुनर्निमाण हो या इस मस्जिद को कौन सी जगह दी जाए.

मामला आस्था का है और फैसला देश की सर्वोच्च अदालत को सुनाना है. चूंकि मामला कानून का कम और आस्था का ज्यादा है इसलिए दोनों समुदायों का रुख कुछ इस कदर अड़ियल है कि समाधान की बातचीत आसानी से नहीं हो सकती.

कानून की राह पर आस्था का सवाल

Ayodhya

आस्था का सवाल कानून की राह पकड़े ले तो मामला जटिल हो जाता है और एकबारगी कोर्ट भी दुविधा की हालत में पड़ जाता है.

सुप्रीम कोर्ट के हाल के मशविरे से यही दुविधा झांक रही है. बीजेपी के सांसद सुब्रमण्यन स्वामी ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगायी थी कि विवाद का निपटारा जल्दी से जल्दी किया जाय.

इस पर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस जेएस खेहर ने कहा कि अच्छा होगा, अगर मामला कोर्ट के बाहर ही सुलझा लिया जाय.

उन्होंने यह भी कहा कि दोनों समुदाय बातचीत के जरिए किसी समाधान तक पहुंच सकें, इसके लिए वे अपनी सेवा देने को तैयार हैं.  

हालांकि सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस की बात का राजनीति के अखाड़े में चल रहे घटनाक्रम से कोई लेना-देना नहीं है लेकिन संयोग ऐसा है कि कोर्ट की बात के बहाने दोनों पक्षों के बीच राममंदिर का मुद्दा नये सिरे से गर्मा गया है.

तीन दशक से चल रही है लड़ाई

जरा मौजूदा सियासी हालत पर गौर कीजिए. केंद्र और राज्य (यूपी) दोनों ही जगह बीजेपी की सरकार है और यह पार्टी बीते तीन दशक से अयोध्या के राममंदिर की लड़ाई लड़ रही है.

बीजेपी को केंद्र में भारी बहुमत हासिल है और अब यूपी विधानसभा के लिए भी उसे भारी जनादेश मिला है.

1990 के अक्तूबर महीने में लालकृष्ण आडवाणी की राम रथयात्रा सोमनाथ से शुरु हुई तो इसका आयोजन नरेन्द्र मोदी ने किया था.

अब वही नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री हैं. योगी आदित्यनाथ राममंदिर निर्माण के कट्टर समर्थक रहे हैं और अब वे यूपी के मुख्यमंत्री हैं.

योगी आदित्यनाथ अब भी गोरखनाथ पीठ के महंत हैं और गोरखनाथ पीठ हिन्दू-धर्म की एक ऐसी धारा की नुमाइंदगी करता है जिसके महंथ लगातार अयोध्या आंदोलन के भागीदार रहे हैं.

अयोध्या में चमत्कार का असर

Ayodhya

दरअसल 1949 के दिसंबर में अयोध्या में रामचरितमानस का एक पाठ चल रहा था कि इसी बीच रामलला की मूर्ति बाबरी-मस्जिद के अंदर चुपके से रख दी गई या कहें कि चमत्कारिक ढंग से प्रकट हुई.

रामचरितमानस के इस पाठ का आयोजन गोरखनाथ पीठ के महंत दिग्विजयनाथ ने करवाया था.

उनके उत्तराधिकारी महंथ अवैद्यनाथ ने भी यह सिलसिला पूरे दमखम के साथ जारी रखा. योगी आदित्यनाथ गोरखपुर के गोरखनाथ मंदिर में अवैद्यनाथ के ही उत्तराधिकारी हैं.

अयोध्या में राममंदिर बनाने के हिमायतियों के लिए इससे बेहतर स्थिति नहीं हो सकती. बीजेपी अभी तक इसी रुख पर कायम है कि भव्य राममंदिर का निर्माण आस्था का मामला है.

संविधान के दायरे में होगी सुलह

पार्टी ने राममंदिर निर्माण के लिए प्रशासन या कानून का रास्ता अपनाने से अपने को अलग रखा है.

यहां तक कि आज भी अमित शाह सहित पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का यही कहना है कि मामले में सुलह का रास्ता संविधान के दायरे में रहते हुए ढूंढ़ा जायेगा.

यूपी चुनाव से पहले पार्टी ने अपना दृष्टिपत्र जारी किया तो उसमें भी यही बात कही गई.

राम रथयात्रा के असली महारथी लालकृष्ण आडवाणी कहा करते थे कि 'अयोध्या के सवाल ने देश के पूरे इतिहास को बदल दिया है.'

और, सचमुच ऐसा ही हुआ. अयोध्या के मुद्दे के दम पर ही महज दो सांसदों वाली पार्टी बीजेपी 1984 में 85 सांसदों के साथ लोकसभा में पहुंची (वीपी सिंह की सरकार को समर्थन दिया) और 1996 में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी.

गोरखनाथ मंदिर के भगवा वस्त्रधारी महंथ का यूपी के मुख्यमंत्री की गद्दी पर बैठना भारतीय राजनीति के इतिहास का एक और निर्णायक लम्हा साबित हो सकता है.

कौन कराएगा सुलह 

चूंकि मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक कदम आगे बढ़कर अपनी बात सबके सामने रख दी है तो सवाल यह उठता है कि क्या सूबे (यूपी) की सरकार या फिर केंद्र की सरकार किसी ऐसे व्यक्ति या समिति को नियुक्त करेगी जो दोनों समुदाय के बीच मसले पर बातचीत करवाये?

बाबरी मस्जिद एक्शन कमिटी के जफरयाब जिलानी की तरफ से चीफ जस्टिस खेहर की बात पर आयी प्रतिक्रिया सकारात्मक नहीं है.

2010 के सितंबर में इलाहाबाद हाईकोर्ट की तीन जजों की बेंच ने फैसला दिया कि 2.77 एकड़ की विवादित जमीन तीन हिस्सों में बांट दी जाय.

जिस जगह पर रामलला की मूर्ति प्रतिष्ठित है वह रामलला विराजमान की नुमाइंदगी करने वाले पक्ष को दी जाय, सीता की रसोई और राम चबूतरा की जमीन निर्मोही अखाड़ा को मिले और शेष जमीन सुन्नी वक्फ बोर्ड को दी जाय.

सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले पर स्थगन लगा दिया. केंद्र सरकार ने राम जन्मभूमि बाबरी-मस्जिद वाली जगह से लगती 67 एकड़ जमीन जुटायी है लेकिन सुप्रीम कोर्ट की तरफ से इस जमीन पर किसी किस्म की धार्मिक गतिविधि की मनाही है.

खुदाई में मंदिर का अवशेष मिला

Babri

हाईकोर्ट के आदेश पर आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) ने 2003 में विवादित स्थल पर बड़े पैमाने पर खुदाई की थी.

एएसआई ने खुदाई के आधार पर निष्कर्ष निकाला कि बाबरी मस्जिद के बनने से पहले इस जगह पर कोई मंदिरनुमा संरचना मौजूद थी. एएसआई के निष्कर्ष का जिक्र हाईकोर्ट के फैसले में आया है.

सुप्रीम कोर्ट का यह कहना कि मामले को कोर्ट के दायरे से बाहर बातचीत के जरिए सुलझा लिया जाय स्वागतयोग्य कदम तो है लेकिन इससे बहुत उम्मीद नहीं बांधी जा सकती.

ऐसी कोशिशें पहले भी हुई हैं लेकिन बेनतीजा रहीं. 1990 के नवंबर में तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने पीएमओ के एक अधिकारी की अध्यक्षता में समिति बनायी, हिन्दू और मुस्लिम समुदाय के लोगों को आमंत्रित किया कि वे मसले पर आपस में बातचीत करें और अपनी बात के पक्ष में एक-दूसरे के सामने सबूत पेश करें.

नहीं बढ़ सकी बात

लेकिन चंद्रशेखर की सरकार इतने कम दिनों तक चली कि बात आगे ना बढ़ सकी.

चंद्रशेखर के बाद प्रधानमंत्री के रुप में पीवी नरसिम्हाराव ने भी प्रयास किए कि मसले पर दोनों समुदायों के बीच बातचीत का कोई तरीका निकले लेकिन उन्हीं के शासन के समय बाबरी मस्जिद का विध्वंस हुआ.

अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में उप-प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने दोनों समुदाय के नेताओं से कुछ अनौपचारिक बातचीत चलायी और उस वक्त उम्मीद बंधी थी कि कोई समाधान निकल आयेगा लेकिन इसी बीच 2004 में सरकार बदल गई.

इसके बाद से जोर कोर्ट के रास्ते समाधान निकालने पर रहा है लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने गेंद फिर से पुरानी जगह पर डालते हुए कम से कम सरकार से सुझाव के तौर पर इतना तो कहा ही है कि वह मसले का हल बातचीत के जरिए निकाले.

दिलचस्प यह है कि सुप्रीम कोर्ट की सलाह पर सरकार में आगे की पांत के लोग मुंह खोलने को तैयार नहीं.

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