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अयोध्या विवाद: कितना व्यावहारिक होगा बातचीत से रास्ता निकालना?

फैसला अगर हिंदुओं के खिलाफ दिया जाता है तो क्या वह मान जाएंगे ? तब इस विवाद के और बड़े स्तर पर फैलने की आशंका है

Updated On: Mar 22, 2017 08:12 AM IST

Akshaya Mishra

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अयोध्या विवाद: कितना व्यावहारिक होगा बातचीत से रास्ता निकालना?

क्या अदालतें सिर्फ सबूतों के आधार पर मुकदमों का फैसला नहीं करती हैं? इस सवाल का जवाब 'हां' में है. लेकिन तब क्या, अगर सबूत, विश्वास, यकीन और विवादास्पद ऐतिहासिक प्रमाणों से इतर न हों ? सुप्रीम कोर्ट ने राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद पर दोनों पक्षों को आपसी सहमति से मामला सुलझाने की सलाह दी है जो तर्कपूर्ण है. क्योंकि इस मामले में किसी भी तरह के प्रमाण आधारित फैसले तक पहुंचना जहां कठिन है. वहीं इस तरह का कोई भी फैसला भविष्य में ऐसे मुकदमेबाजी की शुरुआत करेगा.

भारत के चीफ जस्टिस जेएस खेहर जो सुप्रीम कोर्ट के तीन सदस्यीय बेंच का नेतृत्व कर रहे हैं उन्होंने कहा कि ये मुद्दा धर्म और आस्था से जुड़ा हुआ है. लिहाजा विवाद से जुड़े दोनों पक्ष इसे आपसी बातचीत के जरिए सुलझाएं तो ज्यादा बेहतर होगा. इसके बाद भी अगर विवाद का कोई हल नहीं निकलता है तब अदालत इस मामले में हस्तक्षेप करेगी.

चीफ जस्टिस जेएस खेहर बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी की अपील पर सुनवाई कर रहे थे. सुप्रीम कोर्ट की तरफ से बातचीत की पेशकश का कई लोगों ने स्वागत किया है.

ram mandir

कोर्ट की पेशकश से उत्साहित नहीं

अब तक सब ठीक है. लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या इतने लंबे समय से चला आ रहा विवाद जो अब तक सांप्रदायिक रंग में रंगा जा चुका है वह बातचीत से भी सुलझ सकता है ? वक्फ बोर्ड के जफरयाब जिलानी कोर्ट की पेशकश से उत्साहित नहीं हैं. या तो उन्हें सबूतों के आधार पर पूरी तरह अपने पक्ष में फैसला आने का भरोसा है. या फिर उनका मानना है कि बातचीत से किसी फैसले पर पहुंचने पर भी ये फैसला सभी को मान्य नहीं हो सकता है.

न्यूज़ 18 से बातचीत करते हुए रामलला के काउंसल, रंजना अग्निहोत्री ने भी इस विवाद को सुलझाने में सुप्रीम कोर्ट की बातचीत की पेशकश को खारिज कर दिया. उन्होंने कहा कि, 'किसी एक पक्ष में फैसला या फिर कोई विधेयक ही इस विवाद का निपटारा कर सकता है.'

ऐसा नहीं है कि इस तरह की कोशिशें पहले नहीं हुई हों. लेकिन इससे न ही कोई नतीजा निकल पाया और न ही आगे का रास्ता निकल सका. 2016 के मध्य में ऑल इंडिया अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि ने इस मामले के सबसे पुराने वादी, हाशिम अंसारी से मुलाकात की थी. तब दोनों ही आपस में बातचीत कर इस समस्या का हल निकालने पर रजामंद हुए थे. लेकिन इसी बीच अंसारी इस दुनिया को अलविदा कह गए और बातचीत से इस विवाद को हल करने का फॉर्मूला भी अधर में लटक गया.

बराबर हिस्सों में बांट दिया

हालांकि वर्ष 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जो फैसला सुनाया था सैद्धांतिक तौर पर वो इस विवाद का सबसे बेहतर समाधान हो सकता था. इस टाइटल सूट की सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने तब बतौर निष्कर्ष कहा था कि 2.77 एकड़ जमीन के पट्टे के हिंदू और मुसलमान दोनों पक्ष हिस्सेदार हैं. लिहाजा बेंच ने जमीन के इस हिस्से को निर्मोही अखाड़ा, रामलला और सुन्नी वक्फ बोर्ड के बीच बराबर हिस्सों में बांट दिया.

इस फैसले में यह भी बताया गया कि जिस गुंबद के बीच रामलला की मूर्ति रखी हुई है वही स्थान भगवान राम की जन्मस्थली भी है. कोर्ट ने इसे हिंदुओं के धर्म और आस्था के आधार पर तब सही ठहराया था लेकिन इस फैसले से असंतुष्ट होकर दोनों पक्षों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया.

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सवाल उठता है कि जब दोनों पक्ष स्पष्ट फैसला चाहते हैं तो फिर बातचीत के जरिए ये विवाद कैसे निपटेगा? यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में बातचीत, चाहे वो जितनी सही हो, उससे भी इस विवाद का हल नहीं निकल सकता.

सांप्रदायिक तनाव को पनपने से रोकने के अच्छे मकसद से भी अगर दोनों पक्षों को ये जताया जा रहा है कि वो खुद को छला हुआ नहीं महसूस करें तो भी यह फैसला कारगर साबित नहीं होगा. जहां तक बात कोर्ट के स्पष्ट फैसले की है तो यह सांप्रदायिक तनाव बढ़ने के जोखिम से भरा हुआ है.

विवाद बड़े स्तर पर फैल जाएगा

दरअसल जो साक्ष्य मौजूद हैं उन्हें लेकर ही समस्या है. मौजूद साक्ष्य ही कोर्ट को किसी नतीजे पर पहुंचने नहीं दे रहे हैं. सवाल उठता है कि अगर फैसला हिंदुओं के खिलाफ दिया जाता है तो क्या वह मान जाएंगे ? जरा कल्पना कीजिए कि तब यह विवाद कितने बड़े स्तर पर फैल जाएगा.

अब जबकि यूपी की सत्ता पर एक हिंदू हार्डलाइनर और राम मंदिर के प्रबल समर्थक योगी आदित्यनाथ जैसे नेता की ताजपोशी हुई है. और तो और जिन्हें सूबे का प्रचंड जनादेश भी मिला हुआ है. तो ऐसे हालात में स्थितियां और विस्फोटक हो सकती हैं.

Yogi Adityanath

(फोटो: पीटीआई)

अगर ये केस मुसलमान हार जाते हैं तो हो सकता है ये तर्क दिया जाए कि कोर्ट ने बहुसंख्यक समुदाय के दबाव के आगे घुटने टेक दिए.

निष्कर्ष यही है कि मंदिर-मस्जिद विवाद काफी जटिल है. बातचीत के जरिए इस विवाद को सुलझाने की पहल भले कानों को सुनने में अच्छा लगे, लेकिन इससे कोई हल नहीं निकलने वाला है.

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