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भगवान’ हड़ताल तोड़ दो, आ जाओ,  25 लोग मर चुके हैं!

कहने को सरकार ने सेना, बीएसएफ, निजी डॉक्टरों और दूसरी चिकित्सा पद्धतियों के डॉक्टरों की सहायता लेने का दावा किया है लेकिन निजी डॉक्टरों ने भी अपने हाथ खड़े कर दिए हैं

Updated On: Nov 12, 2017 10:13 AM IST

Mahendra Saini
स्वतंत्र पत्रकार

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भगवान’ हड़ताल तोड़ दो, आ जाओ,  25 लोग मर चुके हैं!

डॉक्टर सिर्फ डॉक्टर नहीं होते. एक मरीज और उसके परिजनों के लिए डॉक्टर भगवान सरीखा होता है. जिंदगी और मौत के बीच जंग लड़ रहे लोगों के लिए भगवान की दुआ के बाद डॉक्टर की दवा का ही सहारा होता है. आधी रात में भी लोग जब डॉक्टर के पास पहुंचते हैं तब भी उन्हे निराश नहीं होना पड़ता. लेकिन राजस्थान में आज हालात कुछ और ही बन चुके हैं. 

पिछले 6 दिन से राजस्थान में भगवान यानी डॉक्टर हड़ताल पर हैं. 9 हजार से ज्यादा सरकारी डॉक्टरों के बाद अब रेजीडेंट डॉक्टर भी हड़ताल पर चले गए हैं. राजस्थान की चिकित्सा व्यवस्था बुरी तरह चरमरा चुकी है. देश के सबसे बड़े राज्य की पौने सात करोड़ जनसंख्या बेहाल और परेशान है. 

बताया जा रहा है कि 25 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं. सैकड़ों जरूरी ऑपरेशन टाले जा चुके हैं. सरकारी अस्पतालों में भर्ती मरीजों को जबरन छुट्टी दी जा रही है. सीएचसी-पीएचसी सभी के बाहर मरीज इलाज की आस में पड़े हैं लेकिन डॉक्टर हैं कि मनाने की हजार कोशिशों के बावजूद इलाज के लिए तैयार नहीं हो रहे हैं. 

सख्त हुई सरकार, हठी हुए डॉक्टर

हड़ताली डॉक्टरों की हठ टूटती न देख राज्य सरकार ने राजस्थान आवश्यक सेवा अधिनियम (रेस्मा) लागू कर दिया है. इसके तहत अब तक लगभग 12 डॉक्टरों को हिरासत में भी लिया जा चुका है. सरकार ने गिरफ्तारी के लिए पुलिस को सेवारत चिकित्सक संघ के नेताओं की लिस्ट थमा दी है. रेस्मा के डर से अधिकतर डॉक्टर नेता अंडरग्राउंड हो चुके हैं. जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर और श्रीगंगानगर जैसे सीमावर्ती जिलों के सिविल अस्पतालों की ओपीडी में बीएसएफ और सेना के डॉक्टरों को लगाना पड़ा है. 

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तस्वीर: पीटीआई

सरकार और हड़ताली डॉक्टरों के बीच आरोप प्रत्यारोप का सिलसिला थम नहीं रहा है. चिकित्सा मंत्री कालीचरण सराफ दावा कर रहे हैं कि डॉक्टरों को मनाने की पूरी कोशिश की गई लेकिन वे राजनीतिक पैंतरेबाजी पर उतर आए हैं. इसलिए अब उनसे सख्ती से निबटा जाएगा. सराफ ने कहा कि वार्ता के दरवाजे खुले हैं लेकिन ब्लैकमेलिंग नहीं सही जाएगी. 

चिकित्सा मंत्री ने हड़तालियों को 10 नवंबर शाम तक काम पर लौट आने का अल्टीमेटम दिया था. इसके बाद सरकार ने दावा किया कि 60 फीसदी डॉक्टर काम पर लौट आए हैं. दूसरी ओर, हड़ताल पर गए सेवारत चिकित्सक संघ ने दावा किया कि अभी भी 99% डॉक्टर छुट्टी पर हैं और मांगें माने जाने तक कोई काम पर नहीं लौटेगा. 

हड़ताल पर हाईकोर्ट भी सख्त 

दूसरी तरफ, राजस्थान के बिगड़ते हालात पर हाईकोर्ट भी सख्त हो चुका है. हाईकोर्ट ने सरकार को स्पष्ट निर्देश दिए कि हड़तालियों को व्यक्तिगत नोटिस जारी किए जाएं. यही नहीं, अदालत ने 5 दिन के भीतर हड़ताली डॉक्टरों की लिस्ट, उनके वेतन-भत्तों और सुविधाओं की पूरी जानकारी भी तलब की है.

हालांकि, हाईकोर्ट ने डॉक्टरों पर वर्कलोड मानते हुए सरकार को ये भी कहा कि जो मांगें माने जाने लायक हैं, उन्हे पूरा किया जाए और हड़ताल के मामले में 2011 के एक पुराने आदेश के तहत पालना करवाई जाए. ये आदेश डॉक्टर अभिनव शर्मा की याचिका पर दिए गए. दिलचस्प बात ये है कि कोर्ट के वर्कलोड की बात कहने पर याचिकाकर्ता ने तर्क रखा कि सेना और पुलिस पर भी जबरदस्त वर्कलोड है तो क्या उन्हे भी हड़ताल पर चले जाना चाहिए. 

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हाईकोर्ट के रुख के बाद राजस्थान सरकार ने भी शनिवार को समाचार पत्रों एक सार्वजनिक नोटिस छपवाया. नोटिस के मार्फत हड़ताल को अवैधानिक करार दिया गया है. हाईकोर्ट के आदेश की अनुपालना में हड़ताली डॉक्टरों से फौरन ड्यूटी ज्वाइन करने को कहा गया है. 

अनसुलझे हैं कई सवाल

हड़ताल को लेकर बैठकों और चर्चाओं का दौर काफी पहले से ही चल रहा है. अब तक सरकार और हड़ताली डॉक्टरों के बीच 4 बैठकें हो चुकी हैं. लेकिन हालात संभलने के बजाए बिगड़ते ही जा रहे हैं. कोई समाधान नहीं निकल पा रहा है या सरकार की भाषा में कहें तो निकलने नहीं दिया जा रहा.

चिकित्सा मंत्री का आरोप है कि हड़ताली डॉक्टरों के नेता बने डॉ अजय चौधरी ने पार्टी विशेष के इशारे पर सहमति बनने में रोड़े अटकाए. मंत्रीजी डॉ चौधरी को कांग्रेसी साबित करने के लिए चुनाव में उनके टिकट मांगने और पिता के कांग्रेस से प्रधान होने की बात पर जोर देते हैं. 

सरकार की तरफ से ये भी कहा जा रहा है कि हड़ताली डॉक्टरों की तरफ से लगातार मांगें बढ़ाई जा रही हैं. कहा जा रहा है कि ग्रेड पे 10 हजार करने को छोड़कर बाकी सारी शुरुआती मांगें मंजूर कर ली गई थी. इसके बावजूद डॉक्टरों ने दूसरी बैठक में 6 मांगें रख दी. चौथी बैठक में तो इन मांगों की संख्या बढ़कर 33 जा पहुंची.  

चिकित्सा मंत्री ने तो डॉक्टरों के इस्तीफे दिए जाने को भी कोरा ढकोसला बताया. शुक्रवार को मीडिया के सामने लिफाफे और खाली कागज दिखाकर इन्हें हड़ताली डॉक्टरों की ओर से दिए जाने का दावा किया. दरअसल, हड़ताल के ऐलान के साथ ही सभी सरकारी सेवारत डॉक्टरों ने अपने इस्तीफे सौंपने का ऐलान भी किया था. 

वहीं, सेवारत चिकित्सक संघ के महासचिव डॉ दुर्गाशंकर सैनी का आरोप है कि सरकारी स्तर पर मिथ्या झूठ फैलाया जा रहा है. सैनी के अनुसार किसी के इशारे पर कोई एक शख्स कैसे 9 हजार से ज्यादा डॉक्टरों को हड़ताल पर उकसा सकता है. सैनी ने साफ कहा कि सरकार अगर मांगें मान लेती है तो एक ही पल में हड़ताल खत्म कर दी जाएगी. 

ये मांगें हैं मुश्किल 

हड़ताल के पीछे डॉक्टरों की कई मांगें हैं. ज्यादातर मांगों पर लगभग सहमति है लेकिन कुछ एक ऐसी हैं जिनकी वजह से गतिरोध नहीं टूट पा रहा है. इनमें मुख्य हैं-

चिकित्सा विभाग में अतिरिक्त निदेशक के रूप में राज्य प्रशासनिक सेवा के अफसर की तैनाती. डॉक्टरों का कहना है कि अब तक इस पद पर सीनियर डॉक्टर ही तैनात होते रहे हैं. इनका तर्क है कि नॉन मेडिकल अधिकारी चिकित्सा विभाग का निदेशक कैसे हो सकता है.  

सातवें वेतनमान की विसंगतियों को दूर करना, कैडर समान करना, ग्रेड पे बढ़ाना और डॉक्टरों से एक ही पारी में काम करवाने जैसी मांगें भी सरकार मानने से इनकार कर रही है. सरकार को आशंका है कि 10 हजार से भी कम सरकारी डॉक्टरों की व्यवस्था के साथ सिर्फ एक पारी से हालात विकट हो सकते हैं. 

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शहरों में फौरी राहत के बीच गांवों के हालात हैं बदतर 

कमी कहां रही या किसकी तरफ से रही, इसके पक्ष और विपक्ष में दोनों तरफ अपने-अपने तर्क हैं. हालांकि ये भी साफ है कि हड़ताल के अगले दिन आधी रात को चिकित्सा मंत्री के साथ वार्ता में मौखिक सहमति बन चुकी थी. लेकिन जब सरकार की तरफ से समझौता पत्र पर दस्तखत करने को कहा गया तो हड़ताली पक्ष पीछे हट गया. बाहर निकलकर हड़तालियों की तरफ से कहा गया कि सरकार लिखित में देने में आनाकानी कर रही है इसलिए वार्ता टूटी. 

कुछ ऐसा ही पहली वार्ता में हुआ. डॉक्टरों ने आरोप लगाया कि वे ऐसे मंत्री से वार्ता कर रहे हैं जिन्हे अपने मुखिया से मिलने में ही 4 दिन लग गए. जबकि चिकित्सा मंत्री ने आरोप लगाया कि सुबह तड़के तक नींद खराब करने के बाद पता चला कि वे उन लोगों से वार्ता कर रहे थे, जिनके पास फैसला ले पाने की ताकत ही नहीं थी. 

कहने को सरकार ने सेना, बीएसएफ, निजी डॉक्टरों और दूसरी चिकित्सा पद्धतियों के डॉक्टरों की सहायता लेने का दावा किया है लेकिन निजी डॉक्टरों ने भी अपने हाथ खड़े कर दिए हैं. कुछ एक अस्पतालों में सेना, बीएसएफ से मिल रही सहायता ऊंट के मुंह में जीरा ही साबित हो रही है. आयुष डॉक्टर भी संख्या में इतने कम हैं कि वे एलोपैथिक डॉक्टरों की कमी पूरी नहीं कर पा रहे हैं. 

राजस्थान में इस समय डेंगू, मलेरिया और दूसरी मौसमी बीमारियां कहर बरपा रही हैं. शहरों में तो फिर भी निजी अस्पतालों का कुछ सहारा है लेकिन गांवों के हालात का अंदाजा लगाने भर से सिहरन दौड़ जाती है. यही नहीं, लोगों को पोस्टमॉर्टम तक के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है. लेकिन अफसोस, न भगवान मानने को तैयार हैं और न सरकार ही अपने स्वामी (वोटर्स) की सुध लेने की बेचैनी दिखा पा रही है. 

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