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राजीव दीक्षित पुण्यतिथि विशेष: उदारीकरण के दौर में जिसने स्वदेशी का झंडा किया बुलंद

एक आंदोलन का नाम हैं राजीव दीक्षित जो आज भी लाखों दिलों में प्रेरणा के रूप में गतिमान है.

Kinshuk Praval Kinshuk Praval Updated On: Dec 01, 2017 04:48 PM IST

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राजीव दीक्षित पुण्यतिथि विशेष: उदारीकरण के दौर में जिसने स्वदेशी का झंडा किया बुलंद

आईआईटी से एमटेक करने वाला एक वैज्ञानिक देश के गांवों और कस्बों में भारत के स्वाभिमान को जगाने के लिये घूमता रहे और लोगों से स्वदेशी अपनाने के लिये अपील करे तो उसकी सोच को सलाम कीजिए. सवाल मत कीजिए. एक आंदोलन का नाम हैं राजीव दीक्षित जो आज भी लाखों दिलों में प्रेरणा के रूप में गतिमान है. खुद को केवल एक समाजिक कार्यकर्ता मानने वाले राजीव दीक्षित को अगर राष्ट्रवादी विचारक और प्रणेता कहा जाए तो भी उनके व्यक्तित्व को पूरी तरह से परिभाषित कर पाना कम ही होगा.

जिस देश में महान क्रांतिकारी सिर्फ रस्म अदायगी के लिये याद किये जाते रहे हों वहां राजीव दीक्षित जैसे एक गैर सियासी चेहरे पर सवाल उठने लाजिमी हैं. विचारों से व्यवस्था पर सवाल उठाने वाले को ‘छद्म’ ठहरा कर खारिज़ करना पुरानी सियासी फितरत है. राजीव दीक्षित भी इसी का शिकार हुए लेकिन वो दुनिया से जाते-जाते लाखों लोगों में एक नए भारत का सपना जरूर पैदा कर गए.

राजीव दीक्षित धारा के साथ नहीं बहे बल्कि उसे मोड़ने का प्रयास किया. इसी कोशिश में उन्होंने सच की लड़ाई में अपने जीवन के कई बहुमूल्य वर्षों की आहूति दी. यही वजह है कि आज उन्हें स्वदेशी आंदोलन और आयुर्वेद के नए युग का सूत्रधार माना जाता है. आज अगर स्वामी रामदेव की कंपनियां कामयाबी के शिखर पर है तो इसके पीछे राजीव दीक्षित के वो प्रयास है जिन्होंने गांव-गांव और कस्बों-कस्बों को आयुर्वेद और स्वदेशी से जोड़ा. स्वामी रामदेव के योग ने इसमें सोने पे सुहागा का काम किया. कई मंचों को दोनों ने साथ साझा किया जहां देश, राष्ट्रवाद, योग,स्वास्थ्य और आयुर्वेद को लेकर स्वामी रामदेव के साथ राजीव दीक्षित की जुगलबंदी दिखाई दी.

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स्वदेशी के समर्थक राजीव दीक्षित बहुराष्ट्रीय कंपनियों के अतिक्रमण के खिलाफ थे. उन्होंने कोका कोला, पेप्सी, यूनिलीवर और कोलगेट जैसी कंपनियों के खिलाफ लड़ाई लड़ी. शीतल पेय से होने वाले नुकसानों के बारे में लोगों को आगाह किया. वो न सिर्फ स्वदेशी संकल्पना के पैरोकार थे बल्कि विदेशी सामानों से स्वास्थ को होने वाले नुकासान को बताने की हिम्मत रखते थे. शायद उनकी यही हिम्मत ही उनके खिलाफ विरोध का दायरा बड़ा करती चली गई. लेकिन इन सबसे बेपरवाह राजीव दीक्षित विदेशी निवेश और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के खिलाफ स्वदेशी की अलख जगाने में जुटे रहे.

उन्होंने स्वदेशी जागरण मंच का नेतृत्व किया तो वो स्वाभिमान ट्रस्ट के सचिव भी बनाए गए. स्वदेशी के प्रति उनकी आस्था ही उनके उपदेशक व्यक्तित्व की पूर्णता थी. भारतीय आर्थिक नीति, संविधान और इतिहास पर गहरी पकड़ रखने वाले राजीव दीक्षित अपने बेबाक भाषणों की वजह से स्वदेशी के ब्रांड एम्बेसडर बन चुके थे.

उन्होंने टैक्स प्रणाली, कालाबाज़ारी और करप्शन पर अपने उपाय सुझाए. यहां तक कि उन्होंने स्विस बैंकों में जमा कालेधन को राष्ट्रीय संपत्ति घोषित करने का भी सुझाव दिया. उन्होंने भारत की न्यायपालिका और कानूनी व्यवस्था में समय और जरूरतों के हिसाब से बदलाव की वकालत की. राजीव ने गौ रक्षा और गौ सेवा के लिये देश भर में लोगों में जागरुकता फैलाई.

राजीव दीक्षित ने समाज के आखिरी पायदान के भारतीय से लेकर किसानों की खुदकुशी जैसी विषम समस्याओं पर अपने विचार रखे. राजीव दीक्षित ने भारतीय राष्ट्रवाद और इतिहास पर कई प्रेरक किताबें लिखीं. उनकी दूरदर्शिता उस नए भारत का उदय देखना चाहती थी जिसमें भारतीयता परमो धर्म: और स्वदेशी सोच हो.

राजीव दीक्षित के विचारों को लेकर सवाल भी उठते थे क्योंकि वो आर्थिक उदारीकरण, वैश्वीकरण और निजीकरण के पक्षधर नहीं थे. वो इसे आत्मघाती कदम मानते थे. एफडीआई का उन्होंने कभी समर्थन किया. लेकिन उन्होंने अपने विरोध का तर्क हमेशा सामने रखा. यहां तक कहा जाता है कि देश में पांच सौ और हज़ार के नोटों को बंद करने की उन्होंने ही सबसे पहले बात रखी थी. ये भी कहा जाता है कि देश से बाहर जमा कालेधन का अनुमानित आंकड़ा उन्होंने ही सबसे पहले लोगों को बताना शुरू किया था.

लेकिन सियासत की चालों से परे ये चेहरा स्वदेशी की मूल भावना जगाने के भगीरथी प्रयास में एक दिन वक्त से पहले सो गया. ये विडंबना ही है कि जिस दिन उनका जन्मदिवस है उसी दिन पुण्यतिथि भी.

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