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VVIP कल्चर के मोह में यूपी पुलिस ने तलवार दंपति को फंसाया?

इस दुखद कथानक ने जो मोड़ लिए उसके पीछे भारत की कुख्यात वीवीआईपी संस्कृति की भी बड़ी भूमिका है

Ajay Singh Ajay Singh Updated On: Oct 17, 2017 01:26 PM IST

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VVIP कल्चर के मोह में यूपी पुलिस ने तलवार दंपति को फंसाया?

आरुषि के माता-पिता राजेश और नूपुर तलवार डासना जेल से छूट गए हैं. संस्थाओं के जिस नागवार बरताव की वजह से उन्हें आरुषि-हेमराज हत्याकांड में साढ़े चार साल जेल में बिताने में पड़े, उसके बारे में बहुत कुछ लिखा गया है. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस दुखद कथानक ने जो मोड़ लिए उसके पीछे भारत की कुख्यात वीवीआईपी संस्कृति की भी बड़ी भूमिका है.

इस मामले ने शहरी हिंदुस्तानी जिंदगी के सबसे घिनौने रूप को बेपर्दा किया है. माता-पिता का अपने बच्चे से रिश्ता किसी समाज की बुनियाद होता है और इस मामले में इस बुनियाद पर ही चोट पड़ी है.

शहरी मध्यवर्ग और उससे लगा-बंधा घरेलू सहायक का संबंध भी अविश्वास और संदेह के घेरे में आया है क्योंकि आरुषि के साथ-साथ हेमराज की हत्या भी उसी रात हुई थी. तेज रफ्तार शहरी जिंदगी में हम अपने इर्द-गिर्द जो असुरक्षित माहौल कायम करते जा रहे हैं वह इस मामले से एकबारगी उजागर हो गया है.

मामले में मीडिया ने भी अपने रुख से जाहिर किया कि उसे तथ्य, निष्पक्षता और जिम्मेदारी की जगह अश्लील गप्प परोसने में ज्यादा रुचि है. न्यायपालिका भी पीछे नहीं रही और जज श्यामलाल ने बड़े कमजोर जान पड़ते परिस्थितिजन्य साक्ष्य के आधार पर आरुषि के माता-पिता को दोषी करार देकर कानून का माखौल उड़ाया.

Talwars acquitted

लेकिन मामले में जितना बेढब और फिसड्डी पुलिस-तंत्र साबित हुआ उतनी कोई और संस्था नहीं. मामले में गड़बड़-झाले की शुरुआत पहले दिन या कह लें तकरीबन उसी घड़ी हो गई थी जब आरुषि की लाश उसके बिस्तर पर मिली.

मामले की जांच कर रहे पुलिस के शीर्ष अधिकारियों से मैंने खुद बातचीत की थी और उनके साथ हुई कई दफे की बातचीत से मुझे पता चला कि गड़बड़झाला पहले ही दिन शुरू हो गया था. और जांच में लगे अधिकारी चाहे वे यूपी पुलिस के हों या सीबीआई के अपनी तरफ से हर वो व्याख्या पेश करने में लगे थे जिससे उनकी अपनी करतूत ढंक जाए.

आरुषि-हेमराज हत्याकांड के साथ सबसे बुनियादी समस्या यह थी कि 16 मई 2008 के उस नामुराद दिन यूपी पुलिस का सारा ध्यान इस बात पर लगा था कि नोएडा में सबकुछ चुपचाप और शांतिपूर्वक गुजर जाए क्योंकि उस दिन यूपी की पुलिस दो वीवीआईपी के दौरे को संभालने में लगी थी. जिस दिन आरुषि की लाश बरामद हुई उस दिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को नोएडा आना था.

सीपीएम के नेता हरकिशन सिंह सुरजीत की नोएडा अस्पताल में भर्ती थे और मनमोहन सिंह उनकी मिजाजपुर्सी के नाते आने वाले थे. दूसरा दौरा सूबे की मुख्यमंत्री मायावती का था. काम के बोझ तले दबी नोएडा पुलिस और उसके अफसरान के लिए इन दो वीवीआईपी का दौरा मौका-ए-वारदात की गहन खोज-बीन से कहीं ज्यादा अहम था. पुलिस को साफ जान पड़ रहा था कि मामला तो एकदम ही सुलझा हुआ है, सीधी सी बात यह है कि घरेलू सहायक हेमराज ने आरुषि की हत्या की है और घर से भाग निकला है.

manmohan singh

वीवीआईपी की आव-भगत की अपनी उत्सुकता में नोएडा की पुलिस को इस बात की कोई खास चिंता नहीं थी कि वह आरुषि के माता-पिता के बयान पर गौर फरमाएं और उसकी सच्चाई जानने के लिए सुराग ढूंढ़े. चौदह साल की एक लड़की का कत्ल उसके घर में और उसके बेड पर हुआ था लेकिन पुलिस ने तो मान रखा था कि दोषी हेमराज है सो उसने कत्ल की इस घटना के साथ सलूक कुछ इस तरह किया मानो यह आए दिन होने वाले अपराधों की तरह हो.

पुलिस ने सोचा कि वीवीआईपी अपने दौरे से लौट जायें तो मामले की तफ्तीश कर ली जायेगी. जाहिर है, पुलिस ने मौका दिया कि मां-बाप अपराध की जगह को धो-पोंछ दें, जितनी जल्दी हो सके आरुषि के शव का अंतिम-संस्कार कर दें ताकि मीडिया का ध्यान वहां से हट जाय. इस प्रक्रिया में पीड़ित की बेडशीट और कपड़े को एकत्र करने का काम ना हुआ जबकि ये अहम सबूत साबित हो सकते थे, पुलिस ने मान लिया था कि मामला एकदम सुलझा हुआ है और उसकी हर बात पहले से जाहिर है.

पुलिस को बस दिलचस्पी एक बात में थी कि जितनी जल्दी हो सके वहां से निकल लें और उसने यही किया भी भले ही हेमराज की लाश छत पर पड़ी रही और उसपर किसी की नजर तक ना गई. अगले दिन आरुषि के मां-बाप अंतिम संस्कार के लिए हरिद्वार थे तो एक भूतपूर्व पुलिस अधिकारी ने हेमराज की लाश टेरेस पर खोज निकाली. मामले ने अब एक ऐसा मोड़ ले लिया कि यूपी पुलिस के होश फाख्ता हो जाएं.

हेमराज की लाश मिलने के एक दिन बाद मैं आईजी(मेरठ जोन) गुरुदर्शन सिंह और एसएसपी (नोएडा) सतीश गणेश से नोएडा के गेस्ट हाउस में मिला था. मैंने जानना चाहा कि आखिर मौका-ए-वारदात की जांच इतनी ढुलमुल क्यों है? आरुषि के शरीर पर उसके गुप्तांग का स्राव लगा हुआ था और जाहिर सी बात थी कि इसकी जांच होनी चाहिए थी.

मैंने सतीश गणेश के साफ-साफ पूछा कि आपने मामले में रेप या शारीरिक प्रताड़ना के कोण से विचार किया है या नहीं. जो जवाब मिला उससे जाहिर हो गया कि जांच के काम में गलती दरअसल कहां हो रही है. सतीश गणेश ने मेरे सवाल को सुनकर बिना पलक झपकाए जवाब दिया, 'ऐसा करना जरूरी नहीं था. दिमाग असहनीय पीड़ा और आनंद के बीच फर्क नहीं कर सकता.'

दरअसल गणेश मुझे जो बता रहे थे उसका मतलब कुछ यों निकलेगा. आरुषि के दिमाग ने गला कटने से हुए असहनीय दर्द को समझने में भूल की और उसे 'आनंद' का एहसास समझ लिया जिसकी वजह से स्राव निकला. यह तो साफ नहीं हो सका कि गणेश ने यह निष्कर्ष किस वैज्ञानिक/ फोरेंसिक जर्नल के आधार पर निकाला लेकिन अगर ऐसा हो तब भी गुप्तांग के स्राव को फोरेंसिक जांच के लिए ना इकट्ठा करना अपने आप में एक अपराध ही है.

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मामले में पहले दिन से भारी गड़बड़ी दिख रही थी लेकिन जांच करने वाले अधिकारियों ने आरुषि के मां-बाप के कत्ल में शामिल होने की बात सामने रखी तो 1984 बैच के आईपीएस अधिकारी गुरुदर्शन सिंह ने इसे बड़ी आसानी से मान लिया. एक तो पुलिस ने जो गड़बड़ी की थी उसे ऐसा करके ढंका जा सकता था. दूसरे, मां-बाप खुद ही संदेह के घेरे में आ जाएं तो उनके लिए मामले को आगे ले जाना मुश्किल हो जाता.

ऐसे मामलों में पुलिस को खोज-बीन का सबसे सुरक्षित तरीका यह नजर आता है कि शक की सूई सीधे नजदीकी रिश्तेदारों की तरफ मोड़ दो और यूपी पुलिस ने इस कला में महारत हासिल कर रखी है. बतौर क्राइम-रिपोर्टर यूपी के अपने अनुभव के आधार पर मैं जानता हूं कि एक एडिशनल एसपी ने मां के कत्ल की बात जानकर हड़बड़ी में लौटे उसके बेटे को ही हत्या के इस मामले में फंसा दिया था.

जांच के काम में बरती गई ढिलाई को और ज्यादा तूल देते हुए गुरुदर्शन सिंह ने एक प्रेस-कांफ्रेस की और उसमें खोजबीन के जो ब्यौरे पेश किए उसमें सिलसिलेवार ढंग से गलतबयानी की गई. आगे की जांच के लिए मामला सीबीआई के हाथ में गया तो सचमुच बड़ी राहत महसूस हुई. उस वक्त तत्कालीन ज्वाइंट डायरेक्टर अरुण कुमार की अगुवाई में पहली बार इस मामले में पेशेवराना अंदाज में जांच हुई.

अरुण कुमार अपने पेशेवराना अंदाज और गहरी छानबीन के लिए जाने जाते हैं. उन्होंने निजी तौर पर जांच के काम की देखरेख की. आरुषि के मां-बाप और हेमराज के कुछ दोस्तों का नार्को टेस्ट हुआ. नतीजतन, उनकी टीम ने आरुषि के मां-बाप को निर्दोष माना. इस टीम ने अपना शक हेमराज के दोस्तों पर जाहिर किया और उन्हें अपनी गिरफ्त में लिया. लेकिन सीबीआई के आला अफसरान से अरुण कुमार की तकरार हो गई और मामले की जांच का काम उनके हाथ से वापस ले लिया गया. सीबीआई ने चूंकि आरोप तय नहीं किए थे सो अरुण कुमार की टीम ने जिन लोगों को शक के आधार पर गिरफ्तार किया था, उन्हें छोड़ दिया गया.

जांच का काम इसके बाद एक और बेहतरीन ऑफिसर जवीद अहमद को सौंपा गया. वे लखनऊ में सीबीआई के संयुक्त निदेशक थे. सबूतों की गहरी छान-बीन के बाद जवीद अहमद ने पाया कि मामला अब एक ऐसे सिरे पर पहुंच चुका है कि उसे और आगे नहीं बढ़ाया जा सकता. उन्होंने अपनी टीम को इस बात के लिए मनाया कि सीबीआई कोर्ट में अर्जी दायर करके मामले में क्लोजर रिपोर्ट लगाने की बात कही जाय.

यह एक चतुराई भरा कदम था जिसमें जिम्मेदारी आखिर को उस कोर्ट पर ही डाली जा रही थी जिसने सीबीआई को आरुषि के मां-बाप पर आरोप तय करने के लिए कहा था. इससे सीबीआई के इंवेस्टीगेटर्स (जांचकर्ताओं) को आसान रास्ता मिल गया, उन्होंने पूरे जोशो-खरोश से यूपी पुलिस की इस थ्योरी को मान लिया कि कत्ल में आरुषि के मां-बाप का हाथ है. सीबीआई ने इधर-उधर की अफवाह को बुनियादी बनाते हुए अपने सबूत सामने रखे जो जांच के पहले ही दिन से लचर हालत में थे.

इस जांच-कार्य की सबसे खराब बात ये रही कि सीबीआई ने जानते-बूझते मामले के बारे में 'लीक्स' के जरिए हवा उड़ाई. यह आरुषि के मां-बाप ही नहीं बल्कि खुद आरुषि और हेमराज के भी चरित्र पर कीचड़ उछालने का मामला था. जो लोग मामले की सच्चाई जानना चाहते थे यह उन्हें भटकाने वाली बात थी. मीडिया में तलवार परिवार को लेकर अफवाहों का बाजार गर्म हो गया जबकि इनका कत्ल की वारदात से कोई रिश्ता नहीं था.

सीबीआई कोर्ट मीडिया में चल रही कहानी से इस कदर प्रभावित हुआ कि उसने दोहरे हत्याकांड का एक काल्पनिक ब्यौरा गढ़ लिया और दोष की सिद्धि मान ली. अगर कानून की भाषा में कहें तो आरुषि-हेमराज हत्याकांड 'रेस ज्यूडिकेटा' का बिल्कुल किताबी उदाहरण है यानी एक ऐसा मामला जिसमें सुनवाई होने के पहले ही फैसले के बारे में पता होता है कि किसे दोषी ठहराया जाएगा?

Allahabad High Court

हालांकि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने न्यायपालिका की प्रतिष्ठा बहाल करने की कोशिश की है, सीबीआई कोर्ट के बारे में हाईकोर्ट ने तल्ख टिप्पणी की है लेकिन यही बात मीडिया और पुलिस के बारे में नहीं कही जा सकती. मीडिया और पुलिस दोनों ने सबसे घटिया समाजिक भावनाओं के आवेग में अपनी कहानी गढ़कर लोगों के सामने पेश किया.

चाहे तलवार दंपति दोषी हों या नहीं लेकिन उन्हें डासना जेल में लगभग साढ़े चार साल गुजारने पड़े. इस तरह उन्हें एक ही जिंदगी में कई दफे मरना पड़ा और यह सब किसी सबूत के आधार पर नहीं बल्कि सरकारी संस्थाओं के हाथो गढ़ी गई खामख्याली(मनगढ़ंत बात) की वजह से हुआ. यह एक सामाजिक रोग है और इस रोग ने शहरी समाज को अपने गिरफ्त में ले लिया है. यह रोग गहरी परीक्षा की मांग करता है.

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