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राजस्थान: भाई की जींस सरकने को बहन की इज्जत से क्यों जोड़ रही हैं महिला आयोग की अध्यक्ष

डिजिटल इंडिया और न्यू इंडिया के दौर में हम आगे बढ़ने के बजाय मध्ययुगीन फैसले क्यों कर रहे हैं ?

Mahendra Saini Updated On: Mar 09, 2018 04:11 PM IST

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राजस्थान: भाई की जींस सरकने को बहन की इज्जत से क्यों जोड़ रही हैं महिला आयोग की अध्यक्ष

राजस्थान महिला आयोग अध्यक्ष सुमन शर्मा ने कहा है कि कोई बहन ऐसे भाई से क्या सुरक्षा की उम्मीद करे जिसका सारा वक्त तो अपनी जींस संभालने में ही निकल जाता है. अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर आयोजित हुए एक समारोह में सुमन शर्मा ने ये बयान दिया. इसका विश्लेषण आगे करेंगे लेकिन पहले बताते हैं कि और क्या-क्या 'ज्ञानवर्द्धक' बातें उन्होने कीं. शर्मा ने कहा कि कभी वो दिन भी थे जब अपने चार्मिंग ब्वॉय के रूप में लड़कियां चौड़ी छाती वाले ऐसे गबरू जवान की कल्पना करती थीं, जिसकी शर्ट के अंदर से छाती के बाल भी दिखते थे.

सुमन शर्मा ने मजाक बनाते हुए कहा कि अब लड़कों की न चौड़ी छातियां रहीं, न वैक्सिंग के दौर में छाती के बाल ही रहे. शर्मा को इसपर भी ऐतराज था कि आज के लड़के, लड़कियों का फैशन स्टेटमेंट क्यों अपना रहे हैं मसलन, ज़ीरो फिगर के लिए जिम में पसीना बहाना, कानों में बालियां पहनना, लंबे बाल रखना या संकरी मोरी की जीस पहनना.

वैसे, सुमन शर्मा लड़कों को 'ज्ञान' देने तक ही सीमित नहीं रही. शर्मा जी की पाठशाला में लड़कियों को भी हिदायतें दी गई. उन्होने कहा कि लड़कियों को भी आजादी का नाजायज फायदा नहीं उठाना चाहिए. उनकी राय में पुरुषों को पीछे छोड़कर आगे बढ़ जाने से समाज में असंतुलन के हालात बन जाएंगे.

सुमन शर्मा के 'ज्ञान' पर सवाल

अब कई लोग सवाल उठा रहे हैं कि जींस के सरकने से बहन की इज्जत का क्या लेना-देना. फैशन स्टेटमेंट कभी स्थाई नहीं रहते. लड़कों में कभी बेलबॉटम का ट्रेंड था तो कभी बैगी पैंट का ट्रेंड आया. मौजूदा दौर में लो-वेस्ट जींस का फैशन है. फैशन की तरह ही समाज का चरित्र भी बदला है. निश्चित रूप से अपराध पहले की तुलना में बढ़े हैं. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े तो हर साल बढ़ते अपराध खासकर यौन अपराधों का बढ़ता ग्राफ ही प्रदर्शित करते हैं.

Photo Source: Twitter Handle Of Suman Sharma (@ITforWOMAN )

लेकिन बढ़ते अपराधों और लड़कियों की सुरक्षा को लड़कों के कपड़ों से जोड़ना क्या वैचारिक संकीर्णता का प्रतीक नहीं है? क्या सुमन शर्मा का ये बयान कुछ पुरुषों के उन्हीं बयानों जैसा नहीं है जिनमें उन्होंने बलात्कार का कारण लड़कियों के तंग होते कपड़ों को बताया था. पिछले कुछ साल में हमने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देखा है कि समाज ने यौन अपराधों के पीछे लड़कियों के कपड़ों को जिम्मेदार ठहराए जाने का कितना पुरजोर विरोध किया है.

अक्सर, हम लड़कियों के पहनावे पर सवाल उठाने वालों को पितृ सत्तात्मक समाज की मानसिकता वाले लोग कहकर झिड़क तक देते हैं. इस मानसिकता में बदलाव की बातें भी बुद्धिजीवी अक्सर करते हैं. टीवी चैनलों पर या सार्वजनिक बहसों में अकसर लड़कियों पर इस तरह की पाबंदी की बात करने वालों को बायकॉट तक झेलना पड़ता है. लेकिन लड़कों के पहनावे पर मजाक/पाबंदी की बात करने वाले भी क्या उसी स्तर पर नहीं तौले जाने चाहिए.

कॉलेज में जींस नहीं चलेने देगी बीजेपी

राजस्थान के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में इस वक्त परीक्षाएं चल रही हैं. परीक्षा के बाद जल्द ही नया सत्र शुरू होगा लेकिन छात्राओं के लिए नया सेशन कई पाबंदियां लाने वाला है. ये पाबंदियां समाज के किसी ठेकेदार की तरफ से नहीं बल्कि खुद बीजेपी सरकार की तरफ से आ रही हैं. नए सेशन से लड़कियों को कॉलेज में जींस, टी-शर्ट, शर्ट जैसे आधुनिक परिधान पहनने पर पाबंदी लग जाएगी. अब कॉलेज जाने वाली लड़कियां सलवार-सूट और साड़ी ही पहनेंगी. सलवार सूट भी दुपट्टे के साथ ही पहनना होगा.

हैरानी की बात तो ये है कि 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के तहत एक कार्यक्रम में राजस्थान में महिला सशक्तिकरण पर खुद की पीठ थपथपाने वाली सरकार ही इन पाबंदियों को लागू कर रही है. हैरानी इस बात पर भी है कि ऐसे आदेशों पर मुहर लगाने वाली मंत्री भी महिला ही हैं. उच्च शिक्षा मंत्री किरण माहेश्वरी ने इस फैसले पर आगे बढ़ने की रजामंदी दे दी है और विभागीय कार्यवाही तेजी से जारी भी है.

पहनावे पर पाबंदी के इस तालिबानी फैसले के पीछे तर्क भी ऐसे दिए जा रहे हैं, जो कहीं से भी जम नहीं रहे हैं. किरण माहेश्वरी का तर्क है कि कॉलेजों में ड्रेस कोड से बाहरी तत्वों और कॉलेज के पूर्व छात्रों की असामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों को रोका जा सकेगा. कॉलेज निदेशालय की तरफ से जारी चिट्ठी में प्रिंसिपलों से 12 मार्च तक यूनिफॉर्म का रंग निर्धारित करने को कहा गया है. जिन कॉलेजों में पहले से ड्रेस कोड लागू है, उनसे भी अपनी राय भेजने को कहा गया है.

सरकार की मंशा तो टीचर्स के लिए ड्रेस कोड लागू करने की भी है. हालांकि वक्त की कमी को देखते हुए फिलहाल इसे टाल दिया गया है. टीचर्स से लेकर छात्र-छात्राओं तक सब एक सुर में सरकार के इस तालिबानी फैसले का विरोध कर रहे हैं. एक प्रोफेसर ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि प्रधानमंत्री जी 2022 में न्यू इंडिया की बात करते हैं लेकिन बीजेपी सरकार पुराने दौर में ले जाने वाले फैसले कर रही है.

छात्र-छात्राओं में भी इस फैसले को लेकर भारी रोष है. जयपुर के पास के सरकारी कॉलेज में पढ़ने वाली एक छात्रा ने कहा कि राजस्थान में वैसे भी लड़कियों की शादी मेट्रोपॉलिटन शहरों की तुलना में जल्दी कर दी जाती है. ऐसे में लड़कियों के पास स्कूल की बंदिश और शादी के बाद की 'बंधी' हुई जिंदगी के बीच कॉलेज के ही 3-4 साल बचते हैं. अगर इस वक्त को भी मनमाफिक न जिया जाए तो फिर काहे की आजादी और काहे का महिला सशक्तिकरण ?

लड़के-लड़कियों में सरकार खुद कर रही भेद

महिला दिवस पर झुंझुनूं में पोषण मिशन की शुरुआत करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बेटियों को आगे बढ़ाने की खूब बातें की. मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने कम लिंगानुपात के लिए बदनाम रहे शेखावाटी क्षेत्र में सुधार पर खुद की पीठ थपथपाई. केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने भी बेटे व बेटी में कोई भेदभाव न करने का संदेश दिया.

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

लेकिन सरकारी स्तर पर ही वास्तविक रूप में इसका उलटा देखने को मिल रहा है. कॉलेजों में ड्रेस कोड को लेकर सुनने में आ रहा है कि शुरुआती चरण में लड़कियों के लिए ही इसे लागू किया जाएगा. यानी लड़के अपने मनचाहे कपड़े पहन कर कॉलेज आ सकेंगे. जब लड़का और लड़की एक समान है तो फिर ये भेदभाव क्यों. और फिर सबसे बड़ा सवाल तो ये कि अगर सरकार के स्तर पर ऐसे भेदभाव किए जाएंगे तो जनता को किस मुंह से बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का संदेश दिया जाएगा.

कई छात्राएं सिर्फ लड़कियों के लिए ड्रेस कोड लागू करने को पितृ सत्तात्मक मानसिकता से जोड़ कर देख रही हैं. एक छात्रा किरण शर्मा का कहना है कि मुख्यमंत्री और उच्च शिक्षा मंत्री के तौर पर दो महिला नेत्रियों के होने के बावजूद लड़के-लड़कियों के बीच ये भेदभाव क्यों. क्या ये ऐसा नहीं दिखाता है कि शीर्ष पर पहुंचने के बावजूद महिलाओं के दिमाग से पुरुष वर्चस्व खत्म नहीं हो पाता. हालांकि एक कॉलेज प्रिंसिपल का कहना है कि ड्रेस कोड को छात्र-छात्राओं से सलाह-मशविरा करके ही लागू किया जाएगा. संभावित यूनिफॉर्म का रंग ऐसा नहीं होगा कि छात्र-छात्राओं को 'शर्म' आए.

कांग्रेस करेगी ड्रेस कोड का विरोध

उपचुनाव में लगातार जीत से उत्साहित कांग्रेस ने अब सरकारी कॉलेजों में ड्रेस कोड का पुरजोर विरोध करने का ऐलान कर दिया है. कांग्रेस ने ड्रेस कोड के जरिए बीजेपी पर कॉलेजों के भगवाकरण का आरोप लगाया है. विधानसभा में कांग्रेस के गोविंद सिंह डोटासरा ने आरोप लगाया कि पहले इसी सरकार ने स्कूलों का ड्रेस कोड भी बदला था. सरकारी खर्च पर छात्राओं को बांटी जाने वाली साइकिलें भी भगवा रंग की ही खरीदी गई. डोटासरा का कहना है कि ऐसा लगता है जैसे बीजेपी सरकार युवाओं को डॉक्टर, इंजीनियर बनाने के बजाय भगवा वेषधारी बाबा बनाना चाहती है.

कांग्रेस के इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए मंत्री किरण माहेश्वरी तर्क देती हैं कि यूनिफॉर्म के रंग का फैसला सरकार खुद नहीं कर रही है. माहेश्वरी के मुताबिक रंग का फैसला कॉलेजों पर छोड़ दिया गया है. ड्रेस कोड के पीछे उन्होने कॉलेजों में बाहरी तत्वों द्वारा बेवजह की राजनीति को रोकना मुख्य वजह बताया है.

vasundhara raje

सरकार की तरफ से कहा जा रहा है कि पिछले दिनों गुरु-शिष्य संवाद के दौरान कॉलेजों की तरफ से ही ड्रेस कोड की मांग उठाई गई थी. सरकार ये भी दावा कर रही है कि यह कोई तानाशाही नहीं है क्योंकि आखिरी फैसला कॉलेज प्रिंसिपलों, प्रशासन और छात्र संघों की राय से ही लिया जाएगा.

मेरा मानना है कि 21वीं सदी में हम खाने-पीने और पहनने जैसे बुनियादी सवालों में उलझ कर बेवजह का तनाव पाल रहे हैं. इस समय तो हमें प्रोग्रेसिव सोच रखनी चाहिए जबकि ऐसा लगता है जैसे हमसे कहीं आगे की सोच तो 70 साल पहले हमारा संविधान बनाने वाले विद्वान रखते थे. 1950 के दौर में भी पहनने, खाने, आने-जाने (संचरण) जैसे फैसलों को निवासियों के मूल अधिकार बनाया गया. यानी बंदिशों की कहीं बात ही नहीं थी. फिर डिजिटल इंडिया और न्यू इंडिया के दौर में हम आगे बढ़ने के बजाय मध्ययुगीन फैसले क्यों कर रहे हैं ?

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