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राजस्थान: विधायकों की जान ले रहा विधानसभा वाला भूत

राजस्थान में बीजेपी विधायकों को उपचुनाव में हार के अलावा भूत-प्रेतों का डर भी सता रहा है

Updated On: Feb 23, 2018 09:21 PM IST

Mahendra Saini
स्वतंत्र पत्रकार

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राजस्थान: विधायकों की जान ले रहा विधानसभा वाला भूत

राजस्थान विधानसभा में बजट सत्र चल रहा है. हालिया उपचुनावी हार और आने वाले चुनाव, किसान आंदोलन और अपनों के सवालों से ही बीजेपी सरकार भारी दबाव में है. लेकिन एक और दबाव या कहें डर है, जिसका तनाव विधायकों पर साफ देखा जा सकता है. ये डर इतना बड़ा है कि विधानसभा तक में इसकी चर्चा हो रही है. ये डर है भूत-प्रेत और आत्माओं का.

पिछले 2 दिन में विधानसभा भवन के अंदर भूतों और प्रेतात्माओं का वास होने को लेकर परस्पर बयानबाजी हुई है. मुख्य सचेतक कालूलाल गुर्जर ने कहा कि मौजूदा विधानसभा जिस जमीन पर बनी है, वहां पर पहले श्मशान और कब्रिस्तान था. ऐसे में हो सकता है कि किसी आत्मा को मुक्ति न मिली हो. वही आत्मा नुकसान पहुंचा रही है. यही वजह है कि इस विधानसभा में कभी एकसाथ 200 विधायक नहीं बैठ पाए हैं. गुर्जर ने तो भवन की शुद्धि और प्रेतात्मा की शांति के लिए मुख्यमंत्री को यज्ञ कराने की सलाह भी दे डाली.

नागौर से बीजेपी विधायक हबीबुर्रहमान अशरफी ने भी सवाल उठाते हुए पूछा कि क्या कारण है जो इस विधानसभा में कभी 200 विधायक एकसाथ नहीं बैठ पाए. अशरफी ने कहा कि भारतीय संस्कृति और वास्तुकला के अनुसार श्मशान की जमीन पर इमारत नहीं बननी चाहिए. उन्होने भी इस संबंध में मुख्यमंत्री से बात की है.

सदन के अंदर भूत पर चर्चा

सदन के बाहर ही नहीं बल्कि अंदर भी इस बारे में काफी चर्चा हुई. 22 फरवरी को अनुदान मांगों पर चर्चा के दौरान कांग्रेस विधायक धीरज गुर्जर ने पॉइन्ट ऑफ इंफोर्मेशन के जरिए ये मामला उठाया. गुर्जर ने मुख्य सचेतक कालूलाल गुर्जर पर अंधविश्वास को बढ़ावा देने का आरोप लगाते हुए सरकार से इसपर रुख साफ करने की मांग की. इस पर पीठासीन सभापति घनश्याम तिवाड़ी ने कहा कि वसुंधरा राजे सरकार के पिछले कार्यकाल में भी इसपर व्यापक चर्चा हुई थी. वास्तुदोष को दूर करने के नाम पर परिसर की उत्तर दिशा में बोरवेल भी खुदवाया गया था.

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लक्ष्मणगढ़ विधायक और कांग्रेस के डिप्टी व्हीप गोविंद सिंह डोटासरा ने तो इस पर मंत्रीजी से जवाब मांगा. कार्मिक और पंचायती राज मंत्री राजेंद्र सिंह राठौड़ ने इस पर कहा कि सभापति चाहें तो इस पर जांच कमेटी बनाई जा सकती है. हालांकि उन्होने भूत-प्रेत की बातों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि समिति में उनके अलावा किसी को भी शामिल कर लिया जाए.

इस दौरान कांग्रेस और बीजेपी विधायकों ने एक दूसरे पर प्रेत होने के आरोप लगाए तो कई बार ठहाके भी लगे. डोटासरा ने बार-बार मंत्री से जल्द जवाब देने की मांग की. इसके उत्तर में मुख्य सचेतक कालूलाल गुर्जर ने कह दिया कि ये भूत-प्रेत तो कांग्रेस के लिए हैं. संयोग की बात है कि राजस्थान विधानसभा में भूत की चर्चा के दौरान ही बिहार के पूर्व मंत्री तेज प्रताप यादव का भी ऐसा ही एक बयान सामने आया. यादव ने कहा कि उन्होने सरकारी आवास इसलिए छोड़ दिया क्योंकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसमें भूत छुड़वा दिया है.

अचानक भूत आया कहां से?

दरअसल, बुधवार को नाथद्वारा से बीजेपी विधायक कल्याण सिंह का निधन हो गया था. पिछले दिनों मांडलगढ़ से बीजेपी की ही विधायक कीर्ति कुमारी का भी निधन हो गया था. मांडलगढ़ उपचुनाव के बाद जैसे ही विधायकों की संख्या वापस 200 पहुंची तो 20 दिन के अंदर ही नाथद्वारा विधायक का निधन हो गया. बीजेपी विधायक नरपत सिंह राजवी और अमृता मेघवाल के स्वाइन फ्लू से ग्रसित हो जाने का मामला भी सामने आया है.

गुरुवार दोपहर को विधानसभा के बाहर अनौपचारिक बातचीत में विधायक इन्हीं मुद्दों पर चर्चा कर रहे थे. इसी दौरान मुख्य सचेतक कालूलाल गुर्जर ने विधानसभा में बुरी आत्माओं के साये वाला बयान दिया. हबीबुर्रहमान ने इसका समर्थन किया. इसके बाद देर शाम को सदन में चर्चा के दौरान कांग्रेस विधायक धीरज गुर्जर ने संबंधित मंत्री से इसपर जवाब की मांग की तो चर्चा प्रेतों के लिए जांच कमेटी बनाने तक जा पहुंची.

वैसे, विधानसभा में प्रेतात्माओं की चर्चा पहली बार नहीं हुई है. ऐसी बातें तभी से हो रही हैं जबसे इस भवन का निर्माण हो रहा था. बताया जाता है कि विधानसभा भवन के निर्माण के दौरान अलग-अलग समय में कई मजदूरों की मौत हो गई थी. तब यहां मजदूरी करने वालों ने दावा किया था कि रात में कई तरह की आवाजें आती हैं. इसके अलावा, विधानसभा शिफ्ट होने से पहले भी अकसर ऊपर की मंजिलों पर अपने आप बत्तियों के जल जाने या बुझ जाने का दावे किए जाते थे. कई कर्मचारियों ने रात में लॉबी में कदमों की आहट भी सुनाई देने का दावा किया था. हालांकि इन्हे कभी साबित नहीं किया जा सका.

कई घटनाओं के कारण.. 'डरना जरूरी है !'

विधानसभा भवन के निर्माण के बाद भी कई बातें ऐसी हो रही हैं जो अंधविश्वास को लगातार बढ़ा रही हैं. फरवरी, 2001 में नए भवन के उद्घाटन के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति के आर नारायणन आने वाले थे लेकिन अचानक बीमार होने की वजह से वे नहीं आ पाए. इसके बाद बिना उद्घाटन ही विधानसभा में कामकाज शुरू कर दिया गया. बाद में उसी साल नवंबर में उद्घाटन कराया गया.

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कालूलाल गुर्जर

कभी 200 विधायकों के एकसाथ न बैठ पाने की तह में जाएं तो सनसनीखेज रहस्य उजागर होते हैं. विधानसभा के रिकॉर्ड के मुताबिक पिछले 17 साल में कुल 8 विधायकों की मौत हो चुकी है. इनमें 2 विधायक, कीर्ति कुमारी और कल्याण सिंह की मृत्यु तो इसी साल हुई है. इनसे पहले नाथूराम अहारी, रामसिंह बिश्नोई, जगत सिंह दायमा, भीखाभाई, अरुण सिंह, भीमसेन चौधरी की भी मृत्यु हो चुकी है. 2013 में चूरू में बसपा उम्मीदवार की मौत हो जाने की वजह से चुनाव टल गया. इस वजह से नई विधानसभा के पहले दिन भी पूरे 200 विधायक एकसाथ भवन में नहीं बैठ सके.

इसके अलावा, पिछले कुछ साल में कई विधायकों को जेल की हवा भी खानी पड़ी है. इसके पीछे भी बुरी आत्माओं के साए को ही जिम्मेदार ठहराया जा रहा है. 2008-13 के दौरान कैबिनेट मंत्री महीपाल मदेरणा और विधायक मलखान सिंह को हत्या के आरोप में तो दूदू विधायक बाबू लाल नागर को रेप के आरोप में जेल जाना पड़ा. बीजेपी विधायक और वर्तमान कैबिनेट मंत्री राजेंद्र सिंह राठौड़ को भी दारा केस में जेल जाना पड़ा. मौजूदा विधानसभा में भी धौलपुर विधायक बीएल कुशवाह को जेल जाना पड़ा.

आखिर विधानसभा अपशकुनी बनी क्यों ?

2001 तक राजस्थान विधानसभा पुराने शहर के अंदर सिटी पैलेस परिसर में बने टाउन हॉल में चलती थी. पिछली सदी के आखिरी दशक में परकोटे के बाहर ज्योतिनगर में नए विधानसभा भवन का निर्माण शुरू करवाया गया. इस इलाके को कई कारणों से नए विधानसभा भवन के लिए ठीक समझा गया था. तब ये इलाका शहर के बाहरी क्षेत्र में था और यहां आबादी कम होने की वजह से ट्रैफिक का दबाव भी कम था.

इस जमीन को मुफीद समझने के पीछे तत्कालीन सरकार के पास कई और कारण भी थे. इनमें सचिवालय, हाईकोर्ट और दूसरे विभागीय कार्यालयों से नजदीकी मुख्य था. यहां से शहर और एयरपोर्ट की सीधी कनेक्टिवटी थी. यहां विधायक आवास भी बने हुए थे. रैली या दूसरे राजनीतिक आयोजन करने के लिए अमरूदों का बाग के रूप में बड़ा मैदान भी पास में ही था.

सबसे बड़ा कारण शायद ये भी रहा होगा कि ये जमीन सरकार पहले ही अवाप्त कर चुकी थी. अगर शहर से 20-30 किलोमीटर दूर विधानसभा भवन बनाया जाता तो नए सिरे से जमीन अवाप्त करनी पड़ती. निर्माण की लागत बहुत ज्यादा बढ़ जाती और फिर ताउम्र परिवहन खर्च भी बहुत ज्यादा आता. ये अलग बात है कि इस विधानसभा भवन के निर्माण के 20 साल के अंदर ही इस इलाके में रिहायशी आबादी और व्यावसायिक गतिविधियां काफी ज्यादा बढ़ गई हैं. इसका अंदेशा पहले ही जता दिया गया था.

जब नया विधानसभा भवन बनाने की चर्चाएं चल रही थी तब कई लोगों ने इसे शहर से 20-30 किलोमीटर दूर बनाने का सुझाव रखा था. लोगों ने भविष्य में जाम वगैरह की समस्या पर चिंता जताई थी. ऐसे लोगों का कहना था कि जयपुर शहर के विस्तार को देखते हुए कुछ ही साल में ज्योतिनगर का ये इलाका आबादी के दबाव में जूझेगा. 25-30 साल में ही यहां भी आबादी और ट्रैफिक के वैसे ही हालात बन जाने का डर था जिनके कारण परकोटे के टाउन हॉल से विधानसभा को यहां शिफ्ट किया गया था. कई वास्तुविदों ने तब भी श्मशान और कब्रिस्तान की जमीन पर भवन निर्माण को सही नहीं बताया था.

क्या विधानसभा श्मशान की जमीन पर है ?

मौजूदा विधानसभा के उत्तर दिशा में दूसरी सरकारी इमारतें और एक शिव मंदिर है. पश्चिम और दक्षिण-पूर्व में विधायक आवास बने हुए हैं. उत्तर पूर्व में एसएमएस स्टेडियम है और दक्षिण दिशा में आम लोगों के घर हैं. हालांकि विधानसभा की पूर्वी दीवार से सटता हुआ एक श्मशान वर्तमान में बना हुआ है.

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ऐसा नहीं है कि विधानसभा की पूरी जमीन पर ही श्मशान या कब्रिस्तान बना हुआ था. इस जमीन के एक हिस्से के मालिक रहे प्रेम बियानी का बयान भी मीडिया में आया है. बियानी के मुताबिक मौजूदा विधानसभा की इमारत श्मशान की जमीन पर नहीं बनी है बल्कि इस परिसर के पीछे वाले छोटे हिस्से में श्मशान हुआ करता था. यहां अब बगीचा और पार्किंग है. इसलिए इमारत में प्रेतात्माओं की बात सिर्फ अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाली ही हो सकती है और कुछ नहीं.

प्रेम बियानी के मुताबिक सरकार को बेवजह प्रेतात्माओं के लिए यज्ञ की सलाह दी जा रही है. जबकि उनके परिवार की चार-चार पीढ़ियां मुआवजे की आस में स्वर्ग सिधार गई. इसलिए बेहतर है कि जमीन मालिकों को मुआवजा देकर उन आत्माओं की अंतिम इच्छा पूरी की जाए. बताया जा रहा है कि 1964 में राज्य सरकार ने कई लोगों की 1700 एकड़ जमीन अधिग्रहित की थी. 53 साल बाद आज भी मुआवजे का केस हाईकोर्ट में पेंडिंग है.

तार्किक नहीं भूत की बात

पिछले दिनों कांग्रेस विधायक सदन में ही धरने पर बैठ गए थे. पूरी रात वे सदन के अंदर रहे लेकिन किसी आत्मा ने उन्हे परेशान नहीं किया. अगर वाकई भूत-प्रेत हैं तो क्यों नहीं कभी वे मीडिया के कैमरों या सीसीटीवी कैमरों की जद में आए. फिर भूत-प्रेत की वजह से विधायकों की मौत की बात तर्कसंगत नहीं लगती. जिन विधायकों की मौत हुई उनका कारण अलग-अलग बीमारियां रही हैं जैसे हाल ही कीर्ति कुमारी की मौत स्वाइन फ्लू से हुई और कल्याण सिंह चौहान की मौत कैंसर से हुई.

विधायकों के जेल जाने के पीछे प्रेतात्माओं को जिम्मेदार ठहराना भी अतार्किक है. गीता में कहा गया है कि बुरे कर्मों का नतीजा भी बुरा ही होता है, उसमें दूसरों को दोष क्यों. पिछली विधानसभा में महीपाल मदेरणा और मलखान सिंह को भंवरी देवी की हत्या के आरोप में जेल जाना पड़ा. जुर्म इतना संगीन था कि सालों बाद भी उनकी जमानत तक नहीं हो सकी है.

ऐसे में अचानक से प्रेतात्माओं के साये की बयानबाजी महज अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाली ही कही जा सकती है. कितनी अजीब बात है कि जहां अंधविश्वासों को खत्म करने वाले कानून बनने चाहिए. जहां नवाचार और समाज को आगे बढ़ाने वाले विषयों पर चर्चा की जानी चाहिए, वहां सारी समस्याओं की जड़ भूत-प्रेतों को बताया जा रहा है. एक विधायक लाखों लोगों का प्रतिनिधि होता है. समाज में उसकी बात का वजन होता है. अगर वही दकियानूसी बात करेगा तो हम कैसे दुनिया को भारत के 'न्यू इंडिया' बन जाने का विश्वास दिला सकेंगे ?

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