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राजस्थान : बीजेपी को भारी न पड़ जाए 'सेलेक्टिव ट्रांसफर' नीति !

मनचाही जगह पर बीजेपी वालों के और दुश्मनी निकालने के लिए दूसरों के ऐसे अनचाहे तबादले लगातार किए जा रहे हैं. इन तबादलों में कांग्रेस वालों की 'डिजायर' भी खूब चल रही है.

Mahendra Saini Updated On: Feb 19, 2018 04:47 PM IST

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राजस्थान : बीजेपी को भारी न पड़ जाए 'सेलेक्टिव ट्रांसफर' नीति !

राजस्थानी में एक कहावत है कि आदमी ठोकर खाकर ठाकुर बनता है. लेकिन इन दिनों वसुंधरा राजे सरकार का रवैया देखकर लगता है जैसे ठोकर खाकर भी ठाकुर ठीक नहीं होना चाहता. सरकारी कर्मचारियों के तबादलों से जुड़ा ऐसा मामला सामने आया है, जिसपर अब सरकार से जवाब देते नहीं बन रहा है.

विधायकों और बीजेपी जिलाध्यक्षों को सरकारी लेटरहेड पर भेजे गए 2 पत्र वायरल हो रहे हैं. ये ऐसे पत्र हैं जिनको पढ़कर कोई भी समझदार आदमी अपना माथा पीट लेगा. आखिर ये सरकार क्यों अपने ताबूत में आखिरी कील भी खुद ही ठोंक देना चाहती है. एक पत्र शिक्षा राज्य मंत्री वासुदेव देवनानी के लेटरहेड पर है. इसके विषय में लिखा है कि -

पार्टी पदाधिकारी/पूर्व पदाधिकारी या वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के खुद और पारिवारिक सदस्यों के तबादलों के प्रस्ताव भिजवाए जाने के संबंध में.

पत्र में बाकायदा प्रारूप देकर तबादला चाहने वाले बीजेपी से जुड़े सरकारी कर्मचारियों के नाम और इच्छित जगह मंगाई गई है. ये पत्र 16 फरवरी को जारी किया गया है. इसपर शिक्षा राज्य मंत्री के विशिष्ट सहायक भरतकुमार शर्मा के दस्तखत हैं. इसी तरह का दूसरा पत्र राजस्थान जन अभाव अभियोग निराकरण समिति के अध्यक्ष के लेटरहेड पर जारी किया गया है. इसमें भी विषय और प्रारूप वही है जो शिक्षा राज्यमंत्री की चिट्ठी में दिया गया है.

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पत्रों का मतलब क्या ?

इन पत्रों का मतलब तो ये हुआ कि अब जो तबादले होंगे वो सिर्फ और सिर्फ बीजेपी से जुड़े लोगों के ही होंगे. कांग्रेस या ऐसे लोग जिनका बीजेपी पदाधिकारियों से निजी संबंध नहीं हैं, उनका ट्रांसफर अब नहीं हो सकेगा. काफी लंबे समय से तबादलों पर अघोषित रोक लगी हुई है. तबादला चाहने वाले कर्मचारियों की सबसे ज्यादा संख्या शिक्षा विभाग में है. अब इसी विभाग के राज्यमंत्री की वायरल हो रही चिट्ठी ने तबादला के इच्छुक लेकिन बीजेपी से नजदीकी नहीं रखने वाले कर्मचारियों को मायूस कर दिया है.

इसका दूसरा मतलब ये भी हो सकता है कि तबादलों के जरिए या तो बीजेपी का आधार बढ़ाने की कोशिश की जा रही है. या फिर पदाधिकारियों को पैसा बनाने का मौका दिया गया है. चूंकि तबादले सिर्फ और सिर्फ बीजेपी पदाधिकारियों की इच्छा पर ही किए जाएंगे. इसलिए ऐसे सरकारी कर्मचारी जो बीजेपी से नहीं जुड़े हैं, वे बीजेपी से जुड़ेंगे तभी उनका तबादला किया जाएगा. दूसरे रूप में बीजेपी पदाधिकारी रिश्वत लेकर गैर बीजेपी सरकारी कर्मचारियों को अपना बताकर ट्रांसफर की कोशिश कर सकते हैं.

सिर्फ बीजेपी से जुड़े सरकारी कर्मचारियों के तबादलों के पीछे की एक वजह और हो सकती है. ये है नाराज कार्यकर्ताओं को मनाने की कोशिश. दरअसल, हालिया उपचुनाव में भारी हार के बाद बीजेपी की मंथन बैठक में एक कारण ये भी उभर कर आया कि सरकार ने कार्यकर्ताओं की सुध नहीं ली. कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर करने के लिए ही अब तबादलों का सहारा लिया जा रहा है. देखा गया है कि मंत्रियों के जनता दरबारों में सबसे ज्यादा लोग तबादलों के आवेदन लेकर ही आते हैं.

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तबादलों के मामले निजी प्रतिष्ठा और रौब-रुआब से भी जुड़े रहते हैं. गांव-कस्बों में आम आदमी अपनी समस्याएं लेकर सत्ताधारी पार्टी के पदाधिकारी के पास पहुंचता है. पार्टी पदाधिकारी के रुतबे और ऊपर तक पहुंच का पैमाना यही होता है कि वो कितनी जल्दी लोगों के काम करा पाता है. ऐसे में अगर वो किसी का तबादला भी न करा पाए तो काहे का नेता और काहे की राजनीति. लोग उसे मुंह पर ही सुना भी जाते हैं. नेताजी की तरफ से इसका बदला पार्टी/मंत्री/उम्मीदवार से फिर चुनाव के समय 'खामोश' रहकर लिया जाता है. यही खामोशी/नाराजगी कम करने के लिए अब तबादलों का दांव खेला जा रहा है.

तबादलों ने लिया इंडस्ट्री का रूप

पिछले 20 साल में राजस्थान में तबादलों ने एक उद्योग का रूप ग्रहण कर लिया है. निचले स्तर के कर्मचारियों के तबादले अब आसानी से नहीं होते. ये एक विशेष समय में होते हैं जैसे चुनाव जीतने के पहले साल में या फिर सत्ता के आखिरी यानी चुनावी साल में. तबादलों में विभाग के आला अधिकारियों की नहीं चलती या बहुत कम चलती है. ट्रांसफर अब 'डिजायर' पर होते हैं. निश्चित रूप से ये डिजायर सत्ता से जुड़े लोगों जैसे मंत्री, विधायक या पार्टी पदाधिकारियों की ही होनी चाहिए.

अगर तबादले के इच्छुक किसी व्यक्ती की पहुंच सत्ताधारी दल के नेताओं तक इतनी नहीं है कि वो उनकी डिजायर लिखवा सके तो दूसरे रास्ते भी हैं. इन रास्तों में 'सेवा शुल्क' प्रमुख है. इसके अलावा, एक रास्ता और भी है. पिछले दिनों एक नेता पर आरोप लगा कि तबादले के बदले उसने अपनी शारीरिक इच्छा पूरी किए जाने की शर्त रखी.

तबादलों ने किस कदर इंडस्ट्री का रूप अख्तियार कर लिया है, इसकी एक बानगी देखिए. घटना 2002-03 की है. यह कांग्रेस की अशोक गहलोत सरकार का चुनावी साल था. सत्ता के पांचवें साल में मंत्रिमंडल का विस्तार किया गया था. एक नेताजी ने मंत्री बनते ही अपने राजनीतिक गुरु से पूछा कि एक साल से भी कम समय बचा है, अब क्या कमा पाएंगे. गुरु ने कमाने के तरीकों में सबसे पहले तबादलों का ही जिक्र किया और कम समय को देखते हुए रेट तीन गुणा करने की सलाह भी दे डाली.

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तब एक ट्रांसफर की सामान्य रेट 30 हजार के आसपास थी. 15 साल बाद अब क्या हालात होंगे, इसका अंदाज़ा लगाया जा सकता है. अब तो ये भी बताया जाता है कि मंत्री या आला नेता के निजी सहायक, ड्राइवर, रसोइया तक ट्रांसफर करादेने का आश्वासन देते हैं और मोटी रकम वसूलते हैं. मेरे एक परिचित कर्मचारी को मनचाही जगह पर पोस्टिंग के लिए अपने ही विभागाध्क्ष के रिश्तेदार को एक लाख रुपए देने पड़े. अब वास्तव में विभागाध्यक्ष के पास रुपए पहुंचे या बिचौलिए ने अपने रिश्तों के सहारे ट्रांसफर कराया, ये तो वही जानें.

क्या ये सेलेक्टिव भेदभाव है?

बीजेपी वालों के ही ट्रांसफर करने के लिए लिखी गई शिक्षा राज्यमंत्री और जन अभाव अभियोग समिति के अध्यक्ष की इन चिट्ठियों से बवाल तो शुरू हो ही गया है. कांग्रेस राजे सरकार पर चयनित भेदभाव (Selective Partiality) का आरोप लगा रही है. हालांकि ऐसा हर सरकार में होता आया है. हर पार्टी अपने राज में अपने लोगों (सुविधा के लिए इन्हे कार्यकर्ता कहा जाता है) को ही प्रमुखता देती है.

कांग्रेस का कहना है कि उपचुनावों में सबसे बुरी हार के बावजूद बीजेपी ने सबक नहीं सीखा है. अब भी आम जनता की सुध नहीं ली जा रही है और सिर्फ अपने लोगों को ही फायदा पहुंचाने की हरसंभव कोशिशें की जा रही हैं. अकेले शिक्षा विभाग में ही हजारों शिक्षक और दूसरे कर्मचारी लंबे वक्त से तबादले की उम्मीद लिए कतार में हैं. क्या वे कर्मचारी मायूस ही रह जाएंगे, जिनके बीजेपी नेताओं या उनके परिवार से संबंध नहीं हैं?

इस बीच सिरोही से एक खबर ऐसी सामने आई है जो सरकार की सेलेक्टिव भेदभाव वाली नीति पर मुहर लगाती है. खबर है कि गोपालन राज्यमंत्री ओटाराम देवासी के खिलाफ महिलाओं पर अभद्र टिप्पणी के आरोप में परिवाद देने वाली कांग्रेस नेता के पति का तबादला कर दिया गया. सिरोही की कांग्रेस जिलाध्यक्ष हेमलता शर्मा ने आरोप लगाया है कि 15 फरवरी को उन्होने शिकायत दी और 17 फरवरी को उनके पति का तबादला जावाल से आबू रोड कर दिया गया. जिला शिक्षा अधिकारी सोहन सिंह ने इस संबंध मे ऊपर से आदेश मिलने की बात कही है.

मनचाही जगह पर बीजेपी वालों के और दुश्मनी निकालने के लिए दूसरों के ऐसे अनचाहे तबादले लगातार किए जा रहे हैं. इन तबादलों में कांग्रेस वालों की 'डिजायर' भी खूब चल रही है. चित्तौड़गढ़ जिले में अंडर ट्रेनिंग IPS और गंगरार ASP सुधीर चौधरी को एपीओ कर दिया गया. उनकी गलती ये थी कि उन्होंने सटोरियों और अवैध शराब के कारोबार के खिलाफ ऑपरेशन शुरू किया था. 17 फरवरी को कांग्रेस से जुड़े एक बड़े आदमी के निम्बाहेड़ा रोड पर बने ढाबे पर कार्रवाई की गई थी. आरोप है कि इसके बाद 16 फरवरी यानी बैक डेट में चौधरी को एपीओ करने के आदेश जारी किए गए.

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तुलसीदास जी ने लिखा था कि 'समरथ को न दोष गुसाईं...' इस वक्त इसके मायने क्या हैं. सत्ता चाहे किसी के पास हो, 'समरथ' चाहे किसी दल का हो, न उसका 'दोष' देखा जाता है, न उसका काम अटकता है और न उसका बाल ही कोई बांका कर सकता है. लेकिन सवाल तो आम आदमी का है. जिसे वोट मांगते वक्त प्रधान और खुद को सेवक कहकर मुगालते में रखा जाता है. उसी आम आदमी का सवाल जिसे सबका साथ, सबका विकास नारा देकर भी मुगालते में रखा जाता है. आखिर जब काम कराने की बारी आती है तो ये आम आदमी ही सबसे पीछे खड़ा होने पर मजबूर क्यों होता है?

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