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राजस्थान: वसुंधरा सरकार की स्वास्थ्य सेवाओं पर गंभीर सवाल

देश का सबसे बड़ा राज्य होने के बावजूद राजस्थान में मेडिकल सुविधाएं बदहाल हैं

Mahendra Saini Updated On: Aug 11, 2017 12:12 PM IST

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राजस्थान: वसुंधरा सरकार की स्वास्थ्य सेवाओं पर गंभीर सवाल

9 अगस्त की सुबह पूर्व केंद्रीय मंत्री और अजमेर से सांसद सांवर लाल जाट का दिल्ली के एम्स में निधन हो गया. सांवरलाल जाट पिछले कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे. जुलाई में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के जयपुर दौरे पर एक बैठक के दौरान जाट अचानक बेहोश हो गए थे.

जाट को एम्बुलेंस में लेकर अस्पताल पहुंचे चिकित्सा मंत्री कालीचरण सराफ ने बताया था कि उनकी दोनों किडनियां खराब हो चुकी थी. शाह के साथ बैठक में भी वे डायलिसिस कराने के बाद ही पहुंचे थे.

अमित शाह उस बैठक में राजस्थान में विधायकों और सांसदों से फीडबैक ले रहे थे. सांवर लाल जाट ने किसानों की समस्याओं से जुड़ा एक प्रेजेंटेशन दिया था. इसके बाद जब वे अपनी कुर्सी पर बैठने ही वाले थे कि अचानक बेहोश होकर गिर पड़े. इस दौरान एम्बुलेंस की लेट लतीफी पर खुद मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने अधिकारियों को डांट लगाई थी.

पूर्व मंत्री को मेडिकल इमरजेंसी देने में हुई देरी!

मुख्यमंत्री की नाराजगी की एक वजह ये भी थी कि केंद्र और राज्य में मंत्री रह चुके, वर्तमान सांसद और किसान बोर्ड के अध्यक्ष होने के बावजूद सांवर लाल जाट को मेडिकल सहायता उपलब्ध कराने में गंभीर लापरवाही बरती गई थी. जो एम्बुलेंस उन्हें अस्पताल पहुंचाने के लिए आई थी, पहले तो अमित शाह की गाड़ी बीच रास्ते में होने के कारण वह सही जगह तक पहुंच ही नहीं पाई.

देरी होते देख खुद मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को बाहर आकर स्टाफ को फटकारना पड़ा था. इसके बाद भी एम्बुलेंस में स्ट्रेचर ही नहीं था. सांसद महोदय को कंधों पर उठाकर एम्बुलेंस तक पहुंचाना पड़ा था. जब इतने बड़े नेता के साथ आपातकालीन परिस्थितियों में ये हो सकता है तो फिर आम आदमी की देश के सबसे बड़े राज्य में क्या हालत होगी, अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है.

sanwar lal jat

राजस्थान में हेल्थ सेक्टर बदहाल

देश का सबसे बड़ा राज्य होने के बावजूद राजस्थान में मेडिकल सुविधाएं बदहाल हैं. राजस्थान में GDP का सिर्फ 2% ही हेल्थ सेक्टर में खर्च किया जाता है. सरकार ने गरीबों की भलाई के लिए '108' एम्बुलेंस सेवा और भामाशाह स्वास्थ्य बीमा योजनाएं चला रखी हैं. लेकिन इनमें फैला भ्रष्टाचार दीमक की तरह पूरी व्यवस्था को खत्म कर रहा है.

108 एम्बुलेंस अव्वल तो किसी भाग्यशाली को ही मिल पाती है. दूसरे एम्बुलेंसकर्मी मरीज को सरकारी के बजाय निजी अस्पताल में ले जाने के ज्यादा इच्छुक होते हैं. निजी अस्पतालों की छवि जेब कटुवा से अधिक नहीं रह गई है.

इसी तरह भामाशाह स्वास्थ्य बीमा योजना में सरकार 3 लाख तक का बीमा मुफ्त देती है. लेकिन इसका असल फायदा निजी अस्पताल ही उठा रहे हैं. वे गरीब मरीजों का अनापशनाप बिल बनाकर सरकारी खाते से जमकर चांदी कूट रहे हैं.

कैग की रिपोर्ट के मुताबिक जरूरी न होने के बावजूद निजी अस्पतालों में 10 गर्भवती महिलाओं में से 6 से ज्यादा का सिजेरियन कर दिया जाता है. जबकि सरकारी अस्पतालों में ये अनुपात सिर्फ 10:3 का है.

मामला मेडिकल प्रोफेशनल्स की गंभीर संवेदनहीनता का भी है. अभी कुछ ही हफ्ते हुए हैं जब राजधानी के मल्टी स्पेशलिटी सरकारी अस्पताल जयपुरिया में डॉक्टरों की बेरुखी के कारण एक महिला को बीच सड़क बच्चे को जन्म देना पड़ा था. मीडिया के मामला उठाने और महिला आयोग अध्यक्ष सुमन शर्मा के संज्ञान के बाद राज्य सरकार ने जांच के आदेश दिए. लेकिन सच ये भी है ऐसी जांच को सत्ता पक्ष के लिए फौरी राहत के तौर पर ही देखा जाता है, नतीजों की तो क्या ही कहें.

धारणीय विकास लक्ष्य (SDG-2030) के पैमानों पर भी देश के सबसे बड़े राज्य की हालत इराक जैसे देशों से खराब है. सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों (MDG) को हासिल करने की मियाद 2 साल पहले खत्म हो चुकी है लेकिन अभी तक शिशु मृत्यु दर का आंकड़ा तय लक्ष्य 40 से ऊपर बना हुआ है. इसी तरह बच्चे के जन्म के समय एक लाख माताओं में से करीब 250 से ज्यादा अभी भी दम तोड़ देती हैं. जबकि 12वीं पंच वर्षीय योजना के दस्तावेजों के मुताबिक 2017 में ये 210 प्रति लाख होना चाहिए था.

Anguri, a 26-year-old pregnant woman who just gave birth, rests on a bed along with her newborn baby in the post delivery ward at a community health centre in the remote village of Chharchh, in the central Indian state of Madhya Pradesh, February 24, 2012. In rural Madhya Pradesh, an innovative free maternity ambulance service called "Janani Express", run in partnership between the state government and the United Nations Children's Fund (UNICEF), is trying to increase the number of babies born in clinics where proper care can be provided to the mothers and newborn children, and infant mortality can be decreased. Before this initiative, women like Anguri would have been left to give birth in the fields or on mud floors. Now, the free ambulance brings pregnant women across dusty roads to health clinics where they can give birth safely under basic medical supervision, be nursed afterwards and educated on the importance of breastfeeding and hygiene before returning to their villages and communities. The United Nations' International Women's Day will be celebrated on March 8. Picture taken February 24, 2012. REUTERS/Vivek Prakash (INDIA - Tags: HEALTH SOCIETY ANNIVERSARY) - RTR2YWAI

राजस्थान में डॉक्टरों की है भारी कमी

हेल्थ सेक्टर में राजस्थान की इस बदहाली का एक बड़ा कारण है, डॉक्टरों की भारी कमी. राज्य की जनसंख्या 7 करोड़ से ज्यादा है जबकि सरकारी और निजी एलोपैथिक डॉक्टर लगभग 38,000 ही हैं यानी करीब 2 हज़ार की जनसंख्या पर एक डॉक्टर.

यही नहीं राज्य में MBBS सीटें भी बमुश्किल 1600-1700 ही हैं. नए मेडिकल कॉलेज खोलने के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर से ज्यादा सरकारी इच्छाशक्ति की कमी नजर आती है.

2013 में अशोक गहलोत सरकार ने 15 जिला मुख्यालयों पर नए मेडिकल कॉलेजों को खोलने की योजना तैयार की थी. सरकार बदली तो 4 साल बाद अब इन कॉलेजों का कहीं आता पता भी नहीं है. अब विपक्ष में बैठी कांग्रेस का आरोप है कि वसुंधरा राजे सरकार ने सिर्फ इसलिए जिला मुख्यालयों पर मेडिकल कॉलेज खोलने की योजना लटका दी कि क्रेडिट कहीं कांग्रेस को न मिल जाए.

दूसरा पहलू ये भी है कि जो डॉक्टर हैं, वो भी गांवों में नहीं जाना चाहते. दूसरे लोग चाहे सरकारी नौकरी को तरजीह देते हों लेकिन युवा डॉक्टरों को लगता है कि शहर में कुछ ही साल की प्रैक्टिस उनके लिए अधिक फायदे का सौदा है बजाय गांव में रह कर सरकारी नौकरी करने के. ऐसे में गांवों में खुले PHC और CHC या तो दिखावे की इमारतें रह जाती हैं या नर्सिंग स्टाफ के भरोसे चलाते रहने की मजबूरी.

हेल्थ सेक्टर की दशा सुधारने के लिए सरकार ने भी कुछ पुख्ता उपाय के बजाय आउटसोर्सिंग को ही प्राथमिकता दी है. सैकड़ों PHC को निजी क्षेत्र में देने का पायलट प्रोजेक्ट शुरू भी कर दिया गया है. हालांकि कुकुरमुत्ते की तरह खुलते जा रहे पांच सितारा निजी अस्पताल आम आदमी को लूटने की मशीन बन चुके हैं. लेकिन उम्मीद पर दुनिया कायम है और एक उम्मीद ये भी है कि निजीकरण ने जैसे टेलीकॉम और बैंकिंग क्षेत्र में परिवर्तन किया, वैसे ही किसे पता मेडिकल सेक्टर में भी PPP का प्रयोग मरीजों के चेहरे पर मुस्कान ही ले आए.

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