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राजस्थान सरकार देगी फोन: चुनावी फायदे के लिए जनता का धन बहाने की कवायद?

सच्चाई जो भी हो लेकिन चुनावी फायदे के लिए जनता के धन को बर्बाद करने का हक किसी को नहीं होना चाहिए.

Updated On: Sep 06, 2018 02:00 PM IST

Mahendra Saini
स्वतंत्र पत्रकार

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राजस्थान सरकार देगी फोन: चुनावी फायदे के लिए जनता का धन बहाने की कवायद?
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चुनाव से पहले राजस्थान की बीजेपी सरकार ने खजाने के दरवाजे खोल दिए हैं. सरकार ने ऐलान किया है कि अब वह लोगों को इंटरनेट युक्त फोन खरीदने के लिए 1 हजार रुपए की नकद सहायता देगी. ये सहायता उन लोगों को मिलेगी जो भामाशाह योजना में रजिस्टर्ड हैं और खाद्य सुरक्षा के तहत PDS का राशन लेते हैं. राजस्थान में ऐसे परिवारों की संख्या करीब एक करोड़ है.

इस योजना को भामाशाह डिजिटल परिवार योजना नाम दिया गया है. सरकार की तरफ से कहा गया है कि एक हजार रुपए की ये राशि 2 किश्तों में दी जाएगी. ये सीधे लाभार्थियों के बैंक खाते में आएंगे. 500 रुपए की पहली किश्त मोबाइल खरीदने के लिए और अगली किश्त मोबाइल खरीद का रिकॉर्ड दिखाने पर इंटरनेट कनेक्शन के लिए.

अब कई लोगों के मन मे ये शंका हो सकती है कि सरकार तो झुनझुना पकड़ा रही है. भला 500 या 1 हजार रुपए में कोई इंटरनेट चल सकने वाला फोन कैसे खरीद सकता है. तो सरकार ने इसका भी तोड़ पहले ही निकाल कर जनता के सामने पेश कर दिया है. आखिर जैसे भी हो उन्हें तो सरकारी खजाने का पैसा उन लोगों की जेब मे डालना ही है जो वोट देने लायक हैं.

वसुंधरा सरकार ने कहा है कि भामाशाह डिजिटल परिवार योजना के 1 हजार रुपए लेने के लिए जरूरी नहीं कि नया फोन ही खरीदा जाए. आप अपना पुराना फोन भी सरकार को दिखा सकते हैं. बस शर्त इतनी है कि वो इंटरनेट के लिए सक्षम होना चाहिए. इस शर्त की वजह आपको आगे बताएंगे. अगर आपके खुद के पास ऐसा फोन नहीं है तो भी कोई बात नहीं. लाभार्थी अपने परिवार के किसी सदस्य का फोन दिखाकर भी सरकारी पैसा हासिल कर सकते हैं.

रुपए लेने के लिए इंटरनेट की शर्त क्यों?

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अब आपको बताते हैं कि बीजेपी सरकार आखिर इंटरनेट युक्त फोन की ही शर्त क्यों लगा रही है. दरअसल, चुनाव की आहट शुरू होते ही सरकार ने मीडिया में बड़े-बड़े विज्ञापनों की झड़ी लगा दी है. रोजाना हर अखबार में पूरे-पूरे पेज के विज्ञापन आ रहे हैं. इसके बावजूद सरकार के प्रचार विभाग को लग रहा है कि कुछ कमी है.

सरकार को लगता है कि उसने बहुत ज्यादा अच्छे काम किए हैं लेकिन जनता का क्या करें जो उसके अच्छे कामों के प्रचार वाले विज्ञापनों के पेज को पढ़ती ही नहीं है. इसी का समाधान उसे इंटरनेट वाले फोन में दिखा है. अब योजना बनाई गई है कि सरकार के कथित अच्छे कामों की छोटी-छोटी मल्टी मीडिया फाइल्स बनाकर इंटरनेट के जरिए जनता के फोन में भेजी जाए. सरकार को लग रहा है कि जब वो फोन और इंटरनेट दोनों का पैसा देगी तो जनता भी उसका विज्ञापन जरूर देखेगी.

खैरात सिर्फ फोन या इंटरनेट की नहीं..!

ऐसा नहीं है कि बीजेपी सरकार ने सिर्फ ये एक हजार की खैरात बांटनी ही शुरू की है. बल्कि ये कहें कि 4 साल की सुस्ती के बाद अब खजाने को पूरी तरह चौराहे पर लाकर रख दिया गया है तो कुछ गलत न होगा. किसानों के 50 हजार तक के कर्ज माफ किए गए हैं. लेकिन इस कर्ज माफी में भी आरोप वैसे ही लग रहे हैं जैसा कि पुरानी कहावत है- अंधा बांटे रेवड़ी, फिर-फिर अपनो को देय.

आरोप है कि 8 हजार करोड़ रुपए की इस योजना में असली फायदा बड़े जमींदारों या बीजेपी समर्थित लोगों ने ही ज्यादा उठाया है. वास्तव में जो गरीब और जरूरतमंद काश्तकार था, उसे या तो पहले लोन ही नहीं मिल पाया था या डरा-धमका कर उससे पहले ही वसूली कर ली गई. अब दिखावे के लिए ज्यादातर प्रभावशाली किसानों के लोन माफ किए जा रहे हैं.

सरकार ने अनुसूचित जाति/जनजाति वित्त एवं विकास निगम से कर्ज लेने वाले एससी/एसटी, सफाई कर्मचारी, दिव्यांगजन और ओबीसी के 2 लाख रूपए तक के लोन को भी माफ कर दिया है. इससे सरकार पर 114 करोड़ का भार पड़ेगा. मुख्यमंत्री का कहना है कि ये इसलिए किया गया क्योंकि कमजोर वर्ग के ये लोग लोन नहीं चुका पा रहे थे. लेकिन विपक्ष का सवाल है कि कमजोरों की मजबूरी साढ़े 4 साल में पहली बार चुनाव के वक़्त ही क्यों नजर आई.

खैर, कारपेंटर, केश कलाकार, कुम्हार, मोची और प्लम्बरों को भी सरकार ने राहत दी है. इनको दिए गए 2 लाख के कौशल विकास लोन के ब्याज को अब सरकार चुकाएगी. ऐसी ही कुछ और छोटी-बड़ी योजनाएं लाई गई हैं. लेकिन लगता नहीं कि इन सबके बावजूद वसुंधरा सरकार जनता का दिल जीत पाई है.

गौरव यात्रा में जनता पर बंदिशें!

अब तक जो भी राजनीतिक यात्राएं देखी गई हैं, उनमें शायद ही कभी इतनी बंदिशें देखी गई हों, जितनी कि वसुंधरा राजे की मौजूदा राजस्थान गौरव यात्रा में देखी जा रही हैं. शायद सरकार को उम्मीद नहीं रही होगी कि इतनी खैराती सौगातों के बावजूद जनता उसका स्वागत फूलों से नहीं पत्थरों से करेगी.

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जोधपुर संभाग में राजनीतिक रथ पर पत्थर फेंके जाने के बाद प्रशासन अब अति सक्रिय है. पिछले दिनों गौरव यात्रा बाड़मेर में थी. यात्रा के पहुंचने से पहले थानों से नोटिस जारी किए गए. बाड़मेर कोतवाली थानाधिकारी के नाम से जारी किए इस नोटिस में उन मकान मालिकों को पाबंद किया गया था, जिनका घर गौरव यात्रा के रूट में पड़ रहा था.

इस नोटिस में लिखा था कि अगर VIP रूट के दौरान घर की छत से किसी ने भी सरकार विरोधी नारे लगाए या काले झंडे दिखाए तो मकान मालिक के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी. क्या लोकतंत्र अब इतना संकीर्ण हो गया है कि कोई सरकार के खिलाफ कुछ नहीं बोल सकता?

गौरव यात्रा पर हाईकोर्ट सख्त

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एक याचिका पर सुनवाई करते हुए राजस्थान हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश प्रदीप नान्द्रजोग और जस्टिस जी आर मूलचंदानी की बेंच ने गौरव यात्रा का पूरा हिसाब मांगा है. कोर्ट ने इस यात्रा में किसी भी सरकारी कार्यक्रम के आयोजन पर भी रोक लगा दी. याचिकाकर्ता विभूति भूषण शर्मा ने यात्रा के नाम पर सरकारी धन खर्च करने का आरोप लगाया था.

पिछली सुनवाई में सरकार ने इसे बीजेपी की यात्रा बताया था. लेकिन याचिकाकर्ता का आरोप था कि यात्रा के दौरान सरकारी कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं और इस बहाने पूरा खर्च सरकार पर डाला जा रहा है. जबकि बीजेपी ने सरकारी मशीनरी की मौजूदगी को मुख्यमंत्री का प्रोटोकॉल बताया था.

बहरहाल, सच्चाई जो भी हो लेकिन चुनावी फायदे के लिए जनता के धन को बर्बाद करने का हक किसी को नहीं होना चाहिए. सरकारों को भी ये समझना चाहिए कि साढ़े 4 साल की सुस्ती और आखिरी 6 महीने में खैरातों की सौगात अब वोट पाने का शॉर्टकट नहीं हो सकता. साक्षरता के साथ जनता में जागृति भी बढ़ रही है. अगर सिर्फ इसी तरह से वोट मिलते तो राजस्थान में ही 2013 में कांग्रेस हारी न होती. ये फिजूलखर्ची कुछ और नहीं बस उन टैक्स पेयर्स के साथ धोखा है जो ईमानदारी से इस उम्मीद में टैक्स भरते हैं कि ये रुपया देश के विकास में खर्च होगा.

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